टीवी सीरियल से आया वैदिक खेती का ख़याल!

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- Author, देविंदर शर्मा
- पदनाम, खाद्य नीति विश्लेषक, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
मैंने 'वृक्ष आयुर्वेद' और 'कृषि गीता' पढ़ रखी है और पैदावार में सुधार के लिए आयोजित अग्निहोत्र एवं होम थेरेपी कार्यक्रमों में हिस्सा भी ले चुका हूँ.
समय-समय पर मुझे हैदराबाद के एशियन एग्री हिस्ट्री फ़ाउंडेशन द्वारा प्रकाशित होने वाले तिमाही जर्नल ‘एशियन एग्री हिस्ट्री’ को भी पढ़ने का मौक़ा मिला है.
<link type="page"><caption> पढ़ेंः मेडिटेशन से खेती है 'समय की ज़रूरत' </caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/india/2015/09/150916_raju_bhai_yogic_farming_md.shtml" platform="highweb"/></link>
भारत में खेती-किसानी को लेकर सदियों से मौजूद पारंपरिक ज्ञान के प्रति रुचि होने के नाते मुझे यह कहना पड़ेगा कि जब मैंने पढ़ा कि वैदिक खेती के गुणों के बारे में केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने कुछ कहा है तो मैं हैरान रह गया था.
राधा मोहन सिंह वैदिक कृषि को फिर से चलन में लाने के लिए ब्रह्मकुमारी द्वारा राष्ट्रव्यापी पहल की शुरुआत के अवसर पर बोल रहे थे.
लेकिन मैं उनकी इस बात का मतलब फिर भी नहीं समझ पाया कि “राजयोग की मदद से किसानों में भरोसा बढ़ाया जाए.”
पढ़ें विस्तार से

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लगता है कि ऐसा नतीजा निकालने के लिए उन्होंने पौराणिक कहानियों वाले काफ़ी टीवी सीरियल देख रखे हैं.
हालांकि वैदिक खेती एक ऐसा शब्द है जिसे आम तौर पर पुराने समय से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन तथ्य ये है कि वैदिक खेती के बारे में बहुत कम पता है.
यहां तक कि वेदों में खेती किसानी के बारे में बहुत कम कहा गया है और जो थोड़ा बहुत कुछ कहा गया है वो 'यजुर्वेद' में है.
कृषि पर जो सबसे पुराना दस्तावेज है वो 400 साल ईसा पूर्व लिखे गए 'कृषि प्रसार' में है.
इसके काफ़ी बाद, क़रीब 1000 ईस्वी में सूर्य पाल ने 'वृक्ष आयुर्वेद' लिखा.
दिलचस्प बात ये है कि 'वृक्ष आयुर्वेद' में जितनी विधियां लिखी गई हैं, वो आज भी देश के विभिन्न हिस्सों में चलन में हैं.
जैसे गेहूं पर लगने वाले पीले कीड़ों की ख़तरनाक़ बीमारी से लेकर फफूंद से लगने वाली बीमारियों के इलाज के लिए खट्टी लस्सी के इस्तेमाल की बात इस पुरातन क़िताब में लिखी गई है.
कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में भी खेती के बारे में लिखा गया है. प्राचीन खेती किसानी के बारे में जो कुछ ज्ञात है, वो मध्य युग से संबंधित है.
कीटनाशकों के मुताबिक़ बीज

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लेकिन इसमें कहीं भी ये नहीं लिखा है कि रुहानी ताक़तों से किसानों का भरोसा बढ़ता है. इसीलिए, ‘परमात्मा शक्ति की किरणों से बीजों की क्षमता बढ़ाने' की बात अर्थहीन है.
अगर कृषि मंत्री की दिलचस्पी वाकई बीजों की क्षमता बढ़ाने में है तो उन्हें खेती के परंपरागत तौर तरीक़ों पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जिसे आधुनिक कृषि ने चलन से बाहर कर दिया है.
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में बदलाव को सहने की क्षमता एक ऐसा गुण है जो आधुनिक बीजों से गायब हो चुका है. शायद इसका कारण शोध की प्राथमिकता हो.
शोध संस्थानों में अधिक पैदावार वाले जो बीज विकसित किए जा रहे हैं, उन्हें इस तरह से बनाया जा रहा है कि वो रासायनिक खादों के इस्तेमाल पर ही सही नतीजे दें.
फसलों की नई किस्में रासायनिक कीटनाशकों के अनुरूप हैं, ताकि बीज कंपनियों के व्यावसायिक हित सुरक्षित बने रहें.
शोध पर जोर

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अगर सिर्फ शोध का ज़ोर ‘ऑर्गेनिक ब्रीडिंग’ की ओर कर दिया जाए, जिसमें बीजों को ऑर्गेनिक खेती के क़ाबिल बनाया जाता है, तो बीजों की गुणवत्ता में भारी बदलाव आ जाता और ये बीज जलवायु परिवर्तन से मुक़ाबला करने के लिए बेहतर गुणों से लैस होते.
केवल बीज ही नहीं, बल्कि बीमारियों के इलाज को लेकर भी बहुत सारी जानकारियां मौजूद हैं.
कीटों में संतुलन स्थापित करके हानिकारक कीटों को नियंत्रित करने के लिए लाभकारी कीटों के इस्तेमाल के बारे में पुरानी क़िताबों में विस्तार से लिखा गया है.
पंजाब और हरियाणा में कपास पर लगने वाले सफेद रंग के कीटों के कारण पड़ने वाले विनाशकारी असर के बीच हरियाणा के जींद ज़िले के कुछ गाँव इस पर नियंत्रण पाने का असरदार तरीक़ा दिखा चुके हैं.
खेती के पुराने तौर तरीक़े

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निदाना गाँव के आस-पास के 18 गाँव बिना कीटनाशक के अच्छी फसल पैदा करने का उदाहरण बन गए हैं.
यहां महिला किसान कीटों की संख्या को नियंत्रित कर इस बात को सुनिश्चित कर रही हैं कि रासायनिक या जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल बिल्कुल न किया जाए.
इंडियन काउंसिल फ़ॉर एग्रीकल्चर रिसर्च ने तो परंपरागत खेती के तौर तरीकों पर हुए शोध को चार खंडों में प्रकाशित किया है. इन्हें जांच पड़ताल में सही और फायदेमंद पाया गया है.
अहमदाबाद के ‘हनीबी’ नेटवर्क ने भी इस तरह के तौर-तरीक़ों पर काफ़ी शोध किया है.
इस तरह के अधिकांश तौर तरीक़े पुराने और मध्ययुग में इस्तेमाल किए जाते थे और सालों से उसी उत्साह के साथ अभी भी इस्तेमाल किए जाते हैं.
लेकिन, दुर्भाग्य से, अधिकांश कृषि वैज्ञानिक इन प्रकाशनों से परिचित भी नहीं हैं.
इसीलिए आज सबसे बड़ी चुनौती है कि आधुनिक तकनीक के साथ परम्परागत खेती के तौर तरीक़ों को शामिल कर भारत में होने वाले कृषि शोधों में सुधार किया जाए.
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