नई नहीं है राजनेताओं की 'गंदी बात'

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- Author, कुलदीप कुमार
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
बिहार से भारतीय जनता पार्टी के सांसद और केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के खिलाफ रंगभेदी बयान पर नाराज़गी तो जताई जा सकती है लेकिन हैरत नहीं.
गिरिराज ने सवाल किया है कि अगर राजीव गांधी गोरी चमड़ी वाली सोनिया गांधी के बजाय काली चमड़ी वाली किसी नाइजीरियन महिला से शादी करते तो भी क्या कांग्रेस पार्टी उस महिला को अपना नेता स्वीकार करती?
पिछले साल लोकसभा चुनाव के दौरान हाजीपुर में एक चुनावसभा को संबोधित करते हुए भी सिंह ने एक बयान दिया था. उन्होंने घोषणा की थी कि नरेंद्र मोदी के विरोधियों के लिए भारत में कोई जगह नहीं है और उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए.
नहीं हुई खुलकर आलोचना

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जब गिरिराज सिंह यह कह रहे थे तब मंच पर पार्टी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी भी बैठे थे. लेकिन गडकरी ने उनके बयान की आलोचना में एक शब्द भी नहीं कहा. दिलचस्प बात यह है कि पार्टी नेतृत्व ने कभी भी इस तरह के बयानों की खुलकर आलोचना नहीं की है.
पिछले साल भी मीडिया में पार्टी सूत्रों के हवाले से खबर आई थी कि पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने फोन पर गिरिराज सिंह को ऐसे बयान न देने के लिए कहा है.
इस बार भी पार्टी सूत्रों के हवाले से ही खबर है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने गिरिराज सिंह से फोन पर कहा है कि वह अपने बयान के लिए खेद प्रकट करें. लेकिन पार्टी की ओर से उनकी आलोचना या निंदा नहीं की गई है.
भाजपा की चुप्पी

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हकीकत तो यह है कि भाजपा ने ऐसे नेताओं को दंडित करने के बजाय पुरस्कृत करना ही बेहतर समझा है.
चुनाव के बाद गिरिराज सिंह को केंद्रीय मंत्रिपरिषद में शामिल करके उनकी पीठ थपथपाई गई.
इसी तरह दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले एक और केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति का रामजादा वाला बयान काफ़ी विवादित हुआ था.
इस बयान के बाद भी उनके खिलाफ किसी किस्म की कार्रवाई नहीं हुई.
अमित शाह भी नहीं हैं पीछे

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उत्तर प्रदेश के मुजफ़्फ़रनगर जिले में 2013 में अमित शाह ने, जो अब भाजपा के अध्यक्ष हैं, सार्वजनिक रूप से हिंदुओं का आह्वान कर डाला था कि वे चुनाव का इस्तेमाल ‘अपमान का बदला’ लेने के लिए करें.
शिव सेना के नेता रामदास कदम सभी मुसलमानों को ‘देशद्रोही’ बता चुके हैं. उनका आरोप है कि मुसलमान दंगा-फसाद करते हैं, पुलिस पर हमले करते हैं और हिंदू महिलाओं के साथ बदतमीजी करते हैं.
विश्व हिंदू परिषद के शीर्ष नेता प्रवीण तोगड़िया तो वर्षों से मुस्लिम-विरोधी भड़काऊ बयान दे रहे हैं. लेकिन किसी पर भी अंकुश लगाने की कोई कोशिश नज़र नहीं आती.
दूसरी पार्टियां भी हैं समान

दूसरी पार्टियों का हाल भी इससे बेहतर नहीं है. पिछले वर्ष लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को धमकी दी थी.
उन्होंंने कहा था कि यदि उन्होंने या उनके साथियों ने वहां दंगे भड़काए तो वह उनकी ‘बोटी-बोटी कर देंगे’.
समाजवादी पार्टी के नेता आज़म ख़ान और अबू आज़मी भी भड़काऊ और विवादास्पद बयान देने के लिए कुख्यात हैं.
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के एक नेता ने अपने समर्थकों से मार्क्सवादियों के बारे में उत्तेजक बयान दिया था.
सार्वजनिक संवाद का यह स्तर और राजनीतिक पार्टियों की चुप्पी भारतीय लोकतंत्र में आई गिरावट का सबूत है.
पीछे छूटी मर्यादा

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अब संसद और विधान सभाओं में भी जन प्रतिनिधि संयत और मर्यादित आचरण नहीं करते. पार्टियां रणनीति बनाकर संसद और विधानसभा में हो-हल्ला करती हैं और कामकाज नहीं चलने देतीं. पार्टी नेतृत्व नेता की चुनावी उपयोगिता देखता है, उसका आचरण नहीं.
मसलन गिरिराज सिंह बिहार के भूमिहारों के प्रभावशाली नेता हैं. आने वाले विधानसभा चुनाव में वे बहुत उपयोगी साबित हो सकते हैं.
साध्वी निरंजन ज्योति भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की ज़रूरत पड़ने पर बहुत काम की सिद्ध होंगी. इसलिए नेतृत्व ऐसे तत्वों को सजा देने की बजाय और अधिक शह देता है.
यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है और भारत में लोकतंत्र के भविष्य के लिए यह शुभ संकेत नहीं है.
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