अज़ीज़ से मुलाक़ात पर अलगाववादी सर्द

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- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
भारत-पाकिस्तान की होने वाली बातचीत में कश्मीरी अलगाववादियों को शामिल करने की पाकिस्तान की ताबड़तोड़ कोशिशें विफल होती दिख रही हैं.
नज़रबंदी हटा दिए जाने के बाद भी कश्मीरी अलगाववादी पाकिस्तानी सुरक्षा सलाहकार से भेंट में टालमटोल करते नज़र आ रहे हैं.
भारत में पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने अलगाववादी नेताओं को सरताज अज़ीज़ से मिलने की दावत दी है.
अज़ीज भारत के राष्ट्रीय सलाहकार अजीत कुमार डोभाल से रविवार को मुलाक़ात करने वाले हैं.
नाटकीय तरीक़े से पहले गिरफ़्तार और बाद में रिहा किए जाने के बाद अधिकतर अलगाववादी नेताओं ने या तो अज़ीज़ के साथ अपनी बैठक के समय में परिवर्तन कर दिया है या फिर उसे स्थगित कर दिया है.
जहां अलगाववादियों के इस क़दम को भारत आ रहे पाकिस्तानी मेहमान से मिलने की अनिच्छा के तौर पर देखा जा सकता है, वहीं भारतीय विदेश मंत्रालय को इससे बहुत राहत हासिल हुई होगी जिसने 'गुपचुप' तौर पर इस बात का इज़हार कर दिया था कि वो अलगाववादियों और पाकिस्तानी पक्ष की भेंट के ख़िलाफ़ है.
कुछ की हां, कुछ की ना

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लिबरेशन फ्रंट के प्रमुख यासीन मलिक सरताज अज़ीज़ से मिलने के लिए ख़ुद नहीं जा रहे हैं, हालांकि उन्होंने बैठक के लिए अपने संगठन के कम जाने जाने वाले लोगों का एक प्रतिनिधिमंडल भेजने का फैसला किया है.
वहीं हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी ने सुरक्षा सलाहकारों की बैठक के एक दिन बाद यानी सोमवार को सरताज अज़ीज़ से मिलने का कहा है.
मलिक ने बैठक में ख़ुद शामिल नहीं होने की कोई वजह नहीं बताई है.
वहीं हुर्रियत के नेता अयाज़ अकबर ने कहा, ''हम रविवार को एक रैली करने वाले हैं, ऐसे में सैयद गिलानी के लिए 23 अगस्त को कश्मीर से बाहर जाना मुमकिन नहीं है.''
उन्होंने आगे बताया, ''हमने पाकिस्तानी उच्चायुक्त अब्दुल बासित को इसकी जानकारी दे दी है.''
हालांकि अवामी एक्शन कमेटी के प्रमुख मीरवाइज़ उमर रविवार को अज़ीज़ से मिल रहे हैं, उनके कार्यालय सचिव ने बीबीसी को यह जानकारी दी.
'अलगाववादियों का असर ...'

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अलगाववादी नेताओं ने जिस तरह से सरताज अज़ीज से मिलने के समय में परिवर्तन किया है उसे अलग-अलग रूप में देखा जा रहा है.
राज्य में पीडीपी-बीजेपी सरकार के प्रवक्ता नईम अख़्तर कहते हैं, ''कुछ संवादहीनता थी. हम उन्हें अज़ीज़ से मिलने से रोकना नहीं चाहते थे.''
वहीं सरकार के अन्य वरिष्ठ नेता ने पहले ही कहा था कि उन्हें ''उम्मीद है कि अलगाववादी नेता अपने विकल्पों पर अच्छी तरह ज़रूर विचार करेंगे.''
पीडीपी नेता रफी मीर ने बीबीसी से कहा, ''वो कोई भी फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन मुझे यकीन है कि वो एक बेहतर रास्ता चुनेंगे. वो देख चुके हैं कि दोनों मुल्कों की द्विपक्षीय बातचीत में उनके शामिल होने की कोशिश का क्या असर होता है.''
कोई पहली बार नहीं हो रहा

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पूर्व में दोनों मुल्कों के विदेश सचिवों की बैठक कश्मीरी अलगाववादियों की पाकिस्तानी अधिकारी से मुलाक़ात के नाम पर रद्द हो चुकी है.
कश्मीरी नेताओं ने पाकिस्तान के दिल्ली दूतावास की ईद मिलन पार्टी का ये कहकर बहिष्कार किया था कि उफ़ा में दोनों मुल्कों के बीच हुई बातचीत में उनकी अनदेखी की गई थी.
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाकिस्तान की अलगाववादी नेताओं से मुलाक़ात के विरोध पर भारतीय मीडिया के एक हिस्से ने सवाल उठाया है.
ऐसी मुलाक़ातें दशकों से होती रही हैं. हाल की कांग्रेस या अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों ने कभी भी इन मुलाक़ातों पर कोई सवाल नहीं उठाया था.
संक्षिप्त में इन मुलाक़ातों को एक प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है जिसमें पाकिस्तान कश्मीर मामले पर त्रिपक्षीय वार्ता की बात कहता रहा है. ये बात वो पिछले 25 वर्षों से कह रहा है.
भारत न सिर्फ़ ख़ास अंदाज़ में कश्मीरी नेताओं को बुलाए जाने पर ऐतराज़ करता है बल्कि 1972 शिमला समझौते का हवाला देकर ये भी कहता है कि दोनों मुल्क इस बात पर राजी हो चुके हैं कि दोनों की बातचीत में किसी तीसरे को शामिल नहीं किया जाएगा.
लेकिन भारत की पिछली सरकारें कश्मीरी नेताओं की बैठक के दौरान पाकिस्तानियों से मुलाकातों को रस्म अदायगी के तौर पर देखती रही है.
तस्वीर ख़िचवाने का मौक़ा भर

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पिछले 20 वर्षों में कश्मीर में चार अलग-अलग सरकारों का शासन रहा है. जिस बीच भारत-समर्थित राजनीति के चलते एक नए राजनीतिक वर्ग का उदय हुआ है जिसका प्रतिनिधित्व अब्दुल्ला और मुफ़्ती जैसे लोग करते हैं.
एक युवा नेता ने नाम न प्रकाशित किए जाने की शर्त पर कहा, ''अगर भारत सरकार उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती जैसे नेताओं को वार्ता में शामिल करने पर ज़ोर नहीं देती तो पाकिस्तान ऐसा क्यों करता है.''
हालांकि यहां कुछ लोगों का मानना है कि अलगाववादियों को इस बात का एहसास हो गया है कि पाकिस्तानी नेताओं से बैठकों के दौरान तस्वीरें खिंचवाने से उनके मक़सद को कोई बल नहीं मिलता.
एक अलगाववादी नेता ने नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर कहा, ''हमारा आंदोलन बातचीत की टेबल पर एक सीट हासिल करने की जद्दोजहद तक सीमित होकर रह गया है. हालांकि हमें यक़ीन है कि आख़िरी फ़ैसला दोनों चचेरे भाई ही मिलकर करेंगे और हमारा इस्तेमाल महज़ गवाह के तौर पर किया जाएगा.''
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