जब 'न्यूटन' फ़िज़िक्स को छोड़ बने चरमपंथी

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- Author, हाज़िक़ क़ादरी
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिन्दी डॉट कॉम के लिए
भारत प्रशासित कश्मीर के तराल इलाक़े में बीती मई के एक दिन 19 साल के इसहाक़ अहमद घर से क़ॉलेज में दाखिले का फ़ॉर्म जमा करने के लिए निकले. घर वाले खुश थे. जानने वाले अपने बच्चों को उनकी मिसाल देते थे.
मैट्रिक के परीक्षा में उन्हें 98.4 फ़ीसदी नंबर मिले थे. एक तो दिमाग़ तेज़ उपर से नाम मिलता जुलता जाने माने वैज्ञानिक आइसेक न्यूटन से. सो वो इसहाक़ से आइसेक और आइसेक से ''न्यूटन'' पुकारे जाने लगे.
पर घर से निकले ''न्यूटन'' कॉलेज नहीं गए. ''न्यूटन'' ने पिता की तर्ज़ पर सरकारी नौकरी और मिडिल क्लास लाइफ़ भी नहीं सोची.
बाद में पता चला कि वो पिता के चचेरे भाई के चरमपंथी गुट में शामिल हो गए हैं.
पुलिस के रिर्काड के अनुसार ''न्यूटन'' हिज़बुल मुजाहिदीन में जा मिले.
कश्मीर पुलिस के एक सर्वे के मुताबिक़, कश्मीर में मौजूद 142 चरमपंथियों में 88 चरमपंथी कश्मीर के स्थानीय निवासी हैं.
इन 88 चरमपंथियों में 33 इसी साल चरमपंथी गुटों में शामिल हुए हैं.
ताल्लुक

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पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक़, सिर्फ इस एक साल में 44 नौजवान दक्षिण कश्मीर में लापता हुए हैं.
इनमें से 12 तो वापस आ चुके हैं जबकि 30 नौजवान चरमपंथी गुटों में शामिल हो चुके हैं और दो के बारे में पुलिस को कुछ भी पता नहीं चल पाया है.
इसी तरह से उत्तर कश्मीर में 69 चरमपंथियों में से 25 स्थानीय लड़के हैं.
कश्मीर पुलिस के एक सर्वे के मुताबिक़ ये नौजवान अच्छे पढ़े-लिखे, नौकरीपेशा और अच्छे परिवार से ताल्लुक रखते हैं.
पिछले साल 20 नवंबर को हिज़बुल मुजाहिदीन के तीन चरमपंथी पुलवामा ज़िले में सुरक्षाबलों की गोलीबारी में मारे गए थे.
इनमें से एक चरमपंथी की पहचान शेराज़ अहमद ग़नी के रूप में की गई थी.
उनके परिवार वालों के मुताबिक़, शेराज़ ने इकॉनॉमिक्स में एमए किया था, नेट की परीक्षा पास की थी और पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था.
शेराज़ ने सरकारी नौकरी का एक ऑफ़र भी ठुकरा दिया था.
चुनौती

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राजनीतिक विश्लेषक वाहिद रहमान पारा का कहना है कि चरमपंथी गुटों में नौजवानों की नई खेप के शामिल होने का कारण राजनीतिक अस्थिरता और उनका नहीं सुने जाने वाला असंतोष था.
सोशल मीडिया इन चरमपंथियों का नया ठिकाना है. इस महीने की शुरुआत में फ़ेसबुक पर एक तस्वीर डाली गई थी जिसमें 11 चरमपंथी राइफ़ल के साथ दिखाई दे रहे हैं.
कई फ़ेसबुक पेज भी हैं, जिनपर इन नौजवान चरमपंथियों की तस्वीरें डाली गई हैं.
नब्बे के दशक में चरमपंथी अपना चेहरा छुपाते थे और ज़्यादातर उनमें से अज्ञात होते थे, लेकिन इसके उलट अब ये नौजवान लड़के खुलेआम अपना चेहरा दिखा रहे हैं.
आत्ममंथन

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नॉर्दर्न कमांड के लेफ्टिनेट जनरल डीएस डूडा का कहना है, "अवसर की कमी और अलगाव की भावना की वजह से स्थानीय नौजवानों का बंदूक उठाना ऐसी त्रासदी है जिस पर हम आंखे नहीं बंद कर सकते."
उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि सीमापार से घुसपैठ नहीं हो रही है इसके बावजूद चरमपंथी गुटों में स्थानीय नौजवानों का शामिल होना चिंता की बात है और इस पर आत्ममंथन होना चाहिए.
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