बिहारः आदिवासियों को टिकट क्यों नहीं?

थारु आदिवासी बच्चे

इमेज स्रोत, Manish Shandilya

इमेज कैप्शन, थारु आदिवासी बच्चे
    • Author, मनीष शांडिल्य
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए

नेपाल की सीमा से लगे बिहार के पश्चिम चंपारण ज़िले के चार प्रखंडों में दो लाख से अधिक थारु लोग रहते हैं, जिन्हें कई दशक तक संघर्ष करने के बाद वर्ष 2003 में अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिला था.

इसी इलाक़े में उरांव जनजाति के लोग भी रहते हैं लेकिन यहां से कोई आदिवासी संसद तो दूर की बात है, विधानसभा तक भी नहीं पहुंच पाया है.

बिहार में साल 2003 के बाद तीन बार विधानसभा और आम चुनाव हो चुके हैं. इस बार भी शायद ही कोई थारु विधानसभा तक पहुंचे.

'कोई पार्टी नहीं देती मौक़ा'

सूबे में एनडीए और महागठबंधन के बीच मुख्य मुक़ाबला माना जा रहा है.

थारु आदिवासियों की बैठक

इमेज स्रोत, Deep

इन दोनों गठबंधन ने किसी थारु को उम्मीदवार नहीं बनाया है. इससे आदिवासियों में काफ़ी नाराज़गी है.

भारतीय थारु कल्याण महासंघ के क्षेत्रीय अध्यक्ष हेमराज पटवारी कहते हैं, ''रोष तो है लेकिन करें तो क्या करें. कोई पार्टी हमें मौक़ा नहीं देती और निर्दलीय चुनाव लड़ते हैं तो हम हार जाते हैं.''

इस इलाक़े में आदिवासियों के लिए कोई सीट आरक्षित भी नहीं है.

वर्ष 2008 में निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन साल 2001 की जनगणना के आधार पर हुआ था. वर्ष 2003 में आदिवासी का दर्जा पाने वाले थारु समुदाय को इससे कोई फ़ायदा नहीं हुआ.

वैसे साल 2011 की जनगणना के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि ज़रूरत के हिसाब से क्षेत्रों का परिसीमन करें.

इस निर्देश के आधार पर भी थारु कल्याण महासंघ आदिवासियों के लिए सीट आरक्षित कराने की कोशिश कर रहा है लेकिन वे अब तक सफल नहीं हो पाए हैं.

'राहुल से की थी मांग'

थारु आदिवासी

इमेज स्रोत, Deep

आदिवासी आबादी का प्रभाव पश्चिमी चंपारण ज़िले के तीन विधानसभा क्षेत्रों बाल्मीकिनगर, रामनगर (सुरक्षित) और सिकटा विधानसभा क्षेत्रों में है.

इनमें से बाल्मीकिनगर और रामनगर में आदिवासी निर्णायक भूमिका में हैं.

इस बार भी थारु आदिवासी अपने संगठन भारतीय थारु कल्याण महासंघ के बैनर तले लगभग हर बड़े दल से मौक़ा देने की मांग कर चुके हैं.

गांव पिपरा दोन के भूपेंद्र प्रसाद बताते हैं, ''हमने कई पार्टियों से मिलकर प्रतिनिधित्व देने की मांग की थी लेकिन हर पार्टी ने अनसुना कर दिया.''

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी 19 सितंबर को पार्टी के समरसता सम्मेलन में रामनगर आए थे.

तब हेमराज पटवारी के नेतृत्व में थारुओं का एक प्रतिनिधिमंडल नुमाइंदगी के सवाल पर राहुल से भी मिला था. लेकिन यह कोशिश भी नाकाम रही.

पंचायत में भी पिछड़े

थारु आदिवासी

इमेज स्रोत, Manish Shandilya

साल 2003 के पहले थारु अति पिछड़ा वर्ग में आते थे. राजनीतिक प्रतिनिधित्व की बात करें तो थारु आदिवासी बनने के बाद पंचायत स्तर पर भी पिछड़ गए हैं.

हेमराज पटवारी बताते हैं, ''पहले हमें पंचायत चुनाव में ओबीसी का आरक्षण मिलता था. लेकिन अब हमें न ओबीसी और न ही आदिवासी दर्जे के आधार पर आरक्षण मिलता है. ऐेसे में हम पंचायत स्तर पर भी पहले के मुकाबले कम चुने जाते हैं.''

आदिवासी का दर्जा मिलने के बाद थारुओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मामले में भले ही अब तक मौका नहीं मिला हो लेकिन सरकारी नौकरियों में उनकी भागीदारी बढ़ी है.

खैरहनी दोन के युवा चंदेश्वर महतो बताते हैं, ''आदिवासी बनने के बाद हमारे लिए अवसर बढ़े हैं. अब सेना, अर्द्धसैनिक बल, रेलवे, बैंक, बिहार सरकार आदि में थारु पहले के मुक़ाबले कहीं ज्यादा संख्या में हैं.''

पांच साल इंतज़ार

थारु आदिवासियों का इलाका

इमेज स्रोत, Manish Shandilya

अब जबकि किसी बड़े दल ने आदिवासी को उम्मीदवार नहीं बनाया है तो माना जा रहा है कि थारुओं को विधानसभा में अपने प्रतिनिधि के लिए और पांच साल का लंबा इंतज़ार करना पड़ेगा.

इस इंतज़ार के कारण थारुओं, खासकर युवाओं में नाराज़गी बढ़ रही है.

ऐसे ही एक युवा चंदेश्वर महतो कहते हैं, ''हम इतनी बड़ी तादाद में वोटर हैं तो हमारा अपना प्रतिनिधि भी होना चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो एक दिन हम विद्रोह भी करेंगे.''

वहीं ढाकनी दोन के देवराज महतो कहते हैं, ''हमारी समस्याओं, हमारे मुद्दों को विधानसभा में रखने वाला कोई नहीं है. इससे हमारा विकास प्रभावित हो रहा है.''

थारुओं के इलाके में विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण में 5 नवंबर को मतदान होगा.

मतदान का बहिष्कार करना है या निर्दलीय चुनाव लड़ना है या फिर किसी और तरीके से अपना विरोध जताना है, इसका फैसला करने के लिए थारु कल्याण महासंघ जल्द ही बैठक करने वाला है.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>