ये लोग बिना शर्त निंदा क्यों नहीं करते?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
अगर पेरिस हमले ने यूरोप में इस्लाम पर बहस को हवा दी है तो भारत में मुसलमानों के बीच इस हमले ने एक ऐसी बहस को जन्म दिया है जिस पर अभी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक चर्चा नहीं हो रही है.
गुरुवार की रात को मैं एक पहचान के मुसलमान युवक की शादी में शरीक हुआ. बड़े से हॉल के एक कोने में खाने पर गरमा-गर्म बहस छिड़ी थी जिससे रात के गिरते तापमान का अहसास बिलकुल नहीं हो रहा था.
नज़दीक जाने पर पता चला मुद्दे का विषय था पेरिस की एक पत्रिका के दफ्तर पर मुस्लिम चरमपंथी हमला.
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मैं एक खाली कुर्सी पर बैठकर उनकी बातचीत सुनने लगा. लोगों ने मेरी तरफ ध्यान तक नहीं दिया.
दाढ़ी वाले एक साहब काफ़ी जोश में थे. वो कहने लगे इस तरह के हमलों से इस्लाम की बदनामी होती है और बेचारा मुसलमान शक की निगाह से देखा जाने लगता है.
पागल एक-दो लोग ही होते हैं, लेकिन सज़ा हमें भुगतनी पड़ती है.

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इस दाढ़ी वाले सज्जन के बग़ल में बैठे एक युवा ने बिरयानी खाते-खाते कहा कि एक हमले ने पूरे यूरोप को एकजुट कर दिया है.
उन्होंने कहा, "यही हमला अगर कोई पागल सफ़ेद बंदूकधारी किसी कैंपस के अंदर करता तो इतना हंगामा नहीं होता."
बहस के दौरान कई लोग अपनी राय रख रहे थे. ऐसा लग रहा था कि उन्हें दूल्हा और दुल्हन या ख़ुशी के इस मौके में कोई दिलचस्पी नहीं थी.
"हिंसा के ख़िलाफ़ पर..."
उनकी बातों से समझ में आया कि पेरिस हमले की निंदा सभी कर रहे थे, लेकिन साथ ही उनमें से अधिकतर ये भी जता रहे थे कि उनके पैग़म्बर के नंगे कार्टून बनाने का उस पत्रिका को कोई हक़ नहीं था. ये इस बहस की पंच लाइन थी.

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वहां मौजूद सबसे अधिक उम्र के एक व्यक्ति ने कहा कि उन्हें तो ये मालूम भी नहीं था कि इस पत्रिका ने पैग़म्बर की इस तरह से बेइज़्ज़ती की है.
उन्होंने कहा, "मुझे जब ये पता चला कि उन्होंने पैग़म्बर मुहम्मद की बेइज़्ज़ती की है तो मेरा खून खौल गया."
उन्होंने आगे कहा कि वो हिंसा और आतंक के ख़िलाफ़ हैं. "पत्रिका पर हमला सही नहीं था और किसी की जान लेने की इस्लाम इजाज़त नहीं देता. मगर किसी को हमारे पैग़म्बर को बेइज़्ज़त करने का भी अधिकार नहीं है."

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अचानक से एक युवा जो अंग्रेज़ी और हिंदी में बारी-बारी से बोल रहा था, कहने लगा, "आप सबको पता है ये सब लोग (मीडिया वाले) बोलने और लिखने की आज़ादी की बात कह रहे हैं, लेकिन कोई उनकी ज़िम्मेदारियों की बात नहीं कह रहा. मीडिया की आज़ादी इतनी प्यारी है तो वो हिटलर की तारीफ़ करने पर लोगों को गिरफ़्तार क्यों करते हैं?"
मज़ाक़ में भी नहीं
इस पर सभी ने अपने सिर हिलाकर उनसे सहमति जताई.

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ये कहने पर कि यूरोप में भी हर चीज़ करने और कहने की इजाज़त नहीं. "हिटलर या होलोकॉस्ट पर मज़ाक में भी आप वहां कुछ नहीं कह सकते. जेल हो जाएगी."
उनकी बातों का असर लोगों पर साफ़ दिखाई दे रहा था.
दाढ़ी वाले सज्जन ने एक लम्बी सांस ली और तेज़ आवाज़ में बोले, "अभी तो लोग ग़म में डूबे हैं. जब तूफ़ान थमेगा तो लोग दुनिया के एक अरब मुसलमानों की भावनाओं को ठेस पहुँचाने पर भी चर्चा करेंगे. अभी अपनी बातें कहोगे तो लोग कहेंगे ये तो मुसलमान है इसलिए इन्हें हमले में मरने वालों का अफ़सोस नहीं."
बिना शर्त निंदा क्यों नहीं?

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बातचीत जारी थी, लेकिन मेरे घर लौटने का समय हो गया था. टैक्सी में मैं उनकी बातें याद कर ये सोच रहा था कि ये लोग पेरिस हमले की बिना शर्त निंदा क्यों नहीं करते.
साथ ही मैं अपने मोबाइल पर बीबीसी इंग्लिश ऑनलाइन में छपी पेरिस हमले पर ताज़ा ख़बरें पढ़ रहा था.

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तभी मेरी निगाह प्रकाशित एक ईमेल पर पड़ी, जिसे एक पाठक इलेस ब्रैडली ने भेजा था और जिसका हिंदी अनुवाद कुछ इस तरह है: मैं इस्लाम का कोई प्रशंसक नहीं, लेकिन जिसे करोड़ों लोग चाहते हैं उसका मज़ाक़ उड़ाना मूर्खता और बेवकूफी है. इससे नफरत के अलावा और क्या हासिल हुआ?
मुझे ये पढ़कर लगा इस तरह के सवाल उठाने वाले केवल वे मुसलमान ही नहीं हैं जो मुझे शादी में मिले थे. और बहुत लोग भी हैं. शायद इस मुद्दे पर भी आगे चलकर बहस हो.
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