'फ़ाइव-स्टार एक्टिविस्ट' और राष्ट्रभक्ति

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- Author, हर्ष मंदर
- पदनाम, पूर्व आईएएस एवं सामाजिक कार्यकर्ता
आज भारत में विदेशी मुद्रा का तो स्वागत किया जाता है लेकिन न्याय से जुड़े मामलों में विदेशी मदद को कई बार एक विशेष तबका राष्ट्रवादी चश्मे से देखता है.
भारत सरकार को भी जब विरोध का सामना करना पड़ता है तो इसे लेकर वो सख़्त नज़रिया अपनाती है.
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के वरिष्ठ न्यायधीशों को 'फ़ाइवस्टार एक्टिविस्टों' के प्रभाव में न आने के लिए कहकर एक बार फिर इस मुद्दे को हवा दे दी है.
विदेशी पैसे की मदद से भारत के मुद्दों को विदेशी मंचों पर उठाने की बात- देश के अंदरूनी मामलों को सार्वजनिक मंच पर लाने जैसा माना जाता है .
जैसे, जाति के आधार पर देश में हो रहे भेदभाव पर बातें करने में कोई दिक्कत नहीं है लेकिन जब कोई जातिवाद-विरोधी एक्टिविस्ट इस मुद्दे को डर्बन या दुनिया के किसी दूसरे मंच पर उठाता है और जाति व्यवस्था की तुलना नस्लभेद से करता है तो इसे गैरकानूनी और देश के ख़िलाफ़ माना गया.
आईबी की रिपोर्ट

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ऐसी ही सोच भारतीय इंटेलिजेंस ब्यूरो(आईबी) की 'लीक' हुई उस गुप्त रिपोर्ट में भी ज़ाहिर हुई.
इसमें कहा गया था कि अंतरराष्ट्रीय समर्थन की मदद लेकर नागरिक प्रतिरोधों से सात कारोबारी सेक्टरों में या तो दिक्कतें पैदा हुई हैं या इनके विकास की रफ़्चार मंद हुई है.
आईबी की इस रिपोर्ट में विकास की रफ़्तार धीमी होने के लिए विभिन्न एनजीओ के नेतृत्व में होने वाले आंदोलनों को ज़िम्मेदार ठहराया गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि "जीडीपी पर पड़ने वाला इसका नकारात्मक प्रभाव हर साल क़रीब 2-3 प्रतिशत रहा है." हालांकि रिपोर्ट में यह नहीं बताया गया है कि इतना सटीक आर्थिक आकलन उन्होंने किया कैसे.
इस तरह, सरकार की बाज़ारवादी आर्थिक नीतियों से असहमति जताना या उनका पर्यावरण या मज़दूरों के अधिकारों पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंता जताने को 'राष्ट्र-विरोधी' घोषित कर दिया गया है. आईबी की रिपोर्ट में इसे 'भारत की आर्थिक संप्रभुता का उल्लंघन' कहा गया है.
भारत की पहचान

ये दिलचस्प है कि नोबल शांति पुरस्कार जीतने वाले भारतीय कैलाश सत्यार्थी को इस पुरस्कार के लिए भारत सरकार ने नहीं यूरोपीय यूनियन ने नामांकित किया था. भारत सरकार ने उन्हें कभी किसी प्रमुख राष्ट्रीय सम्मान का हक़दार नहीं समझा.
निजी तौर पर कई लोग सत्यार्थी के अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बाल मज़दूरी के मुद्दा उठाते रहने को भारत को बदनाम करने की कोशिश बताते हैं.
कुछ समय पहले ग्रीनपीस की कार्यकर्ता प्रिया पिल्लई को लंदन जाते समय दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर रोक दिया गया. वो लंदन में ब्रितानी सांसदों को भारत में ब्रितानी निवेश वाली कंपनियों के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को लेकर व्याख्यान देने जा रही थीं.
अदालत में मिली जीत

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प्रिया पिल्लई ने सरकार के फ़ैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी. सरकार ने कोर्ट में दलील दी कि पिल्लई की गतिविधियो की वजह से 'भारत की विदेश में नकारात्मक छवि बनेगी' और 'विदेशी निवेश में कमी आएगी.'
पिल्लई को हाईकोर्ट में सरकार के ख़िलाफ़ जीत मिली. अदालत ने कहा कि वो भारत से बाहर यात्रा करने के लिए स्वतंत्र हैं.
लेकिन ग्रीनपीस को लेकर भारत सरकार के रवैए में कोई बदलाव नहीं आया. सरकार ने ग्रीनपीस के बैंक अकाउंट को फ़्रीज़ कर दिया. प्रधानमंत्री ने भी अपने 'फ़ाइवस्टार एक्टिविस्टों' वाले बयान से ऐसी कार्रवाइयों को अपना अपरोक्ष समर्थन प्रदान किया.
देशहित का सवाल

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भारत में मानवाधिकारों और पर्यावरण मामलों में 'विदेशी' मदद को आधिकारिक और प्रभावी रूप से 'कलंकित' किया जा रहा है.
ये प्रयास उस बड़ी योजना का हिस्सा हैं जिसके तहत बड़े निजी निवेश आधारित विकास मॉडलों की आलोचना को कमजोर और कलंकित करने की कोशिश की जा रही है.
भले ही ऐसे विकास से ग़रीब स्थानीय तबके का विस्थापन हो रहा हो, श्रम क़ानूनों की अनदेखी की जा रही हो और जंगलों एवं रिहाइशों की मिटाया जा रहा हो.
भारत में इस समय मार्केट फंडामेंटलइज़्म या क्रोनी पूंजीवाद के विरोध को देश के खिलाफ खड़े होने की तरह देखा जा रहा है.
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