भारत में क्यों बढ़ रही है इंटरनेट पर पाबंदी

- Author, अदिति माल्या
- पदनाम, बीबीसी मॉनिटरिंग
भारत में मोबाइल पर इंटरनेट एक्सेस पर रोक की घटनाएं बढ़ती जा रही है, अधिकारी इसे हिंसा और प्रदर्शन को काबू करने के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं.
ताज़ा उदाहरण भारत प्रशासित कश्मीर का है, जहाँ बीफ़ पर प्रतिबंध की पृष्ठभूमि में मुसलमान ईद मना रहे हैं. गुरुवार से ही मुसलमान बहुल इलाकों में मोबाइल पर इंटरनेट उपलब्ध नहीं है.
अधिकारियों को लगता है कुछ लोग सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक तस्वीरें या प्रतिक्रियाएं डालकर समाज में तनाव पैदा कर सकते हैं.
पाबंदी हुई आम बात

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हालाँकि कश्मीर में इस तरह के बैन लगना कोई नई बात नहीं है. हिंसा या तनाव की हालात में राज्य में अक्सर इंटरनेट पर रोक लगाई जाती है, ख़ासकर चरमपंथियों के ख़िलाफ़ अभियान के दौरान ये आम बात है.
इंटरनेट पर बैन अब सिर्फ़ कश्मीर तक ही सीमित नहीं रहा है, गुजरात में पाटीदार आंदोलन और मणिपुर में प्रदर्शन के दौरान भी राज्य सरकारों ने इस हथियार का इस्तेमाल किया.
पिछले साल सितंबर में वडोदरा में एक फ़ेसबुक पोस्ट की वजह से सांप्रदायिक तनाव भड़क उठा था. पुराने शहर में कई जगहों पर पथराव की घटनाएं हुई थी.

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प्रशासन ने इसके बाद बल्क एसएमएस और व्हाट्सएप पर रोक लगा दी थी, तर्क दिया गया कि अफवाहों के कारण दंगे भड़क सकते हैं.
इसके बाद गुजरात सरकार ने पटेल आंदोलन को ‘नियंत्रित करने के लिए’ इसी महीने मोबाइल पर इंटरनेट सेवा कुछ घंटों के लिए रोक दी थी. इंटरनेट सेवा तब तक बाधित रही जब तक ज़िला प्रशासन आश्वस्त नहीं हो गया कि अब स्थिति नियंत्रण में है.
पाबंदियों की वैधता

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मणिपुर में भूमि क़ानून को लेकर हाल ही में ज़ोरदार प्रदर्शन हुए थे. प्रशासन ने वहाँ भी 1 सितंबर से 9 सितंबर तक मोबाइल इंटरनेट पर रोक लगा दी. मणिपुर में पहली बार मोबाइल पर इंटरनेट सेवा रोकी गई थी.
मणिपुर स्थित ह्यूमन राइट्स अलर्ट के कार्यकारी निदेशक बबलू लोइतोंगबाम ने न्यूज़ पोर्टल स्क्रॉल को बताया कि इंटरनेट पर रोक आधिकारिक रूप से उठाया जाने वाला सही क़दम नहीं है.
उन्होंने कहा, “कभी-कभी ऐसा जानबूझकर किया जाता है. ये चुपचाप किया जाता है और कोई नहीं जानता. लोग सोचते हैं कि ये तकनीकी समस्या है, लेकिन सरकार जब सूचनाएं रोकना चाहती है तो इंटरनेट पर पाबंदी लगा देती है.”
क्या ज़रूरी हैं पाबंदियां?
कई विशेषज्ञ ऐसी पाबंदियों की वैधता पर सवाल उठाते हैं, तो कुछ इन्हें क़ानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए ज़रूरी मानते हैं.

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मोबाइल इंटरनेट पर पाबंदी को चुनौती देती एक याचिका को 15 सितंबर को गुजरात हाईकोर्ट ने ख़ारिज कर दिया था. याचिका में क़ानून व्यवस्था बनाए रखने की दुहाई देकर इंटरनेट पर पाबंदी के राज्य सरकार के अधिकार को चुनौती दी गई थी.
सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर के क़ानूनी निदेशक मिशि चौधरी ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि पाबंदी सरकार का ‘हड़बड़ी में उठाया गया पहला क़दम’ होता है. उन्होंने कहा कि सरकार के पास ऐसी पाबंदियों के लिए कोई क़ानूनी अनुमति नहीं लेती हैं और टेलीकॉम कंपनियां भी इसकी वैधता को चुनौती नहीं देती.
वहीं, सेंटर फ़ॉर इंटरनेट और सोसाइटी के पॉलिसी निदेशक प्रणेश प्रकाश ने इकोनॉमिक टाइम्स से कहा कि सरकार को इंटरनेट पर पाबंदी लगाने की आवश्यकता होती है, लेकिन हिंसा को रोकने के लिए सरकार ‘सदभावना संदेशों’ का सहारा भी ले सकती है.
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