'मैं अब सर नहीं मैडम हो गई हूं'

- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
संजना राम ने जब कोलकाता के एक सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाना शुरू किया तो वो संजय राम थे, एक ट्रांसजेंडर पुरुष. या संजना के शब्दों में, ‘एक पुरुष के शरीर में कैद एक औरत की आत्मा’.
पर सरकारी स्कूल की नौकरी जेंडर की ये बारीकी समझाकर नहीं मिलती. साल 2005 में वो ग्रैजुएशन की डिग्री, टीचर ट्रेनिंग का कोर्स और कुछ हौसले के साथ संजय राम के तौर पर इंटरव्यू देने गईं.
नौकरी कर पैसे बचाए और आख़िरकार पिछले साल उन्होंने अपने सेक्स बदलवाने का ऑपरेशन करवाया. अब वो संजना राम बन गईं.
वे कहती हैं, "बचपन से मैं आत्मा से औरत ही थी, पर ऑपरेशन के बाद अब मेरी आत्मा और शरीर एक हो गई है और मैं समाज की आंखों में औरत बन गई हूं.”
कोशिश

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एक टीचर के समाज का बड़ा हिस्सा बच्चों का होता है. कोलकाता के टॉलीगंज आदर्श हिंदी गर्ल्स स्कूल की प्राइमरी कक्षाओं को ये समझाना था की उनके टीचर अब संजय नहीं संजना कहलाएंगे.
संजना बताती हैं कि जब स्कूल की काउंसिल को ये बताने गईं तो बहुत डर था कि कहीं इस वजह से नौकरी से निकाल ना दिया जाए.
पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, "ऑपरेशन के बाद जब मैं स्कूल पहुंची तो बच्चों ने एकदम स्वीकार लिया कि मैं अब सर नहीं मैडम हो गई हूं, बल्कि मुझे पता चला कि बाकी टीचर्स ने ख़ास तौर पर उन्हें स्पेशल क्लास में इस बारे में समझाया था."
स्कूल की प्रिंसिपल आशा राम ने बीबीसी को बताया कि उन्हें ट्रांसजेंडर के बारे में कुछ नहीं पता था, उनके सामने आने वाला ये पहला ऐसा मामला था.
उन्होंने कहा, "ये उनका निजी मामला था और वो कोर्ट से सेक्स चेंज का ऑर्डर भी ले आईं थी, तो मैंने सब टीचर्स और छात्रों को समझाया, अब सर नहीं मैडम कहें, फिर भी कई बार ग़लती से कुछ लोग सर कह कर ही पुकारते हैं."
हालांकि आशा राम ये भी कहती हैं कि उनके मन ये बात भी थी कि इस समुदाय को नाराज़ करने से 'बददुआ' लग सकती है तो उन्होंने संजना का साथ दिया.
एक सरकारी स्कूल में ऐसा माहौल मिलने पर संजना खुद को खुशकिस्मत बताती हैं, पर साथ ही कहती हैं, “मैंने कोशिश की, और कोशिश करने से ही ये सब हासिल कर पाई.”
संजना जैसी मिसाल कम ही मिलती हैं. भारतीय समाज में ट्रांसजेंडर लोगों की खास ज़रूरतों के बारे में समझ और संवेदनशीलता कुछ कम ही है. ज़्यादातर लोग ट्रांसजेंडर और किन्नर लोगों में फर्क भी नहीं समझते.
स्पष्टीकरण

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संजना जैसा ही अनुभव कोलकाता की मानोबी बंदोपाध्याय का रहा. जिन्हें हाल ही में कोलकाता के एक कॉलेज का प्रधानाचार्य नियुक्त किया गया.
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर लोगों को संवैधानिक मान्यता दिए जाने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. आदेश में ट्रांसजेंडर लोगों को सामाजिक और आर्थिक स्तर पर नौकरियों, स्कूल-कॉलेज में दाखिलों, स्वास्थ्य सेवाओं में योजनाएं लाने की बात कही गई थी.
लेकिन केंद्र सरकार ने ‘ट्रांसजेंडर’ की परिभाषा पर ही स्पष्टीकरण मांगते हुए कोर्ट में रिव्यू पेटिशन डाल दी है. यानि अभी ट्रांइसजेंडर समुदाय के लोगों के लिए कोई योजना या पहल नहीं की गई है.
मंगलवार को राजधानी दिल्ली में एचआईवी-एड्स अलायंस नाम की ग़ैर-सरकारी संस्था द्वारा आयोजित कार्यक्रम में समाज कल्याण मंत्री थावरचंद गहलोत समेत देशभर से करीब 400 ट्रांसजेंडर लोगों ने हिस्सा लिया.
गहलोत ने बीबीसी को बताया, “कोर्ट के आदेश के मुताबिक हम एक तीसरी कैटेगरी बनाने के पक्ष में हैं, लेकिन इसमें सिर्फ ट्रांसजेंडर शामिल होंगे या वो भी जो अपना सेक्स बदलवाकर अब पुरुष या औरत कहलाना पसंद करते हैं, ऐसी बातों पर स्पष्टीकरण चाहिए.”
समाज का दबाव

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इसी साल राज्य सभा में ट्रांसजेंडर लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए एक प्राइवेट मेंबर बिल लाया गया जो सर्व सहमति से पारित भी किया गया.
गहलोत के मुताबिक़ इस बिल पर अब लोकसभा में भी चर्चा हो रही है और सरकार इसी में धारा 377 जो समलैंगिक संबंध को गैरकानूनी करार देती है, उस पर भी फैसला लेने की मंशा रखती है.
लेकिन क़ानूनों और सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों से मिलने वाली सुरक्षा से परे संजना और मानबी जैसे कुछ लोग अपने बल-बूते पर अपनी ट्रांसजेंडर पहचान के साथ अब भी समाज में अपनी जगह बना रहे हैं.
संजना अब शादी करना चाहती हैं. बताती हैं कि जब कॉलेज में पढ़ाई कर रही थीं तो एक लड़के से रिश्ता बना, तीन साल चला पर फिर समाज के दबाव में टूट गया.
कहती हैं, “उसके बाद दोबारा मोहब्बत ही नहीं हुई, अब सेक्स चेंज के बाद कई रिश्ते आने लगे हैं, जल्द ही मैं अपना फ़ैसला भी कर लूंगी और फिर एक बच्चा भी गोद लूंगी.”
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