गुजरात दंगा पीड़ितों के वकील मुकुल सिन्हा नहीं रहे

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- Author, अंकुर जैन
- पदनाम, अहमदाबाद से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
गुजरात में दंगों और फ़र्ज़ी मुठभेड़ मामले में राज्य सरकार के खिलाफ लड़ने वाले जाने-माने वकील मुकुल सिन्हा का सोमवार को निधन हो गया.
वैज्ञानिक से वकील बने मानवाधिकार कार्यकर्ता मुकुल सिन्हा पिछले एक साल से कैंसर से जूझ रहे थे.
एक साल पहले उनके फेफड़े के कैंसर का पता चला था. तब से उनका इलाज निरंतर चल रहा था.
एक दिन पहले ही रविवार को अचानक तबीयत बिगड़ जाने पर उन्हें अहमदाबाद के निजी अस्पताल में भर्ती किया गया था.
सोमवार को उन्होंने आखिरी सांस ली.
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मुकुल सिन्हा के बाद परिवार में अब उनकी पत्नी और बेटे रह गए हैं.
उनकी आखिरी इच्छा थी कि उनका मृत शरीर गुजरात के कैंसर अस्पताल को दान कर दिया जाए.
फर्जी मुठभेड़ मामला

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आईआईटी कानपुर के पूर्व छात्र सिन्हा ने इशरत जहां, तुलसीराम प्रजापति, सोहराबुद्दीन और सादिक जमाल फर्जी मुठभेड़ मामले में जाँच को लेकर अहम भूमिका निभाई थी.
मुकुल सिन्हा ने 2002 के गोधरा दंगों में राज्य स्तरीय अधिकारियों की भूमिका को उजागर करने वाले नानावती आयोग के सामने महत्वपूर्ण गवाहों के साथ जिरह की थी.
साल 2007 में उन्होंने सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ मामले की छानबीन की जिसमें गुजरात पुलिस द्वारा शीर्ष स्तर के पुलिसकर्मियों की गिरफ्तारी की गई थी. हालांकि गिरफ्तारी के कुछ दिन के भीतर ही एनके अमीन और दिनेश एमएन को जमानत मिल गई थी.
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2008 में उन्होंने इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ मामला और साल 2009 में जावेद शेख मामले को हाथ में ले लिया. उन्होंने मामले की सुनवाई के दौरान उन्होंने जावेद शेख के परिवार का प्रतिनिधित्व भी किया.
गुजरात उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका को आधार बनाते हुए मामले की जांच के लिए गुजरात पुलिस की तीन सदस्यीय एसआईटी टीम का गठन करने का आदेश दिया.
मजदूर संघ

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सिन्हा ने गुजरात में 'न्यू सोशलिस्ट मूवमेंट' के नाम से एक पार्टी की स्थापना की थी.
उन्होंने 1980 में ट्रेड यूनियन आंदोलन का नेतृत्व किया था जिससे उन्हें अनुसंधान, विकास, प्रशिक्षण और शैक्षणिक संस्थानों के कर्मचारियों को संगठित करने में भारी कामयाबी मिली.
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'न्यू सोशलिस्ट मूवमेंट' गुजरात की एक राजनीतिक पार्टी है. 2002 के गुजरात दंगों के बाद जनसंघर्ष मंच और गुजरात ट्रेड यूनियन फेडरेशन के नेतृत्व तले इसका गठन किया गया था.
फिलहाल अमरीश पटेल इस पार्टी के महासचिव हैं.
पार्टी को साल 2007 में भारतीय चुनाव आयोग की ओर से पंजीकृत कर लिया गया था.
साल 2007 में उन्होंने अहमदाबाद में मुस्लिम बहुल इलाके से विधान सभा चुनाव लड़ा मगर इसमें उन्हें हार मिली. 2012 में उन्होंने अपना चुनाव क्षेत्र बदला मगर फिर भी हार गए.
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