फुलझड़ी, फेंकनी, चिंता..ऐसे क्यों हैं नाम?

अनुष्का शर्मा, पीके, फ़िल्म, हिरोइन
इमेज कैप्शन, अनुष्का शर्मा ने फ़िल्म 'पीके' में पत्रकार जग्गू का किरदार निभाया था.
    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी के लिए

फ़िल्म 'पीके' में हिरोइन अनुष्का शर्मा को अपना नाम जगत जननी साहनी पसंद नहीं होता. परेशान होकर वो अपना नाम बदलकर जग्गू रख लेती हैं. फ़िल्म दौड़ में हिरोइन उर्मिला मतोंडकर का नाम दया शंकर था.

फ़िल्मों में अटपटे नाम दर्शकों को गुदगुदाने के लिए ही रखे जाते हैं लेकिन असल ज़िंदगी में ऐसी कई महिलाएँ हैं जिनके नाम लोगों को अटपटे लगते हैं. नेपाल के चिकनी गांव की फेंकनी देवी उनमें से एक है.

60 साल की फेंकनी बताती हैं, “जब पैदा हुए तो कोई बीमारी थी सो घरवाले नदी के पास फेंक आए. पास-पड़ोस के किसी परिवार ने पाला. जब ठीक हो गए तो पिताजी घर ले आए. मां ने पैदा होते फेंक दिया था सो नाम पड़ गया फेंकनी.”

अटपटे नामों के पीछे सांस्कृतिक रूढ़ियाँ या दूसरे सामाजिक और आर्थिक कारण होते हैं. लेकिन अब ऐसे नाम कम होते जा रहे हैं.

'समधिन को श्रीदेवी कहेंगे'

फेंकनी देवी और स्नेहलता

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फेंकनी ने अपनी बेटी का नाम स्नेहलता रखा है. स्नेहलता बताती हैं, “जब शादी हुई तो मेरे ससुर ने पूछा, फेंकनी देवी कौन सा नाम है. चूंकि मां सुंदर थी तो उन्होंने कहा कि हम अपनी समधिन को श्रीदेवी कहेंगे. मां ने मेरा नाम बहुत प्यारा रखा.”

नामों के इस बदलते स्वरूप पर समाजशास्त्री हेतुकर झा कहते हैं, “पहले नाम ऐसे रखे जाते थे जो आपकी जाति और हैसियत दोनों से मैच करे. लेकिन अब नाम में आपको बहुत परिवर्तन मिलेगा. इसकी दो वजहें हैं- पहला तो टीवी, फिल्मों, अखबारों के ज़रिए मिल रहे तमाम नामों का असर. दूसरा समुदाय या गांव का बंधन टूट रहा है. इंडिविजुअलिटी पर ज़ोर बढ़ा है.”

'अजीब लगता था'

फुलझडी देवी, ख़ुशबू, बिहार

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फुलझड़ी देवी पटना से सटे सिपारा की रहने वाली हैं.

उन्होने बीबीसी हिन्दी को बताया, “इस उम्र में कोई फुलझड़ी कहता है तो बहुत अजीब लगता है. हमारा नाम अजीब था लेकिन बच्चों के नाम अच्छे रखे. मेरे लड़कों का नाम गांव में धुरिया और कनरिया था लेकिन शहर आए तो मैंने उनका बदलकर शिववचन और संतोष रखा.”

इस तरह के नाम को बदलने की तड़प भी इन महिलाओं और उनके घरवालों में साफ दिखती है.

फुलझड़ी की पोती खुशबू कहती हैं, “मैंने पापा से कहा, दादी का नाम बदल दो. लेकिन पापा ने कहा कि वोटर कार्ड, वृद्धा पेंशन सबमें दादी का नाम फुलझड़ी है. इसलिए नाम बदलना मुश्किल है.”

हाशिए के लोगों का सौंदर्यबोध

प्रेम कुमार मणि, लेखक और नेता, बिहार

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इमेज कैप्शन, प्रेम कुमार मणि, लेखक और नेता, बिहार

दलित चिंतक और साहित्यकार प्रेम कुमार मणि कहते हैं, “जो हाशिए के लोग हैं उनमें सौंदर्यबोध तेजी से बढ़ रहा है. और ये एक बड़ी सांस्कृतिक परिघटना है. वो लोग अब अपने कपड़ों, चाय की प्यालियों से लेकर नाम तक पर ध्यान दे रहे हैं. और अब समाज में वैसे नाम नहीं हैं. समकालीन साहित्य से भी घीसू, नान्हू, भिंमल जैसे नाम नहीं मिलते.”

हालांकि हेतुकर झा नाम में हो रहे बदलाव को कोई बड़ा बदलाव मानने से इनकार करते है. वो कहते हैं, “ये बदलाव है लेकिन सिर्फ ऊपरी, कोई गहरा बदलाव नहीं है, जिससे जीवन में कोई बदलाव आया हो या उसका स्तर सुधरा हो. नाम सिर्फ आपकी पहचान है बाकी कुछ नहीं.”

नाम बदलने से भले ही लोगों के जीवनस्तर में कोई बदलाव न आया हो, लेकिन लोग अब नाम के प्रति सजग दिखते हैं.

मसलन सासाराम के सीताबिगहा की राजधानी देवी कहती हैं, “घर में पता चला कि राजधानी बहुत बड़ी जगह होती है तो मां बाप ने नाम राजधानी रख दिया. अब कार्ड पर नाम चढ़वाने जाते हैं तो बाबू हंसता है और कहता है राजधानी जाओ.”

'माँ ने रख दिया'

चिंता देवी, बिहार

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इमेज कैप्शन, चिंता देवी कहती हैं कि माँ ने नाम रखा.

ठीक यही हाल मसौढ़ी के बेगमचक की चिन्ता देवी का है. नाम पूछने पर पहले पूरी भूमिका बांधते हुए कहती हैं, “ऐसा नाम माँ ने रख दिया है कि जिंदगी ही चिंता करते बीत गई. चिंता देवी नाम है दीदी.’’

प्रेम कुमार मणि बताते हैं कि पुकारने के नामों के साथ साथ ही जातिसूचक उपनामों में भी बदलाव आ रहे हैं.

प्रेम कुमार मणि कहते हैं, “अब ग्वाले लोग यादव, बढ़ई लोग विश्वकर्मा या शर्मा लिखते हैं, ऐसी ही दूसरी कई जातियों के नाम बदल रहे हैं."

इन बदलावों की वजह पूछने पर प्रेम कुमार मणि कहते हैं, "साहित्य, संसार और शिक्षा के साथ बढ़ते संवाद ने इस तब्दीली को तेज़ किया है.”

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