क्या 1984 दंगों की निंदा करेगी संसद?

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- Author, मनोज मित्ता
- पदनाम, लेखक और क़ानूनी मामलों के पत्रकार
अमरीका में 9/11 के बाद के घटनाक्रम पर अमरीकी संसद ने एक प्रस्ताव पारित करते हुए "अमरीकी सिख नागरिकों के ख़िलाफ़ कट्टरता और हिंसा की निंदा'' की थी.
हमले के बाद पैदा हुए हालात में सिख अमरीकियों को अरब समझकर उन पर कुछ जगह हमले किए गए थे. इनमें से गंभीर मामला सिर्फ़ एक ही था पर अमरीका में उच्च स्तर इसका संज्ञान लिया गया.
लेकिन इसके ठीक विपरीत, 2001 से 17 साल पहले, भारत के सिखों के प्रति संसद ने का रुख़ तिरस्कार वाला था.
दिल्ली में हुए खूनखराबे के दो महीने के अंदर हुए लोकसभा चुनाव में मिली आद्वितीय बहुमत से उत्साहित राजीव गांधी सरकार को लगा कि सिर्फ़ इंदिरा गांधी को श्रद्धांजलि देने वाला प्रस्ताव पारित करना काफ़ी है.
करीब उसी समय- जनवरी, 1985 में- संसद ने भोपाल गैस पीड़ितों को लेकर चिंता ज़ाहिर की थी. लेकिन उस जनसंहार के लिए संसद ने कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया जिसमें सरकारी आंकड़ों के अनुसार दिल्ली में ही मृतकों की संख्या 2,733 थी.
सिख दंगों पर किताब के लेखक मनोज मित्ता:

इस तुलना का मतलब यह कहना नहीं है कि 'दुनिया का सबसे पुराना लोकतंत्र' वस्तुतः 'दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र' के मुकाबले ज़्यादा भला या ज़्यादा मानवीय है.
अमरीका में सिखों के पक्ष में कांग्रेस प्रस्ताव के पीछे चाहे जो राजनीति रही हो इससे ऐतिहासिक विडंबना का दंश कम नहीं हो सकता कि भारत में सिखों को निशाना बनाकर की गई हिंसा पर ध्यान देने में भारतीय संसद नाकाम रही.
1984 के सिख जनसंहार के 30 साल बाद संसद के सामने अपनी उस भूल को सुधारने का मौका है.
लेकिन देर से ही सही, संसद के लिए यह उचित होगा कि अब ही 1984 की हिंसा पर एक प्रस्ताव पारित करे, चाहे कहा ये जाता है कि देश अब उस घटना से काफ़ी आगे बढ़ गया है.
यह सच है कि इतने सालों बाद 1984 के जनसंहार पर ऐसा प्रस्ताव उन पीड़ितों के राहत के भाव को छीन सकता है, जो आज भी ज़िंदा हैं.
लेकिन संसद का ऐसा भाव प्रदर्शन महज़ प्रतीकात्मक ही नहीं होगा, हालांकि वह उससे हो चुके नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती.
यह सच है कि इतने सालों बाद 1984 के दंगों पर ऐसा प्रस्ताव उन पीड़ितों के घाव को भरने में काफी नहीं होगा जो आज भी जीवित हैं लेकिन ये प्रतीकात्मक महत्व वाला एक कदम होगा.

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एक स्तर पर ऐसा प्रस्ताव न्याय व्यवस्था के लिए पैग़ाम होगा कि 1984 से जुड़े मामलों में न्याय होना चाहिए. 1984 के दंगों से जुड़े हत्या के एक दर्जन से ज़्यादा मामलों में मात्र 30 लोगों को सज़ा हुई है.
एक अन्य स्तर पर इसका महत्व दंगा पीड़ितों के द्वारा झेले गए अन्याय से बढ़कर है.
'मोदी की चिंता'
भारतीय लोकतंत्र की अनिश्चितताओं के बीच यह नैतिकता के एक झोंके की तरह होगा.
चूंकि 1984 में सिखों को 'सबक सिखाने के विचार' को चुनावी समर्थन मिला था, इसलिए राजीव गांधी सरकार के सामने ऐसा प्रस्ताव पारित करने का सवाल ही नहीं उठा.
यहां तक कि 2009 में सिख विरोधी दंगों की 25वीं वर्षगांठ पर भी, जब कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का मुखिया एक सिख यानी मनमोहन सिंह थे, सारे श्रद्धांजलि समारोह सिर्फ़ इंदिरा गांधी की हत्या को लेकर हुए.

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लेकिन मोदी के सामने इस तरह की परिस्थिति नहीं है.
हालांकि ये संभव है कि मोदी इस मुद्दे को छूने से परहेज़ करें क्योंकि इससे 2002 गुजरात दंगों का मामला भी उछल सकता है, जिसमें उनका नाम घसीटा जाता रहा है .
दरअसल 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान ऐसा लगता था कि दोनों बड़ी पार्टियों में यह सहमति बन गई थी कि वो 1984 और 2002 दंगों के मुद्दों पर खामोश रहेंगी.
अगर मोदी 1984 के दंगो को सरकारी तौर पर किसी रूप में याद रखने की मांग को स्वीकार कर लेते हैं तो उन्हें ख़तरा इस बात का होगा कि विपक्ष में से कोई 2002 के दंगों को लेकर इसी तरह की मांग उठा सकता है.
दूसरी ओर अमरीका का रिकॉर्ड अपने इतिहास का सामना करने को लेकर बेहतर रहा है. साल 1988 में अमरीकी कांग्रेस ने जापानी मूल के उन अमरीकियों को क्षतिपूर्ति के लिए अध्यादेश जारी किया जिन्हें द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नज़रबंदी शिविरों में भेजा गया था.
हाल ही में जापान और अमरीका का दौरा करके लौटे मोदी इससे सबक हासिल कर सकते हैं.
(मनोज मित्ता सिख दंगों पर किताब 'वेन अ ट्री शुक डेल्ही' के लेखक हैं.)
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