नए गिलानी बनना चाहते हैं मसर्रत आलम ?

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- Author, बशीर मंज़र
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में पीडीपी और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन की मुश्किलें ख़त्म होती नहीं दिख रही हैं.
ताज़ा मामला कट्टरपंथी अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी के स्वागत रैली में पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने और पाकिस्तान का झंडा फ़हराने का है.
हुर्रियत कांफ्रेंस के एक धड़े के नेता गिलानी दिल्ली में सर्दियां बिताने के बाद घाटी वापस आए हैं.
<link type="page"><caption> गिलानी और मसर्रत आलम नज़रबंद</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2015/04/150416_masarrat_alam_aa.shtml" platform="highweb"/></link>
उनका स्वागत किया एक अन्य अलगाववादी नेता मसर्रत आलम बट ने. मसर्रत अभी पिछले महीने ही जेल से रिहा हुए हैं. उनकी रिहाई पर भी काफ़ी विवाद हुआ था.
पुलिस का कहना है कि उसने गिलानी, बट और कुछ अन्य लोगों के ख़िलाफ़ 'भड़काऊ गतिविधियों' के लिए मामला दर्ज कर लिया है.
होता आया है

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कश्मीर घाटी में पाकिस्तानी झंडा फहराना और उसके समर्थन में नारे लगना कोई नई बात नहीं है.
यह 1953 से ही होता आया है जब भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर के पहले प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद अब्दुल्लाह को जेल भेजा गया था.
इस बार ये मुद्दा ज़्यादा चर्चा में इसलिए है, क्योंकि भाजपा सत्ता में साझीदार है.
चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने अलगाववादियों के ख़िलाफ़ कड़ी बयानबाज़ी की थी और नेशनल कांफ़्रेंस और पीडीपी दोनों पर 'भारत विरोधी' तत्वों के प्रति नरमी बरतने का आरोप लगाया था.
भाजपा नेता कहते रहे हैं कि पीडीपी 'नरम अलगाववाद' को बढ़ावा देती रही है.
अब भाजपा उसी पीडीपी के साथ जम्मू-कश्मीर की सत्ता में है. भाजपा पर अलगाववादियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का बहुत ज़्यादा दबाव है.
नई बहस शुरू

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ऐसे में, दोनों दलों के गठबंधन वाली सरकार का नेतृत्व कर रहे मुफ़्ती मोहम्मद सईद मुसीबत में फंसे दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि वो कहते रहे हैं कि अलगाववादियों को शामिल करके ही 'कश्मीर मुद्दे के हल का रास्ता' साफ़ होगा.
अभी यह देखना बाक़ी है कि क्या सरकार गिलानी और अन्य के ख़िलाफ़ दर्ज मामले को आगे बढ़ाती है या नहीं. लेकिन इस घटना से यह बहस शुरू हो गई कि क्या कश्मीर में पाकिस्तान-समर्थक गुट ताक़तवर हुआ है.
यहाँ हमेशा ही ऐसा एक समूह रहा है जो जम्मू-कश्मीर के पाकिस्तान में शामिल होने का समर्थन करता रहा है, लेकिन यह समूह हमेशा अल्पसंख्यक ही रहा है.
ऐसी रैलियों में ये नारे, ज़रूरी नहीं कि पाकिस्तान के समर्थन में ही लगाए गए हों.
हाल-फिलहाल कश्मीरी नौजवानों ने कुछ ऐसे नारे गढ़ लिए हैं जिनसे सरकार बुरी तरह चिढ़ जाती है.
कुछ महीने पहले चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट के झंडे भी कुछ जगहों पर लहराते हुए देखे गए.
जगह लेने की कोशिश

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पाकिस्तान के समर्थन में नारे लगाने की घटना का मतलब है कि मसर्रत ख़ुद को गिलानी के उत्तराधिकारी के रूप में पेश करने के लिए रस्साकशी कर रहे हैं, क्योंकि उम्र अब गिलानी का साथ नहीं दे रही है.
गिलानी एक ख़ास राजनीतिक सोच (पाकिस्तानपरस्ती) के लिए जाने जाते हैं. उनके किसी अनुयायी में उनके जैसा करिश्मा नहीं है, जो ऐसा विचार रखने वाले सभी लोगों को एकजुट रख सके.
मसर्रत आलम बट की कोशिश है कि वो ख़ुद को गिलानी से ज़्यादा तेज़-तर्रार पेश कर सकें.
गिलानी जो जगह खाली करेंगे उसे भरने के लिए ये बट की सोची-समझी गणित का हिस्सा भी हो सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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