क्या नरेंद्र मोदी को मना पाएंगे केरी?

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- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता,
पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और उनके बाद राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारत दौरे के कुछ समय बाद तक भारत और अमरीका के संबंधों में काफी उछाल आया था और गर्मजोशी थी. लेकिन धीरे-धीरे इस में कई बाधाएं आ गईं.
दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने और सितंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमरीकी दौरे की तैयारी के संबंध में अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी भारत के तीन दिन के दौरे पर आ रहे हैं.
जहाँ अमरीका को भारत और नरेंद्र मोदी की ज़रूरत है वहीं मोदी को अमरीका की.
आर्थिक माहौल में सुधार से अमरीका के निजी क्षेत्र से पूँजी भारत में आने की पूरी उम्मीद है. अमरीका को नई सरकार से आशा है कि परमाणु ऊर्जा और रक्षा के क्षेत्र में सहयोग और बढ़े.
विदेशी मामलों में भारत और अमरीका एक दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी नहीं लगते. दोनों देशों के अलग-अलग हित हैं.
अमरीका भारत को इसलिए भी महत्व देता है क्योंकि उसके विचार में चीन के बढ़ते और फैलते असर को कम करने की क्षमता रखने वाले देशों में भारत एक अहम देश है.
पढ़िए ज़ुबैर अहमद का विश्लेषण विस्तार से
अमरीका भारत के साथ संबंधों में नई जान फूंकने के लिए तैयार नज़र आता है. बल्कि कहें उतावला नज़र आता है. लेकिन इस समय के लिए सबसे बड़ी चुनौती है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संबंध सुधारने की.

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गुजरात दंगों के बाद 2005 में अमरीका ने नरेंद्र मोदी का वीजा स्थगित कर दिया था यानी उन्हें अमरीका जाने की इजाज़त नहीं थी. लेकिन लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी को मिली बड़ी जीत के बाद राष्ट्रपति बराक ओबामा ने फ़ोन कर मोदी को अमरीका आने का निमंत्रण दिया.
नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति ओबामा का न्यौता स्वीकार तो कर लिया है लेकिन अमरीकियों को परेशानी इस बात से है कि मोदी ने अब तक अमरीका के प्रति अपनी सोच और नीति उजागर नहीं की है.
अमरीकी फ़ंड और टेक्नॉलॉजी
जहाँ अमरीका को भारत और नरेंद्र मोदी की ज़रूरत है वहीं मोदी को अमरीका की.
नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव विकास और आर्थिक उन्नति के नारे पर जीता है. अपने इन वादों को पूरा करने के लिए उनकी सरकार को न केवल अमरीका से निवेश की ज़रूरत होगी बल्कि अमरीकी टेक्नॉलॉजी की भी.
आर्थिक माहौल में सुधार से अमरीका के निजी क्षेत्र से पूँजी भारत में आने की पूरी उम्मीद है. नई सरकार ने रक्षा के क्षेत्र में 49 फीसदी विदेशी निवेश का प्रस्ताव मंज़ूर किया है. अमरीका समेत तमाम विदेशी कंपनियों के लिए ये एक अच्छी ख़बर है.

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भारत सरकार को रक्षा के क्षेत्र में अमरीका से मदद की ज़रूरत होगी. संभवतः इस क्षेत्र में अमरीका मदद के लिए तैयार होगा. लेकिन अमरीका के साथ परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में ऐतिहासिक समझौते के बावजूद अमरीकी कंपनियों को भारत ने बड़े ठेके नहीं दिए हैं.
अमरीका को नई सरकार से आशा है कि परमाणु ऊर्जा और रक्षा के क्षेत्र में सहयोग और बढ़े. इसलिए अमरीकी रक्षा मंत्री अगले महीने भारत के दौरे पर आ रहे हैं.
भारत-अमरीकी मतभेद

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पिछले साल बाली में डब्लूटीओ के सदस्य देशों के बीच अंतरराष्ट्रीय व्यापार से संबंधित एक समझौता तय हुआ जिसे बाली पैकेज के नास से जाना जाता है. इस समझौते के तहत व्यापार को सरकारी चंगुल से अधिक आज़ाद बनाने की कोशिश होगी.
भारत ने इस पर आपत्ति जताई और समझौते को अपनी स्वीकृति देने से इनकार कर दिया है.
भारत की मांग है कि खाद्य सुरक्षा से संबंधित इसके सिस्टम की सुरक्षा की पहले गारंटी दी जाए. इसके बाद भारत समझौते को स्वीकार करेगा. लेकिन अमरीका और सभी सदस्य देशों ने भारत से इस मुद्दे पर मायूसी जताई है.
भारत के कारण यह समझौता अटक गया है. अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी भारत को इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मनाने की कोशिश करेंगे.
ताल-मेल की कमी

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विदेशी मामलों में भारत और अमरीका एक दूसरे के स्वाभाविक सहयोगी नहीं लगते. दोनों देशों के अलग-अलग हित हैं.
डब्लूटीओ के अलावा कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में भारत और अमरीका की नीतियाँ एक दूसरे के विपरीत हैं. अब संयुक्त राष्ट्र में उठने वाले मुद्दों पर नज़र डालें तो दोनों देशों के बीच दूरी साफ़ दिखाई देती है.
हाल में संयुक्त राष्ट्र में इसराइल के ग़ज़ा पर ताज़ा हमलों के खिलाफ मतदान हुआ. इसमें भारत ने इसराइल के खिलाफ और अमरीका ने उसके पक्ष में वोट दिया. इसी तरह से क्राइमिया में रूसी घुसपैठ पर वोटिंग में भारत ने रूस के पक्ष में और अमरीका ने उसके खिलाफ वोट दिया.
चीन के खिलाफ

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अमरीका भारत को इसलिए भी महत्व देता है क्योंकि उसके विचार में चीन के बढ़ते और फैलते असर को कम करने की क्षमता रखने वाले देशों में भारत एक अहम देश है.
अमरीका समय-समय पर भारत को चीन के खिलाफ गठबंधन बनाने में शामिल करने की कोशिश करता है. लेकिन भारत के चीन के साथ अपने राष्ट्रीय हित के हिसाब से संबंध हैं.
इसलिए अमरीका अपनी इस कोशिश में अब तक सफल नहीं हो सका है. भारत अगर इसमें शामिल हुआ तो इससे फ़ायदा बहुत होगा लेकिन अपने शक्तिशाली पड़ोसी को नाराज़ करने से नुक़सान अधिक है.
अमरीका के लिए भारत को इस गठबंधन में शामिल करना अब और भी कठिन होगा क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के विकास से काफी प्रभावित हैं. वह गुजरात के मुख्यमंत्री की हैसियत से चार बार चीन जा चुके हैं. भारत को चीन से दूर करना अमरीका के लिए अब और बड़ी चुनौती होगी.
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