महिलाओं ने माना- हर स्तर पर बढ़ा है भ्रष्टाचार

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सीएमएस-इंडिया करप्शन स्टडी (आईएमएस-आईसीएस) ने महिलाओं की कुछ मूलभूत और ज़रूरी सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच का सर्वेक्षण किया.
भारत की आबादी की कुल 49 फ़ीसदी महिलाएं (जनगणना 2011) घर को चलाने में पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, इसलिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अप्रभावी प्रशासन की क़ीमत उन्हें ज़्यादा चुकानी पड़ती है- न सिर्फ़ निजी बल्कि परिवार के स्तर पर भी.
साल 2013 का यह सर्वेक्षण आठ सार्वजनिक सेवाओं को लेकर किया गया था. ये हैं- पीने का पानी, बिजली, सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), सार्वजनिक स्वास्थ्य/अस्पताल सेवाएं, हाउसिंग, म्युनिसिपल, पुलिस और न्यायिक प्रणाली.
आईएमएस-आईसीएस 2013 के लिए अप्रैल से सितंबर 2013 के बीच बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब और राजस्थान से आंकड़ें एकत्र किए गए.
हर राज्य से क़रीब 300 परिवारों को सर्वेक्षण में शामिल किया गया. हर परिवार से एक वयस्क महिला सदस्य का साक्षात्कार किया गया.
परिवार के स्तर पर भ्रष्टाचार से सामना
आईएमएस-आईसीएस के सर्वेक्षण में आधे से ज़्यादा (56%) महिलाओं ने माना कि उन्होंने या उनके परिवार के सदस्य को 12 महीने में कम से कम एक बार भ्रष्टाचार झेलना पड़ा है. इसके अनुपात में 2008 में 44 फ़ीसदी महिलाओं ने कहा था कि उन्हें सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा है.
सर्वेक्षण में शामिल 66 फ़ीसदी महिलाओं ने कहा कि उन्हें या उनके परिवार के किसी सदस्य से 12 महीने में एक बार रिश्वत मांगी गई है जबकि 24 फ़ीसदी महिलाओं ने कहा कि ऐसा 12 महीने में दो बार हुआ है.
जिन परिवारों से रिश्वत मांगी गई थी उनमें 10 में से आठ परिवारों के पास सार्वजनिक सेवा के उपभोग के लिए रिश्वत देने के सिवा कोई चारा नहीं था.
महिला प्रतिभागियों ने कहा कि आठ में से पांच सार्वजनिक सेवाओं का उपभोग करने के लिए 20 से 25 फ़ीसदी परिवारों को रिश्वत देनी पड़ी है.

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दिल्ली और बिहार के अलावा दो तिहाई महिलाओं ने माना कि सर्वेक्षण में शामिल सार्वजनिक सेवाओं के उपभोग के लिए उन्हें या परिवार के किसी सदस्य को भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा है.
दिल्ली और राजस्थान में 2008 के मुक़ाबले भ्रष्टाचार का सामना करने वाली महिलाओं की संख्या दोगुनी हो गई थी.
पैसा नहीं दे सकते तो सेवा नहीं मिलेगी
क़रीब पांच फ़ीसदी महिलाओं ने कहा कि उनके परिवार को सार्वजनिक सेवा का लाभ दिए जाने से इसलिए इनकार कर दिया गया क्योंकि वह रिश्वत नहीं दे पाए थे.
सेवा का लाभ देने से इनकार के मामले सबसे ज़्यादा कर्नाटक में (8%) और मध्य प्रदेश में (7%) थे. यह इसके बावजूद कि सार्वजनिक सेवा अधिकार क़ानून लागू है.
रिश्वत दी गई और उसे देने के कारण
किसी भी राज्य में किसी भी सार्वजनिक सेवा के उपभोग के लिए बिहार में सबसे ज़्यादा प्रति परिवार 10,000 रुपये, छत्तीसगढ़ में नौकरी के लिए पुलिस वैरिफ़िकेशन के लिए 30,000 रुपये, दिल्ली में पुलिस वैरिफ़िकेशन के लिए 10,000 रुपये, कर्नाटक में एफ़आईआर से किसी अभियुक्त का नाम हटाने के लिए 10,000 रुपये, मध्य प्रदेश में मकान के मालिकाना हक़ में बदलाव के लिए 5000 रुपये, महाराष्ट्र में पुलिस में नौकरी के लिए 4,00,000 रुपये, पंजाब में मकान की रजिस्ट्री के लिए 5,000 रुपये और राजस्थान में बिजली का कनेक्शन फिर से जोड़ने के लिए 6,000 रुपये दिए गए.

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औसतन एक परिवार ने पीडीएस दुकान में राशन के लिए 10 रुपये से लेकर पुलिस में नौकरी के लिए चार लाख रुपये तक दिए हैं.
भ्रष्टाचार पर एक महिला का नज़रिया
सर्वेक्षण के नतीजों की तरह ही 67 फ़ीसदी महिलाओं ने माना कि पिछले 12 महीने में भ्रष्टाचार में सामान्य रूप से वृद्धि हुई है.
विभिन्न सामाजिक-आर्थिक वर्गों से आने वाली महिलाओं के विचारों में कोई उल्लेखनीय फ़र्क़ नहीं था.
दिल्ली और राजस्थान में भ्रष्टाचार को लेकर जो भाव था वह इन दोनों राज्यों में सत्ता परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार हो सकता है.
इसी तरह छत्तीसगढ़ में सार्वजनिक सेवाओं में भ्रष्टाचार को लेकर कम भ्रष्टाचार का भाव पुरानी पार्टी के फिर से सत्ता में वापसी के लिए ज़िम्मेदार हो सकता है.
हर तीन में से दो महिलाओं ने यह महसूस किया कि पुलिस सेवाओं में भ्रष्टाचार के स्तर में वृद्धि हुई है. इसके अलावा बिजली (56%) और पीडीएस (50%) दूसरी दो सार्वजनिक सेवाएं हैं जिसमें आधे से ज़्यादा महिलाओं ने महसूस किया कि पिछले 12 महीने में भ्रष्टाचार में वृद्धि हुई है.
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