तीन 'टी', पांच 'पी' और सात 'सी' वाला चुनाव

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- Author, मधुकर उपाध्याय
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
हर चुनाव में ये उम्मीद की जाती है कि इस बार राजनीति में कुछ नया होगा. लेकिन वहीं पुरानी चीज़ें लौट कर आ जाती हैं जो पहले लोग देख चुके हैं, सुन चुके हैं और शायद भूल चुके हैं.
चाहें बात मुद्दों की हो या फिर राजनीतिक तौर तरीक़ों की. दिल्ली में पंद्रह महीनों के भीतर दोबारा चुनाव हो रहे हैं.
ऐसे में ये सवाल उठना लाज़िम है कि राजनीति की शतरंज में खिलाड़ी बदल जाने से क्या चालें भी बदल जाएंगी, ये ज़रूरी तो नहीं.
खंडहरों के अर्थ

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प्रसिद्ध वास्तुशिल्पी हबीब रहमान होते तो आज सौ साल के हो गए होते. 21 जनवरी को उनका सौवां जन्मदिन होता.
इस शताब्दी वर्ष में उनकी याद आना स्वाभाविक है, ख़ासकर खंडहरों के बारे में उनकी स्थापना के संदर्भ में. हबीब रहमान से दो बार मिलना हुआ.
पहली मुलाक़ात में ज़्यादातर बातचीत दिल्ली में आरकेपुरम के 'रहमान फ्लैट्स' पर हुई और दूसरी बार उजड़ती-बसती दिल्ली के खंडहरों पर.
उनका कहना था कि खंडहर सिर्फ़ यह नहीं बताते कि इमारत कभी बुलंद थी. यह खंडहरों के अर्थ का अति सरलीकरण है.
दरअसल उनकी भूमिका इससे बहुत बड़ी होती है क्योंकि वे भविष्यजीवी होते हैं. अतीत उनके साथ रहता भर है.
इमारत की संभावनाएँ

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कई बार ऐसा होता है कि अपने भविष्य का फ़ैसला खंडहर ख़ुद करते हैं. तय करते हैं कि आने वाले शहर की शक्ल कैसी होगी.
उनका संबंध केवल इमारतों तक सीमित नहीं होता बल्कि 'सोच, समाज और सियासत' तक जाता है.
दिल्ली विधानसभा चुनावों के हवाले से देखें तो लगता है हबीब रहमान की स्थापना पुनर्घटित हो रही है. यहां भी एक ध्वंसावशेष पर इमारत बनाने की दो संभावनाएं खड़ी हैं.
हालांकि नई राजनीतिक-सामाजिक इमारतें तामीर करने के दोनों वास्तुशिल्पियों के दावे नई क़िस्म के हैं, लगता है खंडहर दोनों का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं.
पुरानी तरकीबें

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कभी विशेष से शेष होते हुए ध्वंसावशेष तक पहुंची कांग्रेस की तरकीबें, जुगतें और तस्वीरें पता बदलकर कुछ भारतीय जनता पार्टी और कुछ आम आदमी पार्टी की ओर चली गई हैं.
स्वागत, संभावना, झगड़े और दावे तो हैं ही, अंतर्विरोध और अंतर्कलह तक ने ख़ामोशी से भाजपा में अपनी जगह बना ली है. पैराशूट वाले नेता आ गए हैं.
सुविधानुसार तर्क-कुतर्क की तथाकथित ख़ूबियां भी नए शिल्पियों को इन्हीं ध्वंसावशेषों से मिली हैं.
सब कुछ इस हद तक एक जैसा लगता है जैसे सिर्फ़ नामपट्टी और तारीख़ बदली हो.
खुली बहस की मांग

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आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री पद के दावेदार अरविंद केजरीवाल भाजपा की मनोनीत मुख्यमंत्री किरण बेदी से खुली बहस की मांग कर रहे हैं.
लोकसभा चुनावों के समय यही मांग भाजपा कर रही थी, नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी के बीच सीधी चर्चा के लिए.
तब कांग्रेस पार्टी पीछे हटी थी, अबकी बार भाजपा ने पैर खींच लिए. बीच खेल में गोलपोस्ट खिसका देने का प्रयास भी नया नहीं है.
कांग्रेस को कभी इसमें महारत हासिल थी. अब भाजपा कहती है कि आपको क्या चाहिए- काम या बहस? जैसे लोकतंत्र में दोनों साथ नहीं हो सकते.
अंतर्कलह का संकट

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भाजपा में अंतर्कलह इस हद तक सार्वजनिक हो गई है कि दिल्ली अध्यक्ष सतीश उपाध्याय के समर्थकों ने पार्टी मुख्यालय पर प्रदर्शन किया.
यह अभूतपूर्व नहीं था पर ऐसा था कि उसे नियंत्रित करने के लिए पुलिस बुलानी पड़ी. मीडिया की भूमिका भी खंडहरों से अप्रभावित नहीं है.
बल्कि लगता है कि जो आज दिखाई-सुनाई दे रहा है, किसी ध्वंसावशेष की खुदाई से निकला है.
नेताओं की आवाजाही, टिकट कटना-मिलना, सभा, हंगामा, रैलियां, नारे- सब दोहराव भर है.
तुकबंदियां और फिरकी

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असल मुद्दों, मसलन महंगाई, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, जनसुविधाएं, बिजली, सड़क और पानी को मशक़्क़त करनी पड़ती है कि किसी तरह चर्चा के हाशिये में शामिल हों.
कुछ भाषागत बदलाव के साथ तुकबंदियां और फिरकी डॉक्टरी भी अतीत से उठकर चली आई है.
कभी विपक्ष ने नारा दिया था 'इंदिरा हटाओ' तो इंदिरा गांधी ने कहा- वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं ग़रीबी हटाओ. आप तय करिए कि आपको क्या चाहिए.
इनकी जगह अब तीन 'टी', पांच 'पी' और सात 'सी' जैसे जुमलों ने ले ली है. आम आदमी पार्टी के लिए एक 'सी' यानी करप्शन (भ्रष्टाचार) तीसरे नंबर पर है तो भाजपा के लिए सातवें स्थान पर.
कांग्रेस बोले भी तो उसपर यक़ीन करने वाला कोई नहीं. ऐसा नहीं है कि इन चुनावों में नया कुछ भी नहीं है. लेकिन जो है उससे फ़र्क़ पड़ता नज़र नहीं आता.
राजनीति के ए और बी

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इस बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता कि टीम अन्ना के दो टुकड़े हो गए- अन्ना 'ए' मतलब आप और अन्ना 'बी' यानी बीजेपी.
इससे भी अंतर नहीं आया कि नई राजनीतिक इमारत बनाने का ख़्वाब पालने वाले दो वास्तुशिल्पी मैग्सेसे पुरस्कार विजेता हैं और आमने-सामने हैं.
और इससे भी क्या फ़र्क़ पड़ेगा कि अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इसी चुनावी गहमागहमी के बीच दिल्ली में होंगे.
गणतंत्र दिवस की परेड के साथ कुछ पुरानी इमारतें देखेंगे और यह भी देख लेंगे कि भारत में लोकतंत्र की बुनियाद कितनी मज़बूत है.
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