मोदी के सौ दिन और वादों का सच

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    • Author, ज़ुबैर अहमद
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अहमदाबाद से

नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में 100 दिन और उसके पहले उनके चुनाव प्रचार के 100 दिन- दोनों में कौन अधिक रोमांचक रहे? मेरे विचार में चुनाव प्रचार वाले 100 दिन कहीं अधिक उत्साह से भरे थे.

नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषणों ने लोगों की उम्मीदें काफ़ी बढ़ा दी थीं. उन्होंने 'गुड गवर्नेंस' का वादा किया. हमसे कहा गया था अच्छे दिन आने वाले हैं.

लोगों ने उनके वादों पर भरोसा किया और भारी बहुमत से उन्हें अपना प्रधानमंत्री चुना. उस समय भारतीयों में ज़बरदस्त जोश देखा गया. मोदी की कामयाबी को एक नए भविष्य और एक नए दौर का आग़ाज़ माना गया.

नरेंद्र मोदी का शपथग्रहण समारोह किसी बादशाह की ताजपोशी से कम नहीं था. पड़ोसी देशों के लीडरों को अपनी ताजपोशी में शामिल करके उन्होंने देशवासियों के बीच अपना कद ऊंचा कर लिया था. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ से हाथ मिला कर दोनों देशों में शांति की उम्मीद जगा दी.

नए दौर की उम्मीद

सपनों, उम्मीदों और आशाओं के एक नए दौर ने जन्म ले लिया था. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ युद्ध का ऐलान और काला धन देश वापस लाने के शपथ से भ्रष्ट मुक्त भारत के एक उज्जवल दौर में प्रवेश करने के लिए स्टेज तैयार था.

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लेकिन 100 दिन बाद उत्साह में कमी आई है और महंगाई में तेज़ी. जोश थोड़ा ठंडा होता नज़र आता है. पिछली तिमाही के दौरान विकास दर थोड़ा बढ़ी है लेकिन इस तिमाही के आखिरी कुछ हफ़्तों में ही वो सत्ता में आए थे इसलिए इसमें उनका कोई ख़ास योगदान नहीं था.

काले धन की वापसी के लिए गठित एक समिति बनने के बाद इस पर चर्चा सुनाई नहीं देती. भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लड़ाई शुरू होती नज़र नहीं आती.

मोदी के राज्य गुजरात में उनकी राजनीतिक उड़ान पर नज़र रखने वालों का कहना है कि वो शब्दों को वाक्यों में पिरोने के बेताज बादशाह हैं लेकिन शब्दों को अमली जामा पहनाने में उनकी महारत नहीं है. एक ने कहा वो सपनों के सौदागर हैं.

कम हुआ उत्साह

असंतोष की ध्वनि के बीच नरेंद्र मोदी सरकार ने 36 पन्नों की एक पुस्तिका प्रकाशित की है जिसे भाजपा के सांसदों के हवाले किया गया है ताकि वो जनता को सरकार की उपलब्धियां बताएं.

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लेकिन उनके पास अपनी उपलब्धि गिनाने के लिए कुछ ख़ास है नहीं. उनके आलोचक कहते हैं इस स्टेज पर कोई उनकी उपलब्धि पूछना नहीं चाहता, हाँ इन 100 दिनों में उन्हें अपना विज़न और सरकार की योजनाओं से जनता को आगाह करवा देना चाहिए था.

संभव है कि वो आगे सरकार की योजनाएं बताएँगे, अपना विज़न स्पष्ट करेंगे. अपना रोड मैप लोगों को बताएंगे. समय उनके पास है. लेकिन उनकी सरकार के 100 दिन का रिकॉर्ड को देखने के बाद लोग पूछने लगे हैं कि अच्छे दिन कब आएंगे.

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