विजयपथ पर मोदी, अग्निपथ पर कांग्रेस

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह

इमेज स्रोत, Other

    • Author, आकार पटेल
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

राजनीति कई संभावनाओं और त्रासदियों को साथ लिए चलती है.

महाराष्ट्र में कल तक चौथे नंबर पर रही बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है और सत्तारूढ़ कांग्रेस सत्ता के पहले पायदान से खिसककर तीसरे स्थान पर पहुँच गई है.

सीनियर पार्टनर होने का दावा भरने वाली शिवसेना की ताकत अपने जूनियर पार्टनर की हैसियत से कहीं पीछे छूट गई है.

लेकिन राजनीति हमेशा ही आंकड़ों का खेल नहीं होती. इस चुनाव में किसी ने बहुत कुछ पाया है तो किसी ने लगभग सब कुछ गंवा भी दिया है.

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भाग ले रहे हर किसी का कुछ न कुछ दांव पर तो ज़रूर लगा हुआ था.

आकार पटेल का विश्लेषण

सोनिया गांधी, राहुल गांधी

इमेज स्रोत, Reuters

महाराष्ट्र के चुनावी नतीजों ने राज्य में गांधी परिवार के असर को खत्म कर दिया है.

25 सितंबर को जब ये साफ़ हो गया था कि भारतीय जनता पार्टी शिवसेना से अपना गठजोड़ तोड़ रही है तो उस वक्त भी कांग्रेस के पास शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन बनाए रखने के लिए वक्त था.

अगर ये हुआ होता तो रविवार को आए चुनावी नतीजों में कांग्रेस और एनसीपी को बहुमत मिलता. पार्टियों को मिले वोट इसी ओर इशारा करते हैं.

शुरुआती आंकड़ें बताते हैं कि इतनी ज़बर्दस्त कामयाबी के बाद भी बीजेपी को महज 32 फीसदी वोट ही मिल पाए हैं.

इसका मतलब ये हुआ कि त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस-एनसीपी दोनों भगवा पार्टियों का सूपड़ा साफ कर गई होती.

राजनीतिक समझदारी

प्रियंका गांधी को आगे लाने के लिए मांग करते कांग्रेस समर्थक

इमेज स्रोत, Other

26 सितंबर को जब ये तय हो गया कि इस चुनाव में चौकोना मुकाबला होगा तो उसी के साथ सोनिया गांधी और राहुल गांधी की काबिलियत और उनकी राजनीतिक समझदारी पर सवाल खड़े हो गए.

शरद पवार ने कहा कि सोनिया गांधी गठजोड़ के लिए इच्छुक थीं लेकिन पार्टी की राज्य इकाई ऐसा नहीं चाहती थी.

इससे लगता है कि कांग्रेस और एनसीपी बीजेपी को जितना नापसंद करते थे, उससे कहीं ज्यादा एक दूसरे से नफ़रत.

ये नतीजे बीजेपी के लिए अच्छे हैं लेकिन इसे ज़बर्दस्त जीत नहीं कहा जा सकता है.

बस 20 सीटें और मिल जातीं और उसे शिवसेना से हमेशा के लिए छुटकारा मिल जाता. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.

इसमें कोई शक नहीं है कि बीजेपी महाराष्ट्र विधानसभा की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है.

इसके साथ ही यह भी साबित हो गया है कि गठबंधन की सीनियर पार्टनर बने रहने की उद्धव ठाकरे की जिद पूरी तरह से ग़लत थी.

सीनियर पार्टनर

शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे

इमेज स्रोत, Other

अच्छे उम्मीदवारों को चुनने के लिए बीजेपी को बहुत कम समय मिला. इससे पार्टी के एक तबके को लगेगा कि भविष्य में और बेहतर नतीजे आ सकते हैं.

शिवसेना के लिए भी इन चुनावी नतीजों के कुछ मायने हैं.

गठबंधन में भले ही उसने सीनियर पार्टनर का अपना रुतबा खो दिया हो लेकिन कम से कम फिलहाल के लिए ही सही बीजेपी को उसकी ज़रूरत है.

हालांकि शिवसेना के लिए ये नतीजे कई बुरी खबरें साथ लिए आए हैं. सेना को तकरीबन 16 फीसदी के आस-पास वोट मिले हैं.

पिछले चुनावों में भी शिवसेना की हिस्सेदारी करीब करीब यही रही थी.

लेकिन उसने मुंबई का किला बीजेपी के हाथों गंवा दिया है. यह सेना के भविष्य के लिए खराब संकेत हैं.

अगर दोनों सहयोगी सरकार बनाने के लिए साथ आ भी गए तो उनकी पार्टनरशिप असहज ही होगी. यह कुछ कुछ कांग्रेस एनसीपी के गठजोड़ की याद दिलाएगा.

हिंदू एजेंडा

देवेंद्र फडनीस

इमेज स्रोत, Other

चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के खिलाफ शिवसेना ने जिस भाषा का इस्तेमाल किया था और दोनों पार्टियों की रणनीति के मद्देनज़र देखें तो दोनों के दरम्यां गहरे अंदरूनी मतभेद होंगे.

शिवसेना को हमेशा इस बात का संशय रहेगा कि बीजेपी अपना अलग रास्ता बनाने की जुगत में है.

और महाराष्ट्र की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर साबित कर चुकी बीजेपी खुद को एकलौती हिंदू एजेंडे वाली पार्टी के तौर पर अपना विस्तार करना चाहेगी.

तुलनात्मक रूप से देखें तो एनसीपी बेहतर स्थिति में है, भले ही उसने कुछ सीटें गंवाई है. वह चाहे तो शिवसेना के साथ जा सकती है या फिर बीजेपी के साथ.

वो चाहे तो प्रमुख विपक्षी पार्टी की भूमिका निभा सकती है. वह चाहे तो कांग्रेस के साथ अपना दोस्ताना बरकरार रख सकती है.

हालांकि पवार परिवार देश भर में कांग्रेस के किलों को ढहते देखने के इंतज़ार में होगा. फिलहाल ऐसी स्थिति है कि कांग्रेस के साथ एनसीपी का न तो राज्य में कोई गठजोड़ है और न ही केंद्र में.

सत्ता का विजयपथ

राज ठाकरे

इमेज स्रोत, AFP

इमेज कैप्शन, चुनावी नतीजों ने राज ठाकरे की मनसे को लगभग अप्रासंगिक कर दिया है.

आंकड़ों के लिहाज से देखें तो राज ठाकरे राज्य की राजनीति में कुछ वक्त पहले ही अप्रासंगिक हो चुके हैं.

विधानसभा में मनसे की सीटों के और कम होने का मतलब है कि बेकार की बातों और हिंसक मुद्दों को उठाने के लिए राज ठाकरे पर समर्थकों का दबाव बढ़ेगा. महाराष्ट्र में यह हर किसी के लिए बुरी खबर है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए चुनावी नतीजे सत्ता के विजयपथ पर लगातार आगे बढ़ने जैसे हैं.

कुछ लोग ये कह सकते हैं कि महाराष्ट्र में सत्ता से कुछ दूर रह जाने की वजह से हरियाणा में मिली जीत उतनी ज़ायकेदार नहीं हो पाई जितनी की हो सकती थी.

लेकिन मोदी नतीजों को इस तरह से नहीं देख रहे होंगे. शिवसेना से अलग होने का उनका दांव चल गया है.

और इन हालात का फायदा उठाने लायक गांधी परिवार के पास समझदारी नहीं थी. मोदी की अपराजेय छवि को तोड़ने का इस बार कांग्रेस के पास बेजोड़ मौका था लेकिन वे चूक गए.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के <link type="page"><caption> एंड्रॉएड ऐप</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link> के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>