क्या फ़ीस बढ़ाने से रुकेगी यौन हिंसा?

इमेज स्रोत, AP
- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
पिछले कुछ दिनों के भारतीय अख़बारों की सुर्ख़ियों पर नज़र डाली जाए तो देशभर में विभिन्न स्थानों पर, ख़ासकर स्कूलों में हर दिन छोटी बच्चियों के साथ बलात्कार की घटनाएं 'महामारी' के रूप में सामने आई हैं.
बैंगलुरू में पिछले महीने हुई एक के बाद एक घटनाओं में नर्सरी और पहली कक्षा की बच्चियों को यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया गया.
इन घटनाओं में स्कूल के ही स्टाफ़ पर बलात्कार के आरोप हैं, कोज़िकोड (केरल), अनंतपुर (आंध्र प्रदेश), कोलकाता में भी बलात्कार की घटनाएं हुई हैं और इनमें स्थानीय राजनेताओं को शामिल बताया जा रहा है.
यौन हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी क्यों हो रही है, एक विश्लेषण

चेन्नई स्थित थित तुलिर सेंटर फ़ॉर प्रिवेंशन एंड हीलिंग ऑफ़ चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज़ की निदेशक विद्या रेड्डी ने बीबीसी को बताया, "ऐसा पहले भी होता रहा था, लेकिन अब लोग खुलकर सामने आ रहे हैं. लेकिन, समाज में यौन हिंसा को रोकने के लिए व्यवस्था को और दुरुस्त करना होगा. दुर्भाग्यवश, अभी हमारे पास यह नहीं है."
मनोचिकित्सक डॉक्टर शाम भट कहते हैं, "यह महामारी उन पुरुषों की हताशा का एक हिस्सा है जो यौन हिंसा के इस अपराध में संलिप्त हैं. जब भी मौक़ा मिलता है, वे बच्चों को निशाना बनाते हैं. कुछ ऐसे भी लोग हैं, जो दिमाग़ी रूप से बीमार हैं. वे बच्चों को मिठाई का लालच देते हैं और ये लोग बच्चे के रिश्तेदार भी हो सकते हैं."
यौन हिंसा के मामले
रेड्डी और भट दोनों का मानना है कि सिर्फ़ लड़कियों के साथ यौन हिंसा के मामले ही सामने आ पाते हैं.

इमेज स्रोत, AP
रेड्डी कहते हैं, "भारतीय समाज में लड़की के कौमार्य को अहमियत दी जाती है. लड़कियों की तरह ही लड़कों के साथ भी यौन हिंसा की घटनाएं होती हैं, लेकिन वे सामने नहीं आ पातीं. आंकड़ों से सही तस्वीर का पता नहीं लगता है."
रेड्डी कहते हैं, "बच्चे स्कूलों में लंबा वक़्त गुज़ारते हैं. स्कूलों की ज़िम्मेदारी है कि वह उन्हें सुरक्षित रखें. लेकिन, स्कूल ही महामारी उद्योग का रूप ले रहे हैं. शिक्षक बच्चों के साथ समय नहीं बिताते और उनकी पसंद-नापसंद और भावनाओं से वाक़िफ़ नहीं हो पाते."
शिक्षकों के साथ रिश्ता
टीचर्स फ़ाउंडेशन की माया मेनन कहते हैं, "कोई भी बच्चे को व्यक्ति के रूप में नहीं देख रहा है. कम ही देखने में आता है कि शिक्षक और बच्चे के बीच गर्मजोशी हो. शिक्षक हमेशा कठोर नज़र आते हैं."

इमेज स्रोत, EPA
डॉक्टर भट का मानना है कि माता-पिता के बच्चों के साथ अच्छे रिश्ते होने चाहिए. पांच-छह साल की उम्र में बच्चा अच्छे और बुरे स्पर्श को समझने लगता है.
माता-पिता को चाहिए कि वह सुरक्षा के लिहाज़ से स्कूल का मूल्यांकन करें. कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी पिछले हफ़्ते कहा है कि बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना स्कूलों की ज़िम्मेदारी है.
कोर्ट ने सरकार के दिशानिर्देशों को लागू करने के आदेश दिए.
स्कूलों की समस्या

इमेज स्रोत, AP
लेकिन, स्कूलों की भी एक समस्या है. सीसीटीवी कैमरा लगाने और शिक्षकों और अन्य कर्मचारियों की पृष्ठभूमि जांचने के लिए मोटी रक़म की ज़रूरत होगी.
कर्नाटक प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट फ़ेडरेशन के शशि कुमार कहते हैं, "सभी स्कूल संपन्न नहीं हैं. राज्य मे लगभग 14 हज़ार स्कूल हैं जो इन दिशानिर्देशों को पूरा नहीं कर सकते. यही वजह है कि हम सरकार से फ़ीस बढ़ाने की इजाज़त देने की मांग कर रहे हैं."
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml%20" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi%20" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi%20" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>












