साइबर धमकियों पर क्यों नहीं होती कार्रवाई?

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- Author, प्रशांतो कुमार रॉय
- पदनाम, वरिष्ठ टेक्नोलॉजी लेखक
जब मुंबई की एक अदालत ने एक प्राइवेट कंपनी में बतौर एक्ज़ीक्यूटिव काम करने वाले 36 वर्ष के योगेश प्रभु को तीन महीने की सज़ा सुनाई तो ये एक छोटा मील का पत्थर था.
साल 2000 में भारत में साइबर कानून के प्रभाव में आने के बाद से महाराष्ट्र में यह साइबर अपराध से जुड़ा पहला मामला था जिसमें सज़ा सुनाई गई.
ये साइबर अपराध से जुड़ा भारत का भी पहला मामला था, जिसमें दोष सिद्ध हुआ.
पहला मामला

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योगेश प्रभु ने, उनका प्रस्ताव ठुकरा चुकी एक सहकर्मी को, मार्च 2009 में एक अनाम पते से कई ईमेल भेजे.
उन ईमेल संदेशों में अश्लील तस्वीरें और सहकर्मी की गतिविधियों के बारे में जानकारियां रहती थीं.
इसने उनकी सहकर्मी को डरा दिया.
वो कहती हैं, "मैं एक फ़िल्म देखने जाती और उसके बाद मुझे एक बेनाम ईमेल मिलता. उसमें सवाल होता, मूवी कैसी थी, क्या आपने इसे एन्जॉय किया."

इस महिला की पहचान क़ानून के तहत गोपनीय रखी गई है.
पुलिस ने ईमेल भेजने वाले के आईपी एड्रेस का पता लगा लिया और एक महीने बाद प्रभु को गिरफ़्तार कर लिया.
हालांकि साइबर पर स्टॉल्क करने यानी पीछा करने का ये पहला मामला नहीं था.
शायद आपको हैरानी हो कि प्रभु को दोषी करार दिया जाना साइबर टेक्नॉलॉजी एक्ट 2000 के पास होने के 15 सालों में पहला मामला है.
तब से ऑनलाइन उत्पीड़न के दर्जनों मामले दर्ज हुए हैं और कई के बारे में रिपोर्ट तक नहीं हुई.
'आलोचना बर्दाश्त नहीं'

ऐसे मामल जो सबसे ज़्यादा नज़र आते हैं, वो सोशल मीडिया पर आलोचना से जुड़े हैं. इनमें अक्सर मोदी सरकार की आलोचना के साथ जुड़े मामले होते हैं.
नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन ने 8 जुलाई को ऐसे ही हालात का सामना किया.
उन्होंने शिक्षा संस्थानों में सरकार के दखल की आलोचना की और प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी को ख़ारिज करते हुए एक पुराना बयान दोहराया.
इसके बाद मोदी समर्थकों ने ट्विटर पर ज़ोरदार पलटवार शुरू कर दिया.
इनमें प्रोफ़ेसर सेन को मौत की धमकियां, उन्हें भारत से बाहर फेंकने की मांग और ये आरोप भी शामिल था कि "उन्होंने नोबल पुरस्कार हासिल करने के लिए ब्रितानियों की ओर से किए गए भारतीयों के नरसंहार पर सफेदी पोती दी थी."
मोदी के प्रशंसकों की पहचान ये है कि वे अपने नेता की आलोचना बेहद कम बर्दाश्त कर पाते हैं.
ये कैसा विरोध?

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भारत के प्रधानमंत्री ने 28 जुलाई को भारतीयों से कहा कि वो अपनी बेटियों के साथ तस्वीर ट्वीट करें.
हज़ारों लोगों ने #SelfieWithDaughter हैशटेग के साथ तस्वीरें पोस्ट कीं, लेकिन इसकी आलोचना करने वाले भी थे.
अभिनेत्री श्रुति सेठ ने 'सेल्फ़ी पर मुग्ध' प्रधानमंत्री की ओर से शुरू किए गए सेल्फ़ी कॉन्टेस्ट के प्रतीकवाद पर सवाल उठाए.
और जैसा कि श्रुति सेठ बताती हैं, इसके बाद, "अपशब्दों की बाढ़ आ गई, मैं नफ़रत की सूनामी में घिर गई. इनमें से कई इस प्रकार थीं - मैंने एक मुस्लिम से शादी करके हिंदुओं को नीचा दिखाया है इसलिए मैं आईएसआईएस की समर्थक हूं, जिसे पाकिस्तान या फिर सीरिया भेज दिया जाना चाहिए और सारी अभिनेत्रियां यौनकर्मी होती हैं और मैंने प्रधानमंत्री का बेवजह नाम सिर्फ अपने नाकाम करियर को दोबारा लॉन्च करने की कोशिश के लिए लिया है. पुरुषों ने अपनी बेटियों के साथ सेल्फ़ी पोस्ट करने के थोड़ी ही देर बाद गालियों की बौछार कर दी. महिलाओं तक ने ऐसे सवाल पूछे कि क्या मैं एक यौनकर्मी हूँ और क्या मैं अपनी बेटी के साथ भी ऐसा ही करने का इरादा रखती हूँ?"
सामाजिक कार्यकर्ता कविता कृष्णन का अनुभव कहीं ज़्यादा बुरा था.
कार्रवाई क्यों नहीं?

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क्या कानून का पालन कराने वालों को ऐसे हमलों की शिकायत की जाती है?
बहुत ही कम, होती भी है तो मुकदमा चलाने का इरादा नहीं होता.
साइबर कानून के विशेषज्ञ पवन दुग्गल कहते हैं कि पुलिसकर्मी केवल शारीरिक तौर पर नुकसान कर सकने वाली धमकियों पर ही ध्यान देते हैं.
उनके मुताबिक़, "वो दुनिया के पारंपरिक कानूनों को लेकर ज़्यादा सहज हैं. यहां तक कि नए 'निर्भया सेक्शन' को लेकर भी (दिल्ली में 2012 में एक बस में हुए गैंगरेप के बाद जोड़े गए). आईपीसी 354 डी पीछा करने के मामले में तो संरक्षण देता है लेकिन इंटरनेट पर पीछा करने के मामले में नहीं. इसमें सिर्फ किसी पुरुष के किसी महिला के संवाद (कम्यूनिकेशन्स) की निगरानी रखने का सरसरी तौर पर जिक्र किया गया है."
पवन दुग्गल कहते हैं कि आईटी एक्ट में संशोधन कर साइबर पर पीछा करने और धमकी देने को शामिल करने की ज़रूरत है.

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वो कहते हैं कि ये दो ऐसे अपराध हैं, जिनकी भारतीय स्कूल और कॉलेजों में सबसे कम शिकायत होती है.
दुग्गल कहते हैं, "साइबर पर पीछा करने के मामलों में 10 में से नौ पीड़ित महिलाएं होती हैं. आईटी एक्ट की धारा 66ए इस मामले में थोड़ा सरंक्षण देती है."
हालांकि उस कानून को अतिरंजित और कठोर बताते हुए चुनौती दी गई और सुप्रीम कोर्ट ने मार्च में उसे ख़ारिज कर दिया.
चुनौती

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सुप्रीम कोर्ट में 66ए के ख़िलाफ़ बहस करने वाले वकील अपार गुप्ता इस बात से सहमत नहीं हैं.
वो कहते हैं कि मौजूदा कानून में पीछा करने और गाली देने जैसे साइबर अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं.
गुप्ता कहते हैं, "ऐसा नहीं कि पुलिसकर्मियों को सिर्फ साइबर अपराध से जुड़ी शिकायतों से दिक्कत है. वो ज्यादातर शिकायतें दर्ज नहीं करना चाहते क्योंकि इससे उनका बोझ बढ़ेगा. कानून बनाना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उनका पालन कराना कहीं ज़्यादा कठिन है. यहां सामाजिक उदासीनता का भाव है और तहकीकात करने वाले तंत्र की कमी है."
विशेषज्ञ और पीड़ित दोनों मानते हैं कि ऑनलाइन दी जाने वाली गालियों और धमकियों को लेकर कार्रवाई बहुत ही चुनौती भरी है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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