बिहार चुनाव: सत्ता पाने का 'नाटक'

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- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
भइया देख ली तेरी बहुत सरदारी रे,
अबकी बार मेरी बारी रे,
एक देखें होगें, 1000 देखें होगें,
लेकिन हमारी पार्टी जैसा लाजवाब नहीं देखे होगें.
बिहार के अंदरूनी इलाकों की फिजाओं में इस तरह के डायलॉग आजकल खूब गूंज रहे हैं. नाल, ढोलक और खंजरी की धुन पर इसके साथ तालमेल बैठाया जा रहा है.
ये नुक्कड़ नाटक है. विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार और पार्टियां इस विधा का खूब इस्तेमाल कर रही हैं.
सत्ता पर चोट करने के लिए कभी नुक्कड़ नाटक का इस्तेमाल हिन्दी पट्टी खासकर बिहार में खूब किया जाता था. लेकिन अब इसका इस्तेमाल सत्ता पाने के लिए किया जा रहा है.
हालांकि ये पहली बार नहीं है जब नुक्कड़ नाटकों का इस्तेमाल पार्टियां अपने प्रचार के लिए कर रही हैं.
साल 2009 के लोकसभा चुनाव में इसका खूब इस्तेमाल हुआ. हालांकि वामपंथी पार्टियां इसका इस्तेमाल बहुत पहले से करती रही हैं.
कलाकारों की मांग

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आलम ये है कि पूरे बिहार में कलाकारों की भारी मांग है. नुक्कड़ कलाकार ये मांग पूरी नहीं कर पा रहे हैं. सो गांवों से पारंपरिक वाद्य यंत्र बजाने वालों, ठीक-ठाक संवाद अदायगी करने वाले बेरोजगार युवकों को बुलाया जा रहा है.
रंगमंच संस्था प्रयास ने नाटक की ऐसी 70 टीमें तैयार की हैं. एक टीम में पांच-सात कलाकार होते हैं.
प्रयास से जुड़े मनीष बताते हैं, ''मांग के हिसाब से कलाकारों को बुलाना पड़ता है. कई बार ये एक बंधे-बंधाए पैसे मसलन आठ-10 हज़ार रुपए पर काम करने को तैयार हो जाते हैं. तो कई बार 10 -15 दिन के लिए काम करते हैं.''
गोपालगंज के रहने वाले 26 साल के सचिन एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे. उन्हें पांच हज़ार रुपए की तनख्वाह मिलती थी.
नुक्कड़ नाटक के लिए सचिन ने वह नौकरी छोड़ दी. वो कहते हैं, '' दो महीना यहां जमकर काम करूंगा. उसके बाद 20 हज़ार या उससे ज्यादा रुपए मेरे हाथ में होंगे. फिर दूसरी नौकरी ढूंढ़ लेंगे.''
डिमांड

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दरभंगा के हीरालाल राय के पास फिलहाल राजद, जेडीयू, बीजेपी के उम्मीदवारों का काम है. उनके पास 40 कलाकार हैं, जो आजकल पटना की प्रेमचंद रंगशाला में रियाज कर रहे हैं.
हीरालाल बताते हैं, ''जैसे डिमांड हुई, वैसे नाटकों की टीम भेज देते हैं. एक दिन में पांच-छह शो पार्टी के बताए इलाके में करने पड़ते हैं. एक कलाकार को रोजाना 500 रुपए मिल जाते हैं.''
हालांकि कलाकारों का शोषण आम बात है.
मनीष महीवाल बताते हैं, ''जो एजेंसियां पार्टियों का काम देख रही हैं, वो कई बार कलाकारों को वाजिब पैसा नहीं देती हैं. पार्टी से पैसा पूरा लिया जाता है लेकिन कलाकारों को बहुत कम मिलता है.''
ख़तरों भरा रास्ता

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नुक्कड़ नाटक के जरिए पार्टियों के प्रचार-प्रसार के ख़तरे भी कम नहीं हैं. चूंकि इस विधा में सीधा संवाद होता है. इसलिए लोगों का गुस्सा भी झेलना पड़ता है.
हीरालाल बताते हैं, '' पार्टी तो अपनी तरफ से अपनी स्क्रिप्ट दे देती है जिसमें वो वायदे करती है. जब हम वो संवाद बोलते हैं तो कई बार लोगों का गुस्सा भी झेलना पड़ता है. वो कहते है आप झूठ बोल रहे हैं. ऐसे में हमें लोगों को ये समझाना पड़ता है कि हम बस नाटक करने वाले हैं.''
यही वजह है कि ज्यादातर लोग महिला कलाकारों को टीम में शामिल करने से बचते हैं.
तैयारी

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इस बार के विधानसभा चुनाव में भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) पूरे बिहार में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के ख़िलाफ़ नाटक कर रहा है.
पूरे बिहार में इप्टा की 22 यूनिट बीजेपी भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार और बीजेपी को निशाना बनाते हुए नुक्कड़ नाटक करेंगी.
बिहार इप्टा से जुड़े तनवीर अख्तर कहते हैं, ''हम अपने एजेंडा को जनता के बीच रख रहे हैं. लोगों से कह रहे हैं कि बीजेपी के ख़िलाफ़ जो भी उम्मीदवार आपको मजबूत लगे, उसको वोट दें. अगर लाइक- माइंडेड लोग हमें चाहेंगे तो हम उनके इलाके में भी नाटक करेंगें.''
मुरव्वत
राजनीतिक गलियारों में नुक्कड़ नाटकों की लोकप्रियता की क्या वजह है?
इस सवाल पर 35 साल से रंगमंच से जुड़े शफ़ी अहमद कहते हैं, ''नजरें चार होती है, तो मुरव्वत आ ही जाती है. नुक्कड़ नाटक आपकी आंख में आंख डालकर संवाद करता है. तो जब ये संवाद होता है तो कलाकारों की बात पब्लिक सुनती है.''
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