एक कश्मीरी के नज़रिए से ओएलएक्स विज्ञापन

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- Author, बशीर मंज़र
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
मैं कश्मीर में रहते हुए शायद ही कभी टीवी देखता हूँ, लेकिन जब मैं कश्मीर से बाहर होता हूं तो होटल के कमरे में बैठा-बैठा टीवी चैनलों पर नज़र दौड़ा लेता हूँ.
कुछ दिन पहले जब मैं दिल्ली गया था तो ऐसे ही एक होटल के कमरे में टीवी देखते हुए मेरी नज़र ओएलएक्स के विज्ञापन पर गई.
यह विज्ञापन कश्मीर में फिल्माया गया था. इसे देखकर मैं पागलों की तरह हंसने लगा था.
इसे देखकर ऐसा लगता है कि विज्ञापन बनाने वालों को कश्मीरियों और भारतीय फ़ौज के रिश्तों के बारे में कोई समझ नहीं है.
अगर यह विज्ञापन सत्तर या अस्सी के दशक में बना होता तो इसके कुछ मायने भी समझ में आते, लेकिन आज के कश्मीर में यह एक बढ़िया कॉमेडी से ज्यादा कुछ नहीं है.
विज्ञापन में एक विनम्र सा दिखने वाला फिरन पहने कश्मीरी नौजवान (दिलचस्प रूप से मेरे ही नाम वाला) तार से घिरे फ़ौजी कैंप की ओर दौड़ा चला आ रहा है.
हक़ीकत से दूर

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वो व्यक्ति अपने फ़ौजी दोस्त को अपने स्मार्टफ़ोन पर फ़ौजी के घर जन्मे नवजात की तस्वीर दिखाना चाहता है.
क्योंकि फ़ौजी ने अपनी बेटी को देखने की इच्छा अपने इस कश्मीरी दोस्त से जताई थी.
यह स्मार्टफ़ोन उसने ओएलएक्स सेवा की मदद से पुराने फ़ोन को बेचकर खरीदा है. लेकिन यह विज्ञापन ज़मीनी हक़ीकत से कोसों दूर है.
वजह

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इसकी एक वजह यह है कि अगर फिरन पहना और दाढ़ी रखा हुआ कोई कश्मीरी नौजवान फ़ौजी कैंप की ओर दौड़ा चला जा रहा तो उसे गोली मार दिया जाएगा.
यह आज के कश्मीर की हक़ीकत है.
दूसरी वजह यह है कि कश्मीरी और फ़ौज के बीच कोई दोस्ती नहीं हो सकती. हां कभी-कभार फ़ौजी कैंप के पास रहने वालों का हाय-हैलो भले किसी फ़ौजी से हो सकता है.
लेकिन उस तरह की दोस्ती नहीं हो सकती जैसा विज्ञापन में दिखाया गया है.
कश्मीर में कोई बशीर अपनी जान जोखिम में डालकर फ़ौजी कैंप की ओर नहीं जाएगा.
तल्खी भरा रिश्ता

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फ़ौज और आम कश्मीरी अवाम के बीच रिश्ता काफ़ी तल्खी भरा है.
चरमपंथ के ख़िलाफ़ लड़ते हुए फ़ौज यहां आम अवाम के साथ सीधे तौर पर टकराव की स्थिति में आ गई है.
फ़ौज यहां कश्मीरियों को चरमपंथी, चरमपंथियों का शुभचिंतक और मुखबिर के रूप में सक्रिय चरमपंथी के तौर पर शक़ की निगाह से देखती है.
कश्मीरी लोग फ़ौज को अपना दोस्त नहीं दुश्मन मानते हैं.
हाल के दिनों में फ़ौज ने आम लोगों के साथ बढ़ती दूरी को कम करने के लिए ऑपरेशन सद्भावना शुरू किया है.
इसका नारा है जवान और अवाम, अमन है मुक़ाम. लेकिन यह मिलाप अभी भी दूर की कौड़ी लगती है.
नई दिल्ली में बैठी सरकार भले माने या ना माने लेकिन मानवाधिकार के मामले में फ़ौज का रिकॉर्ड सीआरपीएफ़, बीएसएफ़ और पुलिस से बेहतर नहीं है.
माफ़ीनामा

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जख़्मी कश्मीरी मानस को सद्भावना ऑपरेशन से कही अधिक की ज़रूरत है.
कश्मीरियों के लिए यह आसान नहीं है कि वे कुनानपोशपोरा सामूहिक बलात्कार, पुलिस हिरासत में हत्याओं, अत्याचार और अपमान को भूल जाएं.
कोई भी बशीर, राजेश जैसे किसी भी फ़ौजी को उसके घर जन्मे बच्चे की तस्वीर दिखाने का जोख़िम ले सकता है, लेकिन इसमें वक़्त लगेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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