100 दिनः मीडिया और पाक पर मोदी का निशाना

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- Author, आकार पटेल
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो देश उन्हें काफ़ी उम्मीद से देख रहा था. उन्होंने वादे भी तमाम किए.
अब उनको प्रधानमंत्री बने सौ दिन पूरे हो रहे हैं. इस दौरान मोदी अपने किए वादों पर कितने खरे उतरे?
क्या आम लोगों की उम्मीदों को वे पूरा करने में कामयाब हुए? राजनीतिक विश्लेषक आकार पटेल की मानें तो इस दौरान मोदी नरम पड़े हैं लेकिन अपने दो दुश्मनों के साथ नरमी नहीं दिखा पाए हैं?
पढ़िए आकार पटेल का विश्लेषण, विस्तार से
प्रधानमंत्री के तौर पर पहले सौ दिन में नरेंद्र मोदी ने मोटे तौर पर अच्छा काम किया है. चुनाव अभियान के दौरान अपने समर्थकों से किया गया कोई वादा अगर पूरा नहीं भी होताा है, तो मेरे विचार में इसमें ख़राबी नहीं है. लोकतंत्र में आमतौर पर ऐसा होता है कि चुनाव अभियान के दौरान किए गए गैर जरूरी वादों की हवा निकल जाती है और सत्ता में आने के बाद व्यवहारिक रवैया अपनाया जाता है.
उन्होंने वित्तीय नीतियों में बदलाव नहीं किया है. अर्थशास्त्रियों के मुताबिक मोदी सरकार का बजट यूपीए सरकार की नीतियों के अनुसार ही रहा.
वे पड़ोस के कई देशों में गए और सम्बंधों को आगे बढ़ाने में नई पहल दिखाई.
इस बात पर बहस हो सकती है कि उनके किए बदलाव ज़्यादा दिन तक नहीं चलेंगे और काफ़ी मज़बूत नहीं हैं. मेरे विचार से ये कोई ग़लत बात नहीं है.

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मोदी का लचीला रुख
कुछ ही दिन पहले जब जापानी पत्रकारों ने मोदी का साक्षात्कार लिया. इस पर हिंदू अख़बार में एक रिपोर्ट छपी जिसमें प्रधानमंत्री का बयान है, "ऐसे मसलों पर राष्ट्रीय सहमति और निरंतरता की परंपरा रही है. मैं कह सकता हूं कि मौजूदा समय में, हम अपने परमाणु नीतियों की समीक्षा के लिए कोई पहल नहीं कर रहे हैं." ये दिलचस्प बयान है क्योंकि पार्टी और उसके घोषणापत्र की लाइन बिल्कुल दूसरी है.
इस मसले पर मोदी को दुनिया भर को निश्चिंत करने की क्या जरूरत है वो भी सावधानी से चुने हुए शब्दों के सहारे? ऐसा इसलिए है कि ये बेहद अहम सामरिक मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी की नीतियों से एकदम उलट बात है.

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चुनाव अभियान के दौरान मोदी ने अपने <link type="page"><caption> घोषणा पत्र (पृष्ठ 39</caption><url href="http://www.bjp.org/images/bjp_manifesto_an_abridged_version_english_26.04.14.pdf" platform="highweb"/></link>) पर दावा किया था, "भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के वक्त परमाणु कार्यक्रम में हासिल सामरिक फ़ायदों को कांग्रेस ने व्यर्थ कर दिया. इसलिए भारत की परमाणु नीतियों की समीक्षा होगी, इसे अपडेट कर मौजूदा समय के लिहाज से प्रासंगिक बनाया जाएगा."
घोषणा पत्र में ये भी कहा गया था, "हमारा पहले भी और अब भी जोर यही है कि हम नीतियों को 21वीं सदी के भारतीय हितों के मुताबिक बनाएंगे. हम दो स्तरीय स्वतंत्र परमाणु कार्यक्रम अपनाएंगे, जो विदेशी दबावों और प्रभावों से मुक्त होगा, जो सैन्य उद्देश्य के साथ साथ आम लोगों के लिए कारगर होगा क्योंकि परमाणु ऊर्जा भारत के ऊर्जा क्षेत्र का मुख्य अंशदाता है."
लेकिन अब मोदी कह रहे हैं कि समीक्षा की कोई जरूरत नहीं है और निरंतरता कायम रहनी चाहिए. या तो प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसकी जरूरत के बारे में समझा है या फिर वे जो घोषणा पत्र मे कह रहे थे, उससे उन्हें मतलब नहीं रह गया है.
पाकिस्तान से बातचीत नहीं
दूसरे पहलू को लेकर मैं संदिग्ध हूं. क्योंकि यह गैर जरूरी था, यह मतदाताओं के लिए कोई मुद्दा नहीं था. उन्होंने इसे जानबूझकर घोषणा पत्र में डलवाया ताकि वो अपने ताक़त का प्रदर्शन कर सकें और अपने कट्टर समर्थकों को प्रसन्न कर सकें.
लेकिन, जैसा कि मैं ने पहले कहा, यह अच्छा संकेत है कि वे लचीला रुख अपना रहे हैं.

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जापान जिस दूसरे मुद्दे पर भारत से स्पष्ट राय जानने को उत्सुक दिखा, प्रेस विज्ञप्ति के मुताबिक वो पाकिस्तान का मसला है. इस पहलू पर भी मोदी को आंका जा रहा है.
उन्होंने कहा, "शिमला समझौते और लाहौर घोषणा के मुताबिक द्विपक्षीय फ्रेमवर्क में किसी भी मुद्दे पर बातचीत करने को लेकर भारत को कोई हिचक नहीं है. लेकिन पाकिस्तान ने इसे तमाशा बनाने की कोशिश करते हुए विदेश सचिव स्तर की वार्ता से ठीक पहले नई दिल्ली में जम्मू एवं कश्मीर के अलगाववादियों से बातचीत की, इससे हम काफ़ी निराश हैं."
मोदी ने साथ में ये भी कहा है कि किसी भी तर्कसंगत द्विपक्षीय बातचीत के लिए आतंकवाद और हिंसा से मुक्त वातावरण की जरूरत भी है.
एक टीवी डिबेट शो में मैं भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता एमजे अकबर के साथ शामिल हुआ था. अकबर दावा कर रहे थे कि सीमा रेखा पर होने वाली फ़ायरिंग के चलते बातचीत रद्द की गई. (हालांकि बातचीत रद्द होने के बाद फ़ायरिंग शुरू हुई थी.)

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सच्चाई यह है कि बीजेपी उस देश के साथ बातचीत नहीं करना चाहती है जिसे दुश्मन के तौर पर देखा जाता है.
मीडिया से दुश्मनी
मोदी की कुछ पुरानी आदतें भी नहीं गई हैं. एक तो मीडिया को वे तिरस्कार की नजरों से देखते हैं. यह ठीक है कि वे मीडिया के निशाने पर रहे हैं लेकिन वे इकलौते नहीं हैं.
राहुल गांधी, अरविंद केजरीवाल, मायावती और मुलायम सिंह यादव, सब मीडिया के निशाने पर आते रहे हैं. लेकिन मोदी इसे हमेशा व्यक्तिगत तौर पर लेते हैं.
जापान के राजा अकिहितो से मुलाकात के बाद उन्होंने कहा, "मैं ने उन्हें उपहार में गीता दी है. मुझे नहीं मालूम कि इस मुद्दे पर भारत में क्या होगा? इस पर टीवी पर बहस होगा. हमारे धर्मनिरपेक्ष मित्र इस पर तूफ़ान खड़ा कर देंगे कि मोदी अपने बारे में क्या सोचते हैं? वे अपने साथ गीता ले गए इसका मतलब है कि वे सांप्रदायिक हैं."

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मोदी ने आगे ये भी कहा, "खैर, मीडिया को भी आजीविका चाहिए और अगर मैं वहां नहीं रहूं तो वे अपनी आजीविका कैसा कमाएंगे?"
यह अनुचित था. क्योंकि भारत में अकिहितो को गीता दिए जाने पर किसी को कोई आपत्ति नहीं थी. मोदी जैसा विचार कर रह थे, वैसी कोई आलोचना भी नहीं हुई.
पाकिस्तान और मीडिया, अपने दो दुश्मनों के साथ गैर लचीले रूख़ को अगर छोड़ दें तो मोदी ने पहले सौ दिन में अच्छा प्रदर्शन किया है. दुनिया भर में उनके कई फैंस बने हैं और उनमें संयम और निरंतरता का भाव भी दिखा है जिसके चलते बाज़ार में भी उत्साह है.
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