क्या मियां नवाज़ से मोदी फिर मिलेंगे?

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- Author, आकार पटेल
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
प्रधानमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी ने कई ऐसी चीजें कीं, जो उनके चुनावी वादों से उलट थीं.
उदाहरण के लिए नागरिकों का डेटाबेस बायोमेट्रिक तरीके से इकट्ठा करने वाली 'आधार' परियोजना को ही लें जिसका मोदी ने मुखर विरोध किया था.
इस बात की आशंका जताई गई थी कि भारत में अवैध तरीके से रह रहे बांग्लादेशी लोगों को इससे वैधता मिल जाएगी या वे उन सरकारी सहूलियतों के हकदार हो जाएंगे जो उनके लिए नहीं होतीं.
लेकिन इंफ़ोसिस के अरबपति और कंपनी छोड़कर सामाजिक जीवन में आने वाले आधार परियोजना के कर्ताधर्ता नंदन नीलेकणी से एक ही मुलाकात के बाद मोदी ने अपना मन बदल लिया.
मुझे लगता है कि कदम वापस खींचने का ये फैसला एक बहुत अच्छी चीज है. इस लिहाज से भी कि एक अच्छी परियोजना को चलते रहना चाहिए और इस ख्याल से भी कि मोदी इतने व्यावहारिक और लचीले हैं कि वे किसी मुद्दे पर अपना घोषित स्टैंड बदल सकते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार आकार पटेल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पाकिस्तान नीति और उससे जुड़े पहलुओं की पड़ताल की है.
पढ़िए मोदी की पाकिस्तान नीति का विश्लेषण

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जटिलता भरे देशों में शासन चलाने के लिए मौके की नजाकत के हिसाब से समझौता करने की जरूरत होती है. लेकिन मुझे हमेशा ये लगता है कि जब भी पाकिस्तान की बात आती है, चीजें बदल जाती हैं.
चुनाव प्रचार अभियान के दौरान मोदी ने हमारे पश्चिमी पड़ोसी के ख़िलाफ़ जो सख़्त रवैया दिखलाया था, वह बदलने वाला नहीं है.
पाकिस्तान को लेकर नापसंदगी, इसके लिए शायद सही लफ़्ज़ नफ़रत है, मोदी की वाकपटुता या प्रचार के दौरान लिए गए सार्वजनिक स्टैंड का महज हिस्सा भर नहीं है. बल्कि दुनिया को देखने का ये उनका नजरिया है.
दोनों देशों के विदेश सचिवों के स्तर की बातचीत को रद्द करना इसी का एक पहलू है. किसी ऐसे मुद्दे पर दोस्ताना तौर तरीकों के साथ बातचीत करने से मोदी को राहत मिल गई जो कि वह वास्तव में नहीं चाहते थे.
एकला चलो

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हमें उम्मीद करनी चाहिए कि लचीले मोदी दोबारा दिखेंगे और बांग्लादेश सहित विदेश नीति से जुड़े दूसरे मुद्दों पर शायद अक्सर दिखेंगे लेकिन जहाँ तक पाकिस्तान का सवाल है, वे अपनी ज़िद पर कायम रहेंगे.
ऐसी खबरें हैं कि प्रधानमंत्री ने विदेश मंत्रीसुषमा स्वराज की परवाह किए बगैर बातचीत से कदम खींचने का फैसला खुद लिया.
मुझे नहीं पता कि इसमें कितनी सच्चाई है लेकिन अगर ऐसा है तो मेरे लिए ये हैरत की बात नहीं है. पाकिस्तान के मुद्दे पर निजी वजहों से लिया गया ये फैसला मोदी की एकला चलो वाली कार्यशैली और विचारधारा, दोनों के ही माकूल है.
हालांकि ज्यादातर भारतीय अखबारों ने बातचीत से हटने के फैसले का समर्थन किया पर मुझे लगता है कि ये गलती है. सत्ता में आने के बाद से यह मोदी की पहली बड़ी गलती है. ये फैसला भावनाओं में बहकर लिया गया है.
हुर्रियत

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इससे कुछ बहुत ज्यादा हासिल होने वाला नहीं है और जब तक कि हम ये उम्मीद छोड़ न दें कि पाकिस्तान हुर्रियत से बातचीत बंद कर देगा, जो नहीं होने वाला है, भारत को अपना फैसला बदलना पड़ सकता है.
बातचीत से हटने के फैसले से ऐसा माहौल बना है कि सब कुछ हमारे हाथ में है लेकिन अगर पाकिस्तान नहीं झुका तो फिर से वार्ता शुरू करने का फैसला लेने का दबाव भारत पर होगा.
दुनिया भी भारत के इस कदम का समर्थन नहीं कर पाएगी और खासकर तब जबकि तनाव दोबारा बढ़ते हैं. 'इंडियन एक्सप्रेस' अखबार में छपी एक रिपोर्ट इस पहलू को सही तरीके से उठाती है.
रिपोर्ट में में इंस्टीट्यूट ऑफ़ कॉन्फ्लिक्ट मैनेजमेंट के अजय साहनी को ये कहते हुए बताया गया है, "सच कहें तो हुर्रियत के साथ बैठक को भारत पाक रिश्तों की कसौटी बनाने की बात में मैं कोई समझदारी नहीं देखता हूँ. यह वैसा ही है कि सरकार ये कहे कि लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर हमारे सैनिकों पर गोली चलाने वाले पाकिस्तान के साथ तो हम रह सकते हैं लेकिन अलगाववादियों के साथ चाय पीना अक्षम्य है."
अड़ियल रवैया

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हमें ये देखने के लिए इंतजार करना होगा कि भारत और पाकिस्तान में कौन सा देश पीछे हटेगा लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा था कि मुझे नहीं लगता, मोदी को पाकिस्तान के साथ बातचीत करने में कोई खास दिलचस्पी है.
सवाल ये भी है कि क्या वह शिक्षा, जीएम फ़ूड और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दिलचस्पी वाली चीजों पर यही अड़ियल रवैया दिखलाएंगे.
मेरा अंदाजा है कि इन मुद्दों पर वह कोई समझौता नहीं करेंगे जो कि एक अच्छी बात होगी. यह पाकिस्तान है जिस पर उनकी समझबूझ पर ये रवैया हावी हो जाता है और दुर्भाग्य से ये वो मसला है जहाँ हमेशा खतरे की गुंजाइश रहती है.
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