जो कानों से मारते हैं चौके-छक्के

भारतीय नेत्रहीन क्रिकेट टीम
    • Author, वैभव दीवान
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मुंबई

इस तस्वीर में आप देख रहे हैं भारतीय क्रिकेटरों की प्रैक्टिस का नज़ारा, जो तैयारी कर रहे हैं ऑस्ट्रेलिया के साथ जल्द ही होने वाली टी-20 सीरीज़ की.

लेकिन ये क्रिकेट कुछ अलग क़िस्म का है. इसमें क्रिकेटरों ने ना कभी गेंद देखी है ना ही बल्ला. लेकिन खेलते ख़ूब हैं. ये हैं ब्लाइंड यानी नेत्रहीन क्रिकेटर.

नेत्रहीन टीम ऑस्ट्रेलिया की ब्लाइंड क्रिकेट टीम तीन टी-20 मैचों की इस सीरीज़ के लिए अप्रैल में भारत आ रही है.

इसके लिए बंगलौर में तैयारियां ज़ोरों पर है. रोज़ाना ट्रेनिंग कैंप आयोजित किए जा रहे हैं. लेकिन इन खिलाड़ियों की कुछ शिकायते हैं, जिसकी वजह से वो बेहद ख़फ़ा भी हैं.

बीसीसीआई से नहीं मिलता सपोर्ट

भारतीय नेत्रहीन क्रिकेट टीम

भारतीय नेत्रहीन टीम ने 2012 में हुआ 'ब्लाइंड टी-20' वर्ल्ड कप जीता था. टीम के मेंटर रहे के एन चंद्रशेखर ख़ुद भारत के लिए दो विश्व कप में खेल चुके हैं.

वो बताते हैं, "भारत में भले ही क्रिकेट एक धर्म हो पर यहां भेदभाव होता है. बीसीसीआई जो भारत में हर क़िस्म के क्रिकेट को प्रोत्साहन देता है उनकी नज़र अब तक ब्लाइंड क्रिकेट पर नहीं गई है. हमे सब ख़ुद आयोजित करना पड़ता है."

"हालांकि ऐसा बाक़ी देशों में नहीं है. पाकिस्तान, इंग्लैंड, दक्षिण अफ़्रीक़ा जैसे देशों में वहां का क्रिकेट बोर्ड अपने नेत्रहीन क्रिकेटरों को सपोर्ट करता है."

किसी भी टूर्नामेंट के आयोजन के लिए भारत के नेत्रहीन क्रिकेट संघ को कॉर्पोरेट और बड़ी कंपनियो के डोनेशन पर निर्भर होना पड़ता है. पिछले 20 सालों से नेत्रहीन क्रिकेट भारत में ऐसे ही चल रहा है.

बिना देखे कैसे खेलते है ये?

नेत्रहीन क्रिकेट

चंद्रशेखर बताते हैं कि, "हम पैसे या शोहरत के लिए क्रिकेट कभी नहीं खेले, हमारा मक़सद है कि हम फ़िट रहें और इस खेल के ज़रिए अपने अंदर एक आक्रामक सोच को पैदा करें."

इन नेत्रहीन क्रिकेट खिलाडियों को देख कभी ऐसा लगेगा नहीं कि ये देख नहीं सकते. बल्ला पकड़ने का स्टाइल, शॉट्स सिलेक्शन, और विकेटों के बीच दौड़ना इनका बिलकुल आम खिलाड़ी सा है.

चंद्रशेखर बताते हैं, "हमने क्रिकेट स्पर्श से सीखा. हमारे कोच ने हमें बल्ले को कहां पकड़ना है और कैसे पकड़ना है ये सिखाया. फ़ील्ड में खिलाड़ियों की आवाज़ सुन हमें पता चलता है कि वो कहां मौजूद हैं."

'गेंद होती है हमारी आंख'

नेत्रहीन क्रिकेट

विकेट की बात करें तो ब्लाइंड क्रिकेट में तीनो डंडे एक साथ जुड़े होते हैं. ये स्टील की बनी विकेट एक साथ इसलिए गढ़ी जाती है ताकि इनके गिरते ही आवाज़ हो और नेत्रहीन खिलाड़ी समझ जाये की बैट्समैन आउट हुआ है.

गेंद डालने से पहले गेंदबाज़ ज़ोर की आवाज़ लगाता है ‘प्ले’ जिससे बल्लेबाज़ और मैदान में खड़े खिलाड़ियों को पता लग जाता है कि अब अगली गेंद डाली जाने वाली है.

चंद्रशेखर के मुताबिक़, "हमारी गेंद ही हमारी आँख है. ये प्लास्टिक की बनी गेंद होती है जिसमें बॉल बेअरिंग डाले जाते हैं जो झुनझने की तरह आवाज़ करते हैं. जब गेंद डाली जाती है तो बल्लेबाज़ उस आवाज़ को सुन अपना शॉट खेलता है."

ब्लाइंड क्रिकेट की टीम में खिलाड़ियों की नेत्रहीनता अलग-अलग स्तर की होती है. इस टीम में कुछ पूरी तरह नेत्रहीन, कुछ पांच फ़ीसदी नेत्रहीन, जिन्हें रोशनी का अहसास होता है और कुछ 20 फ़ीसदी नेत्रहीन होते हैं जिन्हें सब धुंधला दिखता है.

'मोटे राहुल द्रविड़'

के एन चंद्रशेखर
इमेज कैप्शन, (33 वर्षीय के एन चंद्रशेखर भारतीय ब्लाइंड क्रिकेट टीम के मेंटर हैं. वो भारत की तरफ़ से क्रिकेट खेल भी चुके हैं.)

33 वर्षीय चंद्रशेखर से मेरी मुलक़ात के दौरान मुझे पता चला कि क्रिकेट के अलावा भी ये नेत्रहीन खिलाड़ी अपने जीवन में काफ़ी सफल हैं. सभी को कंप्यूटर में पारंगत हैं और काफ़ी लोग कॉल सेंटर और अन्य ग़ैर सरकारी संस्थाओं का हिस्सा हैं.

चंद्रशेखर ख़ुद एक संस्था में कंप्यूटर शिक्षा के प्रमुख हैं.

वो क्रिकेट के बड़े शुक्रगुज़ार हैं. चंद्रशेखर कहते हैं, "क्रिकेट की वजह से मैंने बहुत कुछ सीखा है, बेशक मैं देख नहीं सकता पर दुनिया घूमने का अवसर मैंने क्रिकेट से ही पाया."

चंद्रशेखर के सबसे प्रिय खिलाडी राहुल द्रविड़ हैं. उनकी कल्पना के अनुसार, "राहुल एक मोटे इंसान होंगे जो दिखने में स्मार्ट और हैण्डसम होंगे. मैंने सुना है कि द्रविड़ पर कई लड़कियां फ़िदा हैं...क्या ये सच है?’

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