डॉक्टरों की लिखाई से परेशान परमात्मा

डॉक्टर बदलेंगे पर्ची लिखने का तरीका?

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    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बैंगलोर से, बीबीसी हिंदी के लिए

तेलंगाना के चिलकुरी परमात्मा ने दवा की पर्ची यानी प्रिस्क्रिप्शन लिखने के डॉक्टरों के तरीके को पूरी तरह बदलवाने की ठान रखी है.

इसकी वजह है 2012 की एक घटना जिसमें हाथ घसीट कर लिखी गई और लगभग न पढ़ने लायक पर्ची के एक फ़ालतू अक्षर ने तीन साल के एक बच्चे की जान ले ली.

हैदराबाद की इस घटना ने चिलकुरी परमात्मा को हिला कर रख दिया.

वो कहते हैं कि उनके पास आज ऐसी दवाओं की लंबी फ़ेहरिस्त है, जिनके नामों में मामूली सा अंतर जीवन और मौत का फ़ैसला कर सकता है.

चिलकुरी परमात्मा कई बरसों से इस मुद्दे पर सक्रिय हैं

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परमात्मा की कोशिशों का ही नतीजा है कि केंद्र सरकार जल्द एक अधिसूचना जारी करने जा रही है.

इसमें डॉक्टरों को सलाह दी जाएगी कि वे सभी दवाओं के नाम अंग्रेज़ी के कैपिटल लेटर यानी बड़े अक्षरों में ही लिखें.

अदालत का आदेश

चिलकुरी परमात्मा ने सरकार को इस बारे में दो पत्र लिखे, लेकिन जब जवाब नहीं मिला तो उन्होंने अदालत का दरवाज़ा खटखटाया.

उन्होंने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर कर दी.

डॉक्टर बदलेंगे पर्ची लिखने का तरीका?

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अदालत ने भारतीय मेडिकल कौंसिल (एमसीआई) को आदेश दिया है कि वह क़ानून तैयार करे जिसमें डॉक्टरों से कहा जाए कि वे कैपिटल लेटर में ही प्रिस्क्रिप्शन लिखें.

तेलंगाना राज्य के नलगोंडा में अपने घर पर बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, “एमसीआई ने 2014 में इस बारे में एक प्रस्ताव पारित किया. उसके बाद ही केंद्र सरकार ने मुझे ख़त लिखा कि फ़ैसला ले लिया गया है.”

जेनेरिक दवाएं?

क्या बदल जाएगा प्रिस्क्रिप्शन लिखने का तरीका?

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परमात्मा दूसरी वजहों से भी इस अधिसूचना का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं.

वो जानना चाहते हैं कि इस आदेश का पालन नहीं करने वाले डॉक्टरों के ख़िलाफ़ दंड का प्रावधान प्रस्तावित क़ानून में है या नहीं.

स्वास्थ्य मंत्रालय के एक वरिष्ठ अफ़सर ने बीबीसी से कहा, “अधिसूचना पर काम चल रहा है. डॉक्टरों के ख़िलाफ़ कार्रवाई का प्रावधान शायद न हो. बहरहाल, डॉक्टरों पर मेडिकल क्षेत्र की आचार संहिता लागू होती है. उसके मुताबिक़ ही कार्रवाई की व्यवस्था हो सकती है.”

आचार संहिता लागू होगी?

क्या बदल जाएगा प्रिस्क्रिप्शन लिखने का तरीका?

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इंडियन मेडिकल एसोशिएसन के अध्यक्ष डॉक्टर केके अग्रवाल कहते हैं, “हमने दो शब्द बदलने के लिए साल 2002 में एक प्रस्ताव पारित किया था. ‘लेजीबल’ यानी ‘पढे जाने लायक’ और ‘प्रेफरेबली इन कैपिटल लेटर्स’ यानी ‘कैपिटल अक्षरों को प्राथमिकता दी जाए’ को इसमें शामिल किया जाएगा. पर यह सिर्फ सलाह होगी. दंडात्मक कार्रवाई आचार संहिता से तय होती है.”

परमात्मा यह भी चाहते हैं कि डॉक्टर जेनेरिक दवाएं ही लिखें. यह इसलिए कि अलग अलग दवा कंपनियां अलग अलग ब्रांड नाम से दवाएं बनाती और बेचती हैं.

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