इशरत को फ़र्जी मुठभेड़ में मारा गया: सीबीआई

उच्चतम न्यायालय ने इशरत जहां मामले की जांच सीबीआई को सौंपी है
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वर्ष 2004 के इशरत जहाँ मौत मामले में सीबीआई ने अहमदाबाद में अतिरिक्त मुख्य मजिस्ट्रेट के सामने चार्जशीट दाखिल कर दिया है.

सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में कहा है कि इशरत जहाँ और तीन अन्य लोगों को फ़र्जी मुठभेड़ में मारा गया. हालाँकि सीबीआई ने उस दावे पर कुछ नहीं कहा है कि ये चारों लोग कथित रूप से आतंकवादी थे.

चार्जशीट में गुजरात के नौ के नाम हैं, जिनमें डीजी वंजारा और पीपी पांडेय के नाम भी शामिल हैं.

सीबीआई की चार्जशीट पर अपनी प्रतिक्रिया में इशरत जहाँ की माँ ने कहा कि वे शुरू से ही ये कहती आ रही थी कि उनकी बेटी बेगुनाह है और अब ये बात साबित हो गई है.

इशरत जहाँ की बहन नुसरत ने कहा, "मेरी बहन आतंकवादी नहीं थी. वो एक अच्छी छात्रा थी. हम जो कह रहे थे, वो नौ साल बाद सही साबित हुआ है."

सवाल

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने सीबीआई की चार्जशीट पर सवाल उठाए हैं. पार्टी प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने कहा कि एक समय सीबीआई ने अपने हलफ़नामे में इशरत और तीन अन्य लोगों को 'आतंकवादी' माना था.

उन्होंने कहा कि केंद्र को आतंकवाद पर राजनीति नहीं करनी चाहिए. निर्मला सीतारमन ने कहा कि सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में लश्कर की भूमिका के बारे में कुछ नहीं कहा है.

उन्होंने कहा, "हम जानना चाहते हैं कि इस मामले पर केंद्र का क्या रुख़ है? हर समय जब आईबी कोई जानकारी राज्य सरकारों को देती है, उसे केंद्र सरकार से भी साझा किया जाता है."

उधर कांग्रेस के प्रवक्ता एम अफ़ज़ल ने कहा है कि सीबीआई ने कह दिया है मुठभेड़ फ़र्जी थी. उन्होंने कहा, "हम चाहते हैं कि क़ानून को अपना काम करने दिया जाए और दोषियों को सज़ा मिले."

वरिष्ठ पत्रकार अजय उमठ ने बीबीसी को बताया कि चार्जशीट के मुताबिक़ जीशान जौहर आईबी और गुजरात पुलिस के पास इस फर्जी मुठभेड़ के 48 दिन पहले से थे. अमजद अली इनके पास पिछले 20 दिनों से थे. जबकि इशरत और जावेद 12 तारीख़ को गुजरात आए थे, जिन्हें क्राइम ब्रांच ने पकड़ लिया था.

15 जून 2004 को अहमदाबाद के पास 19 साल की इशरत के अलावा जावेद शेख उर्फ प्राणेश पिल्लई, अमजद अली राणा और जीशान जौहर मारे गए थे.

गुजरात उच्च न्यायालय ने इशरत जहां मुठभेड़ की जांच की जिम्मेदारी सीबीआई को सौंपी थी.

क्या है चार्जशीट में?

भाजपा
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सीबीआई की चार्जशीट के मुताबिक़ आईबी और गुजरात पुलिस की अपराध शाखा के अधिकारियों ने मिलकर इस फ़र्जी मुठभेड़ को अंजाम दिया. सीबीआई ने गुजरात पुलिस के पूर्व अधिकारी डीजी वंज़ारा पर गंभीर आरोप लगाए हैं.

सीबीआई का कहना है कि वंज़ारा ने ही एक पुलिस अधिकारी से कहा था कि वे आईबी ऑफिसर के पास जाएँ और वहाँ से हथियार लाएँ. सीबीआई के मुताबिक़ आईबी अधिकारी से बैग भर कर मिले हथियारों से ही इन चारों की हत्या की गई और फिर वो बैग उन लोगों के पास रख दिए गए.

सीबीआई ने ये भी कहा है कि वो उस समय गुजरात में आईबी के प्रमुख रहे राजेंद्र कुमार के ख़िलाफ़ और जाँच करना चाहती है, क्योंकि उनकी भूमिका उसे संदिग्ध लग रही है.

जिन नौ पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाखिल किया गया है, उनके ख़िलाफ़ अपहरण, हत्या और साज़िश रचने का मामला दर्ज किया गया है.

अहमदाबाद से स्थानीय पत्रकार अंकुर जैन

अगस्त 2010 में गुजरात हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित एसआईटी को इसकी जांच करने के लिए कहा. लेकिन एसआईटी ने इसकी जांच में अपनी असमर्थता जाहिर की.

नरेंद्र मोदी
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सितंबर 2010 में गुजरात हाई कोर्ट ने इस मामले की जांच के लिए नई एसआईटी का गठन किया. गुजरात हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ गुजरात सरकार सुप्रीम कोर्ट गई. लेकिन नवंबर 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की याचिका खारिज कर दी.

28 जनवरी, 2011 को एसआईटी के सदस्य सतीश वर्मा ने हाई कोर्ट में हलफनामा दाखिल किया. इस हलफनामे में एनकाउंटर को फर्जी करार दिया गया. हलफनामे में ये आरोप भी लगाए गए कि मामले की जांच में रोड़े अटकाए जा रहे हैं.

आठ अप्रैल, 2011 को हाई कोर्ट ने गुजरात सरकार को चेतावनी दी कि अगर उसने जांच में रोड़ा अटकाया तो वो इस मामले को सीबीआई या एनआईए को सौंप दिया जाएगा.

दिसंबर 2011 में गुजरात हाई कोर्ट ने मामले को सीबीआई को सौंप दिया. 14 फरवरी, 2013 को सीबीआई ने इस मामले में आईपीएस अफसर जीएल सिंघल को गिरफ्तार कर लिया.

सीबीआई के ताज़ा आरोप पत्र में गुजरात के नौ पुलिस अधिकारियों का बयान है जो अनुभाग 164 सीआरपीसी में मजिस्ट्रेट के सामने रिकॉर्ड की गई है.

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