सियासी दंगों की क्या कोई सज़ा नहीं?

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- Author, शकील अख़्तर
- पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, दिल्ली
तीस साल पहले 1984 में इन्हीं दिनों पूरी दिल्ली अपने इतिहास के एक खौफनाक दौर से गुजर रही थी.
दो सिख अंगरक्षकों के हाथों प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या से पूरे शहर में कर्फ्यू लगा हुआ था. हर तरफ हमलावरों का हुजूम सिख समुदाय के लोगों को तलाश रहा था.
एक नवंबर की दोपहर तक एकजुट होकर उपद्रवियों ने शहर के कई इलाकों में आग लगा दी थी. आसमान में हर तरफ सिर्फ धुआं ही दिखाई दे रहा था.
हज़ारों सिखों ने जान बचाने के लिए गुरुद्वारों में शरण ले रखी थी. वातावरण में हल्की-हल्की खुनकी आ चुकी थी और हवाओं के साथ दूर-दराज से महिलाओं और बच्चों के रोने की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं.
सड़कों पर हत्यारों की भीड़ पुलिस और राजनीतिक संरक्षण के साथ सिखों और उनकी संपत्ति पर हमले कर रहे थे. सदियों के रिश्ते एक पल में बिखर गए थे. जो पड़ोसी थे अजनबी बन गए. हालात बेहद खराब थे.
शकील अख्तर का विश्लेषण

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तीन दिन के भीतर दंगाइयों की भीड़ ने दिल्ली में तीन हज़ार से ज्यादा सिखों को मौत के घाट उतारा था. पांच हजार से ज्यादा सिख गंभीर रूप से घायल हुए थे.
सिखों के हजारों मकानों और दुकानों को लूटने के बाद आग के हवाले कर दिया गया था. ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि 1984 के सिख विरोधी दंगों में उस वक्त सत्तारूढ़ कांग्रेस के कई स्थानीय नेताओं ने भूमिका निभाई थी.
सिखों के जनसंहार पर नए प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तब कहा था, "जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है."
30 वर्ष तक पीड़ितों और दंगाइयों की पहचान और उन्हें सज़ा दिलाने के लिए हर संभव प्रयास किए जाते रहे लेकिन हजारों मासूम इंसानों के हत्यारे कानून की पकड़ में न आ सके.
सिख संगठनों, विपक्षी दलों, मानवाधिकार संगठनों और अंतरराष्ट्रीय दबाव के परिणामस्वरूप तीन हजार लोगों की हत्या के लिए बमुश्किल 49 अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा हो सकी.
गोधरा की घटना

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स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह सबसे बड़े दंगों में से एक था. इसके बाद भागलपुर में दंगे हुए. फिर लालकृष्ण आडवाणी की अगुआई में हुए राम जन्मभूमि आंदोलन और बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद देशव्यापी दंगों में बहुत से लोग मारे गए.
केवल मुंबई में दिसंबर 1992 और जनवरी 1993 के दंगों में एक हज़ार से ज्यादा मुसलमान मारे गए.
आख़िरी बड़ा दंगा 2002 में गोधरा में एक ट्रेन में 67 कारसेवकों को ज़िंदा जलाए जाने के बाद गुजरात के अलग-अलग स्थानों पर फूटा. इनमें भी एक हजार से अधिक मुसलमान मारे गए.
जानकार लोग शुरू से यह कहते रहे हैं कि अगर सरकार ने 1984 के सिख विरोधी दंगों के अपराधियों को उसी समय सजा दी होती तो इस शर्मनाक घटना के बाद शायद भविष्य में बड़े पैमाने पर दंगे न होते.
भागलपुर दंगे

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लेकिन भारत में धर्म के नाम पर होने वाले दंगों में राजनीतिक दलों और अक्सर सत्ताधारी दल का हाथ होने के आरोप लगते रहे हैं.
और अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण हासिल होने की बात भी कही जाती रही है. इसलिए वह कानून की पकड़ में नहीं आते.
पिछले 30 वर्षों में शायद भागलपुर की ही एक ऐसी घटना है जिसके 20 साल से अधिक गुजर जाने के बाद, बिहार की पिछली भाजपा और जदयू सरकार ने न केवल पीड़ितों को मुआवज़ा दिया बल्कि कई दंगाइयों को सख्त सजाएं भी दी गईं.
कुछ हद तक यही स्थिति गुजरात के दंगों की भी है. मोदी सरकार ने दंगों की जिस तरह जांच की थी और उन्हें अदालतों में जैसे पेश किया उसके बाद उनके आलोचकों ने कहा कि उसी के चलते ज्यादातर मामलों में दंगाई कानून से बच गए.
भविष्य में?

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लेकिन मानवाधिकार संगठनों के जबरदस्त संघर्ष के बाद सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जब महत्वपूर्ण मामलों की दोबारा जांच हुई और उन्हें अदालत में पेश किया गया तो कई अभियुक्तों को सजाएं मिलीं.
धर्म के नाम पर होने वाले दंगों पर काबू पाने के लिए एक विधेयक संसद में विचाराधीन है. लेकिन इस बिल से पहले देश के राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में कानून सबसे ऊपर है.
आज दुनिया बहुत छोटी हो चुकी है. आज कहीं भी होने वाले अत्याचार के खिलाफ आवाज उठती है.
1984 के हत्यारे भले ही राजनीतिक अंधेरे का फायदा उठाकर कानून की गिरफ्त से निकल गए हों लेकिन भविष्य में शायद उनका बच निकलना आसान न हो और वह भी कानून की चपेट में आएंगे जो समर्थन कर रहे होंगे.
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