'कश्मीर मुद्दे पर भाजपा ने वादाख़िलाफ़ी की'

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भारत प्रशासित जम्मू और कश्मीर में अलगाववादी नेता मसर्रत आलम की गिरफ़्तारी और हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी की नज़रबंदी के बाद घाटी एक बार फिर सुलगने लगी है.
अलगाववादी संगठनों ने शनिवार को घाटी में बंद का आह्वान किया हुआ है.
कमेटी की रिपोर्ट

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इससे पहले भारत सरकार ने कश्मीर समस्या से जुड़े सभी पक्षों से बातचीत करने के लिए तीन सदस्यों की एक कमेटी बनाई थी.
एमएम अंसारी, पत्रकार दिलीप पडगांवकर और राधा कुमार को इसका सदस्य चुना गया था.

एमएम अंसारी से बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से हुई बातचीत में भारतीय जनता पार्टी पर कश्मीर के मुद्दे पर किए गए क़रार से पीछे हटने का आरोप लगाया है.
उन्होंने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ जो क़रार किया था, उसका सबसे अहम मुद्दा यह था कि कश्मीर समस्या से जुड़े हर पक्ष के साथ बातचीत की जाएगी.
उनके मुताबिक़, तय हुआ था कि कश्मीर पर किसका क्या स्टैंड है, इसकी परवाह किए बग़ैर बातचीत में सबको शामिल किया जाएगा. पर अब तक इस दिशा में कोई पहल नहीं हुई है.

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उन्होंने कहा कि उनकी कमेटी ने तीन साल पहले अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी थी.
भारतीय जनता पार्टी ने उसके एक हिस्से को अपने चुनाव घोषणा पत्र में शामिल किया. पर सत्ता में आने के बाद वही पार्टी अब उस मुद्दे पर कुछ करती नहीं दीख रही है.
'बात हुर्रियत समेत सब से हो'

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अंसारी ने कहा, " हुर्रियत समेत सभी लोगों से बातचीत तुरत शुरू की जानी चाहिए. पाकिस्तान से बातचीत हो या न हो, या हो तो कब हो, इस पर मतभेद हो सकते हैं. पर देश के अंदर बातचीत में कोई रुकावट नहीं है. इस बातचीत का मतलब यह भी नहीं है कि सारे लोगों की सारी बातें मान ली जाएंगी, पर बात शुरू तो हो."
उन्होंने कहा कि बातचीत का न होना यह साबित करता है कि हमारे राजनीतिक तंत्र में कोई बड़ी ख़ामी है और नेताओं में बड़े क़दम उठाने के लिए ज़रूरी साहस की कमी है.
मुफ़्ती सरकार केंद्र की कठपुतली?

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पूर्व सीआईसी का यह भी मानना है कि केंद्र सरकार और जम्मू और कश्मीर सरकार के बीच तारतम्य की कमी साफ़ दिखती है.
उन्होंने कहा, "बार बार ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार राज्य सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप करती है. इससे आम जनता में यह संकेत जाता है कि राज्य सरकार केंद्र के हाथ की कठपुतली है. इससे इसकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं."
घाटी में पाकिस्तानी झंडे फहराने के मुद्दे पर अंसारी ने कहा कि ऐसा कर अच्छा नहीं किया गया गया, पर ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. इस पर भारत सरकार को बहुत अधिक संवेदनशील होने की ज़रूरत नहीं है.
'नया कुछ नहीं'

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उनका मानना है कि मसर्रत आलम पर पहले से ही कई मामले चल रहे हैं. वह पहले भी जेल में रहे हैं. एक और मामला चला देने या एक बार फिर जेल में डाल देने से नया कुछ नहीं हो जाएगा.
अंसारी का यह भी मानना है कि केंद्र सरकार मीडिया की ख़बरों पर कुछ ज़्यादा ही प्रतिक्रिया जताती है. दरअसल वह यह दिखाना चाहती है कि जो कुछ हो रहा है, वह उसे सहन नहीं कर सकती. पर इससे समस्या निपटाने में कोई मदद नहीं मिलने वाली है.
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