'क्या अब हमारी भाषा भी लूट लेंगे'?

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- Author, मानसी दाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
कोक स्टूडियो ने पश्चिम ओडिशा के गीत <link type="page"><caption> 'रौन्गौबौती’</caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=LY_rMXXuJp8" platform="highweb"/></link> को जब पेश किया तो इसे लेकर ओडिशा में और इंटरनेट पर काफी चर्चा हुई.
एक ओर कुछ लोगों ने गीत के मूल बोल को तोड़-मरोड़ कर पेश करने की निंदा की, लेखक से इसके लिए इजाज़त नहीं लेने की बात की, तो दूसरी ओर इसे संबलपुरी अस्मिता को ठेस पहुंचाने की कोशिश कहा गया.
मैं खुद ओडिशा के बोउद ज़िले से हूं और मैंने संबलपुर में पढ़ाई की है.
इस गीत से मेरा नाता बेहद पुराना है. मैंने भी इस रीमिक्स को सुना है.
कोक स्टूडियो ने 'रौन्गौबौती' गीत को तमिल रैप और लोकप्रिय ओडिया भाषा का गीत 'बंदे उत्कल जननी' के <link type="page"><caption> साथ गाया</caption><url href="https://www.youtube.com/watch?v=LY_rMXXuJp8 " platform="highweb"/></link> है.
'बंदे उत्कल जननी' को इस गीत के साथ क्यों जोड़ा गया यह समझना थोड़ा मुश्किल है.
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'रौन्गौबौती' एक बेहद रोमांटिक संबलपुरी गीत है. जबकि 'बंदे उत्कल जननी' को ओडिशा में 'राज्य गीत' माना जाता है.
इससे वे लोग तो नाराज़ हैं जो मानते हैं कि इन दो गीतों के भाव बेहद अलग हैं, वे भी नाराज़ हैं जो कहते हैं कि 'राज्य गीत' के साथ खिलवाड़ करना ठीक नहीं.
लेकिन इस गीत को लेकर उपजे विवाद की जड़ें केवल कॉपीराइट के मसले या भाषा को तोड़-मोड़ कर पेश करने तक ही सीमित नहीं, बल्कि ये कहीं न कहीं 50-60 साल की अवहेलना और विकास के मुद्दे से जुड़ी हैं.
यह ज़रूरी है कि इस विवाद को उसी संदर्भ में समझा जाए, क्यों यह गीत, गीत न रह कर एक इलाके की पहचान का मुद्दा बन गया.
जिन 4 मुद्दों के इर्द-गिर्द यह विवाद जन्म लेता है, वे हैं: यह लोकगीत नहीं है; ये ओडिया गीत भी नहीं है; इससे 75 लाख लोगों की अवहेलना होती है; और आखिर विकास कहां है?
ये वाकई लोकगीत है?

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कोक स्टूडियो 'रौन्गौबौती' को ओडिशा के संबलपुर अंचल का बेहद पुराना (सिन्स टाइम इममेमोरियल) गीत बताता है.
गायिका सोना मोहापात्रा के अनुसार यह <link type="page"><caption> लोकगीत है</caption><url href="http://www.bbc.com/hindi/entertainment/2015/07/150716_sonamahapatra_rangbati_spk" platform="highweb"/></link> और इस तरह के लोकगीतों के बारे में 'बहुत कम लोग जानते हैं'.
लोकगीत की <link type="page"><caption> परिभाषा देखें</caption><url href="http://www.folksinging.org/what-is-s-folksong.asp" platform="highweb"/></link> तो यह किसी एक अंचल में गाया जाने वाला और मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाने वाला गीत होता है और कई रूपों में गाया जाता है.
संबलपुर में प्रचलित रौसौरकेली, डालखाई, माऐला जौड़ौ गीतों को इस श्रेणी में रखा जा सकता है. 1970 के दशक में लिखे और गाए गए 'रौन्गौबौती' को लोकगीत कहना शायद ठीक नहीं होगा.
आकाशवाणी <link type="page"><caption> संबलपुर</caption><url href="http://www.airsambalpur.org/" platform="highweb"/></link> के 'कुरे फूलौर झूम्पा' कार्यक्रम के लिए मित्रभानु गौंतिया के लिखे इस गाने को जीतेंद्रिय हरिपाल और कृष्णा पटेल की आवाज़ में रिकॉर्ड किया गया था.
प्रभुदत्त प्रधान के निर्देशन में इसे संगीतबद्ध किया गया था.
बाद में कोलकाता की कंपनी इंड्रेको ने इसे कैसेट के रूप में रिकॉर्ड किया जिसके बाद यह बहुत लोकप्रिय हुआ.

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आकाशवाणी संबलपुर के पूर्व प्रस्तुतकर्ता कुबेर मेहेर कहते हैं, "रौन्गौबौती लोकगीत बनेगा लेकिन अभी इसमें वक्त है. इस गीत को बनाने वाली पूरी टीम के सदस्य अभी जीवित हैं. कम से कम इजाज़त तो ले लेते कोक स्टूडियो के लोग."
संबलपुरी गीत क्यों?
संबलपुर और इससे सटे इलाकों को कोशल अंचल के रूप में समझा जाता है. यहां लोगों का मानना है कि भाषा के ग़लत उच्चारण के कारण उसका मूल भाव ख़त्म हो गया. इसे ग़लत गाने से इस अंचल के स्वाभिमान को भी ठेस पंहुची है.
ओडिशा को इलाके के लोग दो हिस्सों में बंटे हुए दिखते हैं- सागर तटीय इलाके और पठारी क्षेत्र जिनमें सांस्कृतिक और भाषागत भिन्नताएं तो हैं ही, विकास के स्तर पर भी भिन्नताएं देखी जा सकती हैं.
इस आधार पर ओडिशा राज्य से अलग कोशल इलाके की मांग काफी समय से होती आई है. संबलपुर, कालाहांडी, बलांगिर, नुआपौड़ा, सोनपुर, बोउद, देबगढ़, बरगढ़, झारसुगुड़ा, सुंदरगढ़ ओंगुल जिलों और कुछ हिस्सों को लेकर अलग राज्य की बात भी लंबे अरसे से होती रही है.

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मुझे याद है कि 1999-2000 से इसे लेकर छोटे-बड़े प्रदर्शन होते आए हैं.
इलाके के लोग अपनी भाषा को ओडिया भाषा मानने से इनकार करते हैं और इसकी अलग पहचान की कोशिशों में भी लगे हैं.
संबलपुरी भाषा (या कहें कोशली भाषा) को सरकारी भाषा के रूप में मान्यता दिलाने की कई बार मांग हुई है.
शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले मानते हैं कि संबलपुर और इससे सटे इलाक़ों में बच्चों पर राज्य की ओडिया भाषा थोपी गई है.
पढ़ाई करने के लिए यहां के लोगों को अपनी मातृभाषा से अलग भाषा सीखनी पड़ती है, जो कि पढ़ाई में पिछड़ने का बड़ा कारण है. समाधान की खोज में 1997-1998 के दौरान कई समाजसेवी संस्थाओं ने अनौपचारिक स्कूलों में संबलपुरी भाषा में पाठ्यक्रम शुरू किया था.
अन्वेषा पत्रिका के संपादक और कवि सरोज मोहंती कहते हैं कि ओडिया भाषा को कोशली के ऊपर लादा जा रहा है जो सही नहीं है.

कुछ लोग इसे कोशली भाषा को ख़त्म करने की साज़िश के रूप में भी देखते हैं.
भाषा की अवहेलना
झारखंड से सटे इन ज़िलों में 'कोशली' और 'हो' भाषा की मान्यता के लिए मांग को देखते हुए, हाल ही में संविधान के आठवें अनुच्छेद में इनको शामिल करने के लिए राज्य सरकार की तरफ से केंद्र को चिट्ठी लिखी गई है.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार पश्चिम ओडिशा के 75 लाख लोगों की मातृभाषा कोशली है.
लोगों का मानना है कि कोक स्टूडियो ने इस गीत को ओडिया कह कर इतने लोगों का अपमान तो किया ही है, साथ ही इस गीत से इसका मूल परिचय छीन कर इस पर ओडिया भाषा थोपने का प्रयास किया है.

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मेहेर पूछते हैं, "क्या उन्हें इसे संबलपुरी गीत कहने में बुरा लगता है ? ये ओडिया गीत तो नहीं है."
'विकास में पक्षपात'
पश्चिम ओडिशा में <link type="page"><caption> वे ज़िले हैं</caption><url href="http://www.portal.gsi.gov.in/gsiImages/information/orissa-map.gif" platform="highweb"/></link> जहां से जंगलजात द्रव्य और खनिज पाये जाते हैं.
ये इलाके खनन लीज़ और तेंदू पत्ते के ज़रिए सरकारी राजस्व के एक बड़े हिस्से की प्राप्ति के लिए भी जाने जाते है.
विभिन्न प्रोजेक्ट को लेकर विस्थापन की समस्या, खनन और उससे संबंधित इंडस्ट्री के कारण हुए नुक़सान को लेकर इस इलाके के लोगों में असंतोष है.

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राज्य सरकार पर दशकों से इन इलाकों की अवहेलना के आरोप लगे हैं.
सरोज कहते हैं, "विकास तो कटक, भुवनेश्वर, पुरी, खुर्दा, बालेश्वर और कुछ गिने चुने इलाकों तक ही सीमित है. विकास की मांग को देखते हुए सरकार ने 15-20 साल पहले पश्चिम ओडिशा <link type="page"><caption> विकास परिषद</caption><url href="http://www.wodcorissa.org/about.htm" platform="highweb"/></link> का गठन तो कर दिया, लेकिन उसका दफ़्तर आज भी भुवनेश्वर में है."
'स्वाभिमान पर चोट'
ऐसे में एक लंबे अरसे से अवहेलना के शिकार हुए लोगों को लगता है कि भाषा को सम्मान न देना और उसे ग़लत तरीके से पेश किया जाना, उनके स्वाभिमान पर चोट है.
बात अब केवल एक गीत की नहीं रह गई है. यह उन 75 लाख लोगों के सम्मान का सवाल बन गया है जो दो दशक से अधिक समय से अपनी इसी पहचान के लिए जूझ रहे हैं.
उन्हें लगता है कि इस रीमिक्स के साथ उनके अस्तित्व को आज एक बार फिर झुठलाने की कोशिश की गई.
कुबेर मेहेर के शब्दों में "क्या अब हमारी भाषा भी लूट लेंगे, क्या आज भी हमें अनादर ही मिलेगा?"
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