योजना आयोग जैसा होगा यूजीसी का हश्र!

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
वर्ष 1946 में जब सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) का गठन किया गया तो भारत में उच्च शिक्षा के बेहतर समन्वय और गुणवत्ता की परिकल्पना की गई थी.
वर्ष 1956 में संसद में लाए गए एक क़ानून के तहत इसको संवैधानिक मान्यता भी प्रदान कर दी गई थी. उस दौर में पूरे देश में सिर्फ़ तीन विश्वविद्यालय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय ही इसके अधीन थे.
मगर कुछ वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्थापना होनी शुरू हो गई और आज लगभग 44 ऐसे केंद्रीय विश्वविद्यालय हैं जो इसके अधीन हैं.
सिर्फ़ छह दशकों में ही इस संस्था की प्रासंगिकता को लेकर बहस छिड़ गई है और दो मौके ऐसे भी आए जब भारत सरकार ने दो अलग-अलग समितियों का गठन किया ताकि यूजीसी की कार्यशैली में सुधार लाया जा सके.
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पहली समिति यूजीसी के ही पूर्व अध्यक्ष रह चुके जाने-माने शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल के नेतृत्व में बनाई गई थी, जबकि दूसरी समिति का गठन सैम पित्रोदा के नेतृत्व में हुआ.
मगर दोनों ही समितियों के प्रस्तावों को अमली जामा नहीं पहनाया जा सका और यूजीसी की कार्यशैली पर सवाल उठते रहे. हाल ही में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हरि गौतम के नेतृत्व में एक और समिति का गठन किया जिसने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी है.
यूजीसी का विघटन!

इस समिति ने क्या कुछ सलाह सरकार को दी है, सार्वजनिक नहीं किया गया है मगर संकेत मिल रहे हैं कि समिति ने योजना आयोग की तरह ही यूजीसी के विघटन का प्रस्ताव देते हुए उच्च शिक्षा को संचालित करने के लिए एक नई संस्था के गठन की सलाह दी है.
समिति ने अपनी समीक्षा में पाया है की यूजीसी एक्ट में किसी तरह का बदलाव करने से भी कोई फ़ायदा नहीं होने वाला है, जिसकी वजह से 'नेशनल हायर एजुकेशन अथॉरिटी' के गठन का प्रस्ताव किया गया है.
हालाँकि मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि सरकार फिलहाल तो यूजीसी के विघटन का कोई विचार नहीं रखती है.
तो सवाल है कि क्या यूजीसी भारत में उच्च शिक्षा के पहरेदार की भूमिका ठीक तरह से अदा नहीं कर पाया है?
उच्च शिक्षा से जुड़े लोग मानते तो हैं कि यूजीसी ऐसा नहीं कर पाया है मगर इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो इस संस्था के विघटन के पक्ष में नहीं हैं.
'यूजीसी की उपयोगिता है'

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यूजीसी के पूर्व अध्यक्ष प्रोफ़ेसर यशपाल का कहना है कि तकनीकी और मेडिकल शिक्षा को यूजीसी से अलग रखना ठीक फ़ैसला नहीं रहा. वो मानते हैं कि यह कहना भी नाइंसाफी होगी कि यूजीसी ने कुछ नहीं किया.
प्रोफ़ेसर यशपाल कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि यूजीसी ने कुछ नहीं किया. आज भारत में जो उच्च शिक्षा का ढांचा खड़ा हो पाया है वो यूजीसी की वजह से ही है. मेरी राय में तकनीकी शिक्षा जो मौजूदा समय में एआईसीटीई के अधीन है और जो मेडिकल शिक्षा मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया के अधीन है, उन्हें यूजीसी के अधीन ही लाया जाना चाहिए."
लेकिन प्रोफ़ेसर यशपाल के साथ उनकी समिति में सदस्य रहे एनसीईआरटी के पूर्व चेयरमैन कृष्ण कुमार मानते हैं कि प्रोफ़ेसर यशपाल समिति के प्रस्ताव बहुत अच्छे थे, मगर सरकार ने उस रिपोर्ट पर न अमल किया और न ही उसे कभी सार्वजनिक किया.
कार्यशैली में बदलाव की ज़रूरत

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कृष्ण कुमार कहते हैं, "यूजीसी पर नियंत्रण की बात सभी ने कही. मगर यशपाल समिति की रिपोर्ट अलग इसलिए थी क्योंकि उसमें संस्था को सुधारने और कार्यशैली में बदलाव लाने के कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए गए थे. हमने स्पष्ट किया था कि हमें सिर्फ कंट्रोल करने वाली संस्था नहीं चाहिए बल्कि ऐसी संस्था चाहिए जहां विचार विमर्श के ज़रिए उच्च शिक्षा को और बेहतर बनाया जा सके."

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दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ यानी 'डूटा' की अध्यक्ष नंदिता नारायण का आरोप है कि यूपीए सरकार ने भी इसी तरह की समिति बनाई थी जिसने एक तरह से उच्च शिक्षा के निजीकरण का रास्ता साफ़ करने के सुझाव दिए थे.
नंदिता कहती हैं, "हरि गौतम समिति ने भी कुछ अलग सुझाव नहीं दिए. हम यूजीसी की कार्यशैली में सुधार लाए जाने की हिमायत भी करते हैं. मगर इसका विघटन नहीं होना चाहिए. ये सरकार भी यूपीए के ही एजेंडे पर काम कर रही है."
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