मोदी के बाद लपेटे में आई केन्द्र सरकार तो चुप्पी क्यों?

इशरत जहाँ फर्जी मुठभेड़ मामला
इमेज कैप्शन, इशरत के मामले के राजनीतिक और कानूनी दोनो ही पहलू हैं.
    • Author, शकील अख़्तर
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू संवाददाता, दिल्ली

पिछले कई दिनों से भारत के हर टीवी चैनल और तमाम अख़बारों में सुरक्षा विशेषज्ञ, पूर्व जासूस, ख़ुफ़िया सेवाओं के रिटायर्ड अधिकारी और थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाले विश्लेषक भी यह साबित करने में लगे हैं कि नौ साल पहले गुजरात पुलिस के हाथों मरने वाली मुंबई की छात्रा इशरत जहां चरमपंथी थी.

दरअसल यह सवाल किसी ने पूछा ही नहीं था कि वह चरमंथी थी या नहीं. <link type="page"><caption> अदालत</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2011/12/111218_ishrat_ml.shtml" platform="highweb"/></link> ने सीबीआई को केवल इस पहलू की जाँच करने का आदेश दिया था कि पुलिस ने इशरत को वास्तव में किसी मुठभेड़ में मारा था या उसकी हत्या हिरासत में लेकर की गई थी.

सीबीआई, मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट और गुजरात पुलिस की विशेष जाँच टीम इस <link type="page"><caption> कथित मुठभेड़</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130704_ishrat_jahan_chargesheet_rd.shtml" platform="highweb"/></link> को पुलिस के हाथों दिनदहाड़े हत्या करार दे चुकी है. पुलिस ने इस कथित मुठभेड़ में जिन तीन अन्य मुख्य लोगों को मारा, उनमें एक को ख़ुफ़िया ब्यूरो का मुख़बिर बताया जाता है.

<link type="page"><caption> सीबीआई</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130703_ishrat_cbi_chargesheet_pp.shtml" platform="highweb"/></link> अब इस बात की जाँच कर रही है कि पुलिस ने जिन दो लोगों को पाकिस्तानी चरमंथी बताकर मारा, वे कहीं भारत प्रशासित कश्मीर के निवासी तो नहीं थे. जाँच ब्यूरो को ये भी निर्देश दिया गया कि वो यह भी देखे कि इन हत्याओं के पीछे मकसद क्या था.

पहला मौका

सीबीआई
इमेज कैप्शन, सीबीआई इशरत मामले की जाँच के निर्णायक मोड़ पर है.

भारत के इतिहास में यह पहला मौका है जब सीबीआई जैसे एक प्रभावशाली केंद्रीय संगठन ने फर्जी मुठभेड़ के किसी मामले में राज्य पुलिस के साथ-साथ देश की एक अग्रणीय केंद्रीय एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो के बड़े अफ़सरों के अवैध पहलू इतनी तफसील के साथ उजागर किए हैं.

इशरत जहां मामले में इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक विशेष निदेशक के अलावा कई अन्य अधिकारियों से इशरत और अन्य तीन लोगों के अपहरण और हत्या में शामिल होने के संदेह में पूछताछ की जा रही है.

इससे पहले गुजरात के ही सादिक जमाल के कथित फ़र्ज़ी एनकाउंटर मामले में इंटेलिजेंस ब्यूरो के कई बड़े अफ़सर जाँच के शिकंजे में हैं. गुजरात पुलिस के कई बड़े अधिकारी इन मामलों में गिरफ़्तार किए जा चुके हैं.

यहां तक कि नरेंद्र मोदी सरकार में गृह मंत्री रह चुके अमित शाह भी कई महीने जेल में गुज़ार चुके हैं और इस समय ज़मानत पर रिहा हैं. <link type="page"><caption> मोदी का विरोध</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130704_bjp_ishrat_modi_vr.shtml" platform="highweb"/></link> करने वाले विश्लेषक और कार्यकर्ता गुजरात की हर मुठभेड़ से जुड़े ख़ून के निशान उन्हीं की आस्तीन में खोजने में लगे हुए हैं.

सीबीआई जाँच

लेकिन दूसरी ओर केंद्र सरकार के तहत काम करने वाले इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों का नाम एक के बाद एक कई फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में आने के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय में भगदड़ मच गई है.

कांग्रेस सरकार ने पहले तो सीबीआई पर दबाव डालने की कोशिश की कि वह इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों से पूछताछ न करे.

लेकिन जब सीबीआई जाँच पर डटी रही तो सरकार ने एक <link type="page"><caption> नया राग</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130704_narendrai_modi_delhi_ap.shtml" platform="highweb"/></link> छोड़ा कि सीबीआई इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों से पूछताछ के लिए अधिकृत नहीं है और उसे किसी भी तरह की पूछताछ से पहले सरकार से मंज़ूरी लेनी होगी.

जब तक मुठभेड़ के इन मामलों में सारे तीर मोदी की तरफ़ चलते रहे तब तक कांग्रेस और उसकी सरकार दिल्ली में बैठी तमाशा देखती रही.

लेकिन जैसे ही यह तथ्य सामने आया कि मुठभेड़ों में कथित तौर पर केवल केंद्रीय एजेंसी का हाथ ही नहीं है बल्कि उनके बचाव और समर्थन में कांग्रेस की सरकार ने अदालतों में शपथपत्र भी दाखिल किए हैं. इस स्थिति में सरकार के लिए अपना बचाव करना मुश्किल हो गया है.

संवेदनशील मामले

नरेंद्र मोदी
इमेज कैप्शन, मोदी की सरकार के लिए इशरत का मामला राजनीतिक तौर पर अहम है.

इशरत जहां का मामला नौ साल पुराना है. इंटेलिजेंस ब्यूरो और गृह मंत्रालय को इस मुठभेड़ की सच्चाई अगर पता नहीं है तो इसे उनका गैरपेशेवर रवैया माना जाना चाहिए. अगर उन्हें सब कुछ पता था और इसके बावजूद वे चुप रहे तो इसे क्या कहा जाए.

फर्जी मुठभेड़ों का मामला भारत में सुरक्षा का एक <link type="page"><caption> गंभीर समला</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130701_ishrat_fake_encounter_ps_pandey_vr.shtml" platform="highweb"/></link> है. पिछले सालों में उत्तर पूर्वी राज्यों, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, जम्मू कश्मीर, दिल्ली और कई अन्य राज्यों में रहस्यमयी परिस्थितियों में ऐसे कई हजार मुठभेड़ हुए जो स्पष्ट रूप से संदेह के घेरे में हैं.

अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में एक हज़ार से अधिक मुठभेड़ों की नए सिरे से <link type="page"><caption> जांच का आदेश</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/07/130701_cbi_ishrat_sb.shtml" platform="highweb"/></link> दिया है. यह पहला मौका है जब इतने संवेदनशील मामले में केंद्र सरकार की एक महत्वपूर्ण संस्था इंटेलिजेंस ब्यूरो के कुछ अधिकारी कटघरे में खड़े नजर आते हैं.

दूसरी ओर केंद्रीय जांच ब्यूरो कानून की सर्वोच्चता को बनाए रखने में अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभाने की कोशिश कर रहा है. इन मुठभेड़ों को सियासी रंग देने की कोशिश नए सवाल खड़े करती हैं.

<italic><bold>(<link type="page"><caption> बीबीसी हिन्दी</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> के <link type="page"><caption> एंड्रॉएड ऐप</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/03/130311_bbc_hindi_android_app_pn.shtml" platform="highweb"/></link> के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर <link type="page"><caption> फ़ॉलो</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> भी कर सकते हैं.)</bold></italic>