वो 3 कारण जिनसे 'आप' जीत सकती है

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- Author, सिद्धार्थ वरदराजन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
इससे पहले कि अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी की जीत का जश्न मनाना शुरू कर दें, वो याद करेंगे कि दिसंबर, 2013 के विधानसभा चुनावों में मतदान बाद के सर्वेक्षण कितनी बुरी तरह से धाराशायी हो गए थे.
सर्वे कंपनी चाणक्य के अलावा सभी एजेंसियों ने भविष्यवाणी की थी कि आम आदमी पार्टी इकाई अंकों में ही सिमट कर रह जाएगी.
केवल चाणक्य ने पार्टी को 31 सीट दी थीं. अन्य सर्वेक्षणों में कहा गय था कि 'आप' भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस से पिछड़कर तीसरे नंबर पर रह जाएगी.
बीजेपी की रणनीति

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इसलिए आज अगर सर्वे एजेंसियां 'आप' की जीत या जबर्दस्त विजय की बात कह रही हैं, तो आशा है कि पार्टी ने अपने समर्थकों से 10 फरवरी को रुझानों और नतीज़ों का इंतजार करने की नसीहत दी होगी.
आखिरी नतीजे चाहें कुछ भी हों, लेकिन इसके तीन निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं. पहली ये कि राष्ट्रीय नेता के तौर पर नरेंद्र मोदी की अपार लोकप्रियता और व्यापक प्रचार अभियान के बावजूद बीजेपी की रणनीति गड़बड़ा गई.
बीजेपी के ज्यादातर चंदे के स्रोत अभी भी अज्ञात हैं लेकिन ये अलग बहस का मुद्दा है.
किरण बेदी

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सच तो ये है कि बीजेपी ने दिल्ली चुनाव घोषित कराने में गैरज़रूरी देरी की और रहस्यमयी तरीके से डॉक्टर हर्ष वर्द्धन की उम्मीदवारी को दरकिनार कर दिया.
उनसे पार्टी को फायदा हो सकता था. विवादास्पद किरण बेदी को स्थानीय नेतृत्व के सिर पर थोपे जाने के फैसले ने 'मोदी कार्ड' को बेअसर कर दिया.
आम आदमी पार्टी के एक नेता ने बीजेपी की रणनीति को कुछ इस तरह से बयान किया, "वे जीत के जबड़े से हार छीन लाए."
ग़लती का इस्तेमाल

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अगर इसके बावजूद पार्टी हार जाती है तो इसका मतलब ये होगा कि मतदाताओं को राष्ट्रीय राजधानी के आर्थिक हितों के मद्देनज़र केंद्र की सरकार वाली पार्टी अधिक ठीक लगी.
दूसरा ये कि लोकसभा चुनाव में अपने ही गढ़ में एक भी सीट जीत पाने में नाकाम रही आम आदमी पार्टी को चुका हुआ मान लिया गया था लेकिन ये पार्टी राजनीति के मैदान में अपनी ज़मीन तलाश पाने में कामयाब रही.
'भगोड़ा' होने के आरोपों को भी केजरीवाल ने माफी मांगकर हल्का कर दिया और इस गलती का इस्तेमाल भी उन्होंने पार्टी के फायदे के लिए कर लिया.
बड़ी कामयाबी

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केजरीवाल ने कहा, "हमने कोई भी फैसला करने से पहले दिल्ली के लोगों से सलाह ली थी. लेकिन हमारी गलती ये थी कि इस्तीफा देने से पहले हमें आपसे पूछना चाहिए था."
'पांच साल केजरीवाल' के नारे को पूरा करने में पार्टी कहीं चूक भी जाती है तो भी 'आप' के लिए चीजें खत्म नहीं हो जाएंगी.
अरविंद केजरीवाल ने 'भगोड़ा' होने के दाग से बड़ी कामयाबी के साथ पीछा छुड़ा लिया है.
आम आदमी पार्टी की संभावित जीत का तीसरा प्रमुख कारण कांग्रेस पार्टी का बेमन से किया गया चुनाव प्रचार भी है.
'मोदी लहर'

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पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी का आखिरी लम्हों में चुनाव प्रचार के लिए उतरना वोटरों को ये समझाने में नाकाम रहा कि पार्टी रेस में बनी हुई है.
मतदान बाद के सर्वेक्षण कांग्रेस के लिए कोई अच्छी खबर लेकर नहीं आए हैं. उसका जनाधार आम आदमी पार्टी की ओर फिसलता हुआ दिख रहा है.
कांग्रेस का पतन और 'मोदी लहर' में आए ठहराव से कहीं ज्यादा, दिल्ली चुनावों की अहमियत आम आदमी पार्टी के दोबारा उभार से है.
मीडिया का रोल

मामूली संसाधन, आंतरिक विभाजन और मीडिया के बड़े तबके की बेरुखी के बावजूद पार्टी आखिर ये कैसे कर पाई?
'आप' ने इस बुनियादी विचार को मज़बूत किया है कि एक ऐसी पार्टी की जरूरत है जो आम लोगों की बात करे. एक तथ्य यह भी है कि विधानसभा चुनावों की घोषणा से कहीं पहले उन्होंने अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया था.
यहां तक कि बीजेपी ने भी 'आप' के असंतुष्टों को अपनी ओर खींचकर सरकार बनाने की कोशिशों के पीछे अपना कीमती समय बर्बाद किया.
भ्रष्टाचार का मुद्दा

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'आप' के कार्यकर्ता दिल्ली के गरीब लोगों के बीच समर्थन जुटाने की मुहिम में लगे रहे. हालांकि शहर का अमीर वर्ग और मीडिया केजरीवाल को लेकर संशय मे बना रहा.
गरीबों ने केजरीवाल के 49 दिनों को मुफ्त पानी, घटे हुए बिजली बिल और सरकारी बाबुओं के भ्रष्टाचार में कमी के तौर पर याद किया.
इन्हीं सब के बीच 'आप' ने दिल्ली के कामकाजी लोगों को आकर्षित करने के लिए घर, शिक्षा और यहां तक कि नौकरियों का वादा किया.
पिछले चुनावों में भाजपा का साथ देने वाले महत्वाकांक्षी मध्य वर्ग को लुभाने के लिए वाई-फ़ाई सेवा की पेशकश भी की है.
दलित और मुसलमान

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अगर गरीब लोग पहले कांग्रेस को वोट दिया करते थे तो आम आदमी पार्टी ने दलितों और मुसलमानों के बीच अपनी पैठ बनाई है.
एक्ज़िट पोल से ऐसे संकेत मिलते हैं कि इस बार दिल्ली के मुसलमानों ने आम आदमी पार्टी के पक्ष में वोट दिया है. इसाईयों का रुख भी 'आप' के पक्ष में दिखता है.
मालूम पड़ता है कि इन समुदायों का भरोसा बीजेपी के 'सब के साथ' वाले नारे पर नहीं हो पाया है.
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