कश्मीर में चरमपंथियों का वीडियो वायरल

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- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
भारत प्रशासित कश्मीर में सेना की वर्दी पहने, हाथ में ऑटोमैटिक बंदूक लिए एक दर्ज़न लड़कों का वीडियो वायरल हो गया है.
ये वीडियो सोमवार शाम फ़ेसबुक पर पोस्ट किया गया था. अधिकारियों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर पुलिस की साइबर सेल इस मामले की जांच कर रही है.
वीडियो में जो लड़के दिख रहे हैं उन्होंने सेना की वर्दी और फ़ैशनेबल घड़ियां पहनी हैं. वो हाथों में एके-47 राइफ़ल लिए दिखते हैं.

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इससे पहले इन लड़कों का एक फ़ोटो फ़ेसबुक और ट्विटर पर आ चुका है. इससे कम से कम कश्मीर के ग्रामीण इलाकों में चरमपंथ के फिर से खड़े होने के संकेत मिलते हैं.
पुलिस सूत्रों का कहना है कि वीडियो में दिख रहे 11 लड़के हाल ही में चरमपंथी संगठन हिज़्बुल मुजाहिदीन से जुड़े हैं. हालांकि हिज़्बुल ने इन लड़कों के बारे में कुछ नहीं कहा है.
पुलिस का कोई अधिकारी बात करने को तैयार नहीं है लेकिन कई ख़बरों में कहा गया है कि इनमें नसीर भी है जो जम्मू-कश्मीर पुलिस के भगोड़े हैं.
नसीर पहले अलताफ़ बुखारी के सुरक्षाकर्मी थे. बुखारी पीडीपी-भाजपा सरकार में मंत्री हैं.
'बात बनेगी बोली से'

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दक्षिण कश्मीर के एक अधिकारी कहते हैं, "इससे सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े हो गए हैं और अभी चल रही अमरनाथ यात्रा के रास्ते में चौकसी बढ़ा दी है."
पुलिस सूत्रों का मानना है कि वीडियो शोपियां या पुलवामा में शूट किया गया है. ये दोनों ज़िले दक्षिण कश्मीर में चरमपंथियों के मज़बूत केंद्र समझे जाते हैं.
चरमपंथियों की इस पोस्ट पर आई ज़्यादातर टिप्पणियों में उनकी तारीफ़ की गई है. जबकि कुछ मुसलमानों और हिंदुओं ने "मासूम लड़कों के चरमपंथियों के हाथ का मुहरा" बनने पर हैरानी जताई है.

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सोमवार को ही मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने कहा था कि कश्मीर की समस्या बातचीत से हल होगी, गोली से नहीं. उन्होंने कहा था, "गन से न गोली से, बात बनेगी बोली से."
बीते कुछ सालों में प्रभावी ढंग से खुफिया जानकारी जुटाने और सुरक्षाबलों की चरमपंथ के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई से भारत प्रशासित कश्मीर में चरमपंथी घटनाओं में कमी आई है.
कभी कश्मीर की सड़कों पर चरमपंथी फ़्लैग मार्च किया करते थे लेकिन ये जल्दी ही ख़त्म हो गया और चरमपंथी अपने ठिकानों में छिप गए.
नाम न छापने की शर्त पर एक आला पुलिस अधिकारी ने कहा, "दो दशकों में पहली बार कश्मीरी चरमपंथी भारतीय सुरक्षाबलों को ललकार रहे हैं. वो मौजूदगी दिखा रहे हैं और हम अपना काम करेंगे."
'युवाओं को मजबूर न करें'

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विश्लेषकों का कहना है कि टेलीविज़न और सोशल मीडिया पर चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट दिखने से असल में चरमपंथ मोहक नज़र आ रहा है और कश्मीरी युवा इस नए चलन से शायद जुड़ सकते हैं.
श्रीनगर के फ़िल्म निर्माता शफ़ात फ़ारुक़ कहते हैं, "वीडियो में दिख रहे लड़कों में एक का नाम बुरहान है. साल 2010 में उसकी बग़ैर किसी ग़लती के बुरी तरह से पिटाई हुई थी. अब वो बदला लेना चाहता है. उसका भाई भी हाल ही में मारा गया. उसका भी कोई चरमपंथी अतीत नहीं था.''
वो आगे कहते हैं, ''अगर सरकार चाहती है कि अफ़ग़ानिस्तान और इराक का यहां असर न हो तो उसे युवाओं को मजबूर नहीं करना चाहिए."

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चरमपंथ के बढ़ते ख़तरे से अलगाववादी भी सतर्क हैं. लेकिन वो मानते हैं कि ये असल में 2010 में विरोध प्रदर्शनों को 'क्रूर ढंग से दबाने' का नतीजा है.
अलगाववादी नेता यासिन मलिक कहते हैं, "20 साल बाद कश्मीरी युवा हिंसा से अहिंसा की ओर मुड़ रहे थे. लेकिन अहिंसा का जवाब 120 निहत्थे प्रदर्शनकारियों को मार कर दिया गया.
यासिन मलिक पहले चरमपंथी रहे हैं. साल 1994 में उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया था.
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