गुजरात में मैला ढोने वाले हैं या नहीं?

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- Author, अंकुर जैन
- पदनाम, अहमदाबाद से बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
गुजरात में राज्य सरकार के मुताबिक़ सिर पर मैला ढोने वाले लोग नहीं हैं.
लगता है या तो सरकार शायद सुबह देर से उठती है या तो वह सोए रहना चाहती है. इसलिए उसे सड़कों पर मैला या उससे ढोने वाले नहीं दिखते.
वैसे भी राज्य सरकार के हिसाब से 'वाइब्रेंट गुजरात' में मैला ढोने वालों का होना या तो काल्पनिक है या सरकार को बदनाम की एक कोशिश है.
तो फिर गुजरात के शहरों और गाँवों की गलियों में रास्ते पर रोज़ सुबह शौच साफ़ करते लोग सरकार को क्यों नज़र नहीं आते.
पढ़िए पूरी रिपोर्ट
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 2003 में गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक एफिडेविट फ़ाइल कर कहा था कि गुजरात में मैला ढोने वाले नहीं है.
दलितों के हक़ के लिए लड़ रही सामाजिक कार्यकर्ता मंजुला प्रदीप कहती है, "नेता अक्सर लोगों से झूठे वायदे करते हैं पर एफिडेविट पर सरकार का झूठ कहना यह चौंकाने वाला है. आज भी गुजरात के हर शहर और गाँवों में मल ढोने का काम हो रहा है.

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वो कहती हैं, "जब हमने कोर्ट में गुजरात सरकार के ख़िलाफ़ याचिका दायर की और मैला ढोती महिलाओं की तस्वीर कोर्ट में पेश की तो सरकार ने कहा, यह तस्वीरें झूठी हैं.”
गुजरात में मैला ढोने पर 1992 में प्रतिबंध लगाया गया था. गुजरात सरकार के एफिडेविट को चुनौती देने कई लोग कोर्ट में गए जिसकी वजह से कोर्ट ने गुजरात सरकार को एक-एक स्वैछिक संस्था से मैला ढोने वालों की गिनती करने को कहा.
टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के एक सर्वे के मुताबिक, "गुजरात में 12000 से ज़्यादा मैला ढोने वाले हैं और उसमे में अधिकतर आज भी हाथ से लोगों का शौच साफ़ करते हैं."
नेशनल कमीशन फॉर सफ़ाई कर्मचारी की पूर्व अध्यक्ष रही कमलबेन गुर्जर कहती हैं, "मोदी की विकासशील छवि को बचाने के लिए सरकार ने इस सर्वे को ख़ारिज कर दिया. 2013 में आए 'प्रोहिबिशन ऑफ़ एम्प्लॉयमेंट ऐज़ मैन्युअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रीहैबिलिटेशन एक्ट' के मुताबिक़ मैला उठवाने का काम ग़ैर क़ानूनी है."
'लोगों की साजिश'
2012 में सुरेंद्रनगर के सामाजिक कार्यकर्ता नौशाद सोलंकी ने गुजरात के मैला ढोने वालों पर एक फिल्म बनाई थी.
सोलंकी कहते हैं, "गुजरात सरकार केंद्र सरकार से हर साल मैला ढोने वाले के पुनर्वास के लिए रुपए लेती है. सरकार के ही कर्मचारियों ने मुझसे कहा कि गुजरात की छवि एक विकासशील प्रदेश की है और इसलिए वहां मैला ढोने वाले नहीं हो सकते. लेकिन वे तो हैं सड़कों पर, सार्वजनिक शौचालयों में और मेरी फिल्म में."
जब गुजरात के सामाजिक न्याय मंत्री रमनलाल वोरा से इस बारे में पूछा गया तो वह भड़क उठे.
उन्होंने कहा, "गुजरात में एक भी मैला ढोने वाला नहीं. मुझे कोई एक तो बता दे. यह सब साज़िश है गुजरात को बदनाम करने की. अगर कोई नगरपालिका किसी से ऐसा अमानवीय काम करवा रही है तो मुझे बताओ."
लेकिन जब पूछा गया कि गुजरात में खुले में होने वाला शौच कौन साफ़ करता है तो उन्होंने पल्ला झाड़ दिया और इस पर बात करने से मना कर दिया.
सफ़ाई कर्मचारियों के लिए काम करने वाले सुरेश वाघेला कहते हैं, "ज़्यादातर सफ़ाई कर्मचारी कभी ना कभी मैला उठाने का काम करते हैं. गुजरात सरकार ने इनमें से दस प्रतिशत को भी इनके सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए आवश्यक उपकरण नहीं दिए हैं."
वो कहते हैं, "2013 में बने नए क़ानून के मुताबिक़ मैला ढोने का काम करवा रही सरकारी संस्था के अफसर को दो या अधिक साल की सज़ा हो सकती है पर यह बात ना ही निचले स्तर के कर्मचारी को पता है और ना ही मैला ढोने वालों को. "
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