जहां से खुली एक बड़े विवाद की खिड़की

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
सड़क के इस पार बड़े बड़े मॉल और पांच सितारा अस्पताल और उस पार तंग और बदनाम गालियां. मगर इन तंग गालियों और तेज़ी से होती इनकी बदनामी अब ऐसे मुक़ाम तक पहुँच चुकी है कि यहाँ के रहने वाले अफ्रीकी मूल के लोग अब डरे सहमे हुए हैं.
इन पर आरोप है कि ये नशीले पदार्थों की तस्करी में लिप्त हैं. इसी को लेकर अब यहाँ रहने वाले लोगों ने अब इनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल लिया है.
लोग कहते हैं कि वो अपने इलाक़े की बदनामी से तंग आ चुके हैं. यही वजह है कि दो हफ़्तों पहले इलाक़े के विधायक और दिल्ली के क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती ने ख़ुद ही क़ानून अपने हाथों में ले लिया.
उनके साथ भीड़ में शामिल लोगों पर आरोप है कि उन्होंने इलाक़े में रहने वाले अफ़्रीकी मूल के लोगों पर हमला किया.
खिड़की एक्सटेंशन के साई बाबा मंदिर से लेकर यहाँ की मस्जिद तक की सड़क के रहने वाले लोग अभी तक आक्रोश में हैं.
स्थानीय लोग परेशान
उनका आरोप है कि शाम ढलते ही ये पूरा इलाक़ा जिस्म फरोशी और नशीले पदार्थों की तस्करी का केंद्र बन जाता है. स्थानीय लोग यहाँ तक आरोप लगाते हैं कि इस धंधे में मुख्य रूप से अफ़्रीकी मूल के लोग ही शामिल हैं.
मोहल्ले के एक नौजवान नें बीबीसी से बात करते हुए कहा, "अब तो ऑटो वालों को बताते हुए भी शर्म आती है कि हमें खिड़की जाना है. ये इसलिए है कि पूरा इलाक़ा अब बहुत बदनाम हो चुका है."
इलाक़े के मुखिया निज़ाम का कहना है कि इतने हंगामे के बावजूद नशीले पदार्थों की तस्करी का सिलसिला जारी है.

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उनका कहना है कि लगातार शिकायतों के बावजूद स्थानीय पुलिस इसे रोकने के लिए कोई पहल नहीं करती. कुछ लोगों का यहाँ तक आरोप था कि कुछ मौक़े ऐसे भी आए जब नशीले पदार्थों के साथ पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ़्तार तो किया मगर वो लोग अगले ही दिन छूट गए.
सोमनाथ भारती के हंगामे के बाद अब इस इलाक़े में रहने वाले अफ़्रीकी मूल के लोग डरे सहमे हुए हैं. ये बात सच है कि कुछ लोग भले ही ग़ैर क़ानूनी कामों में लिप्त हों मगर सब को एक ही लाठी से नहीं हांका जा सकता है. डर का ये आलम ये है कि अफ़्रीकी मूल का कोई भी व्यक्ति बात तक करना नहीं चाहता.
बढ़ती खाई
बेहद प्रयासों के बाद बात करने को राज़ी हुए एक अफ़्रीकी मूल के इंजीनियर ने बताया कि सोमनाथ भारती वाले प्रकरण के बाद वो काफ़ी डरे हुए हैं.
उनका कहना था, "हम यहाँ शरणार्थी के रूप में रहते हैं. लोग हमें हब्शी कहकर बुलाते हैं. हम सब डरे हुए हैं क्योंकि लोग हमसे नफ़रत करते हैं. हमारे रंग की वजह से वो हमें अपने से अलग करके देखते हैं. अब तो कुछ खरीदने में भी परेशानी हो रही है."
कई अफ़्रीकी महिलाओं का कहना है कि सब उन्हें ऐसी नज़र से देखते हैं जैसे कि वो सब जिस्म फरोशी में लिप्त हों.
पढ़ाई के लिए भारत आई एक अफ़्रीकी महिला कहती हैं, "लोगों का रवैया हमारे प्रति काफ़ी ख़राब है. वो हमें कालू कहकर बुलाते हैं. हम सब अब डरे हुए हैं क्योंकि हमे लगता है कि हम लोगों पर फिर हमला होगा. ये हम पर जिस्म फ़रोशी करने का आरोप लगा रहे हैं जो बिलकुल ग़लत है."
इस इलाक़े में रहने वाले स्थानीय लोग और अफ्रीकी मूल के लोगों के बीच की खाई बढ़ती जा रही है.
दिनोंदिन बढ़ते तनाव को देखते हुए अब दिल्ली पुलिस नें एहतियाती क़दम उठाने शुरू कर दिए हैं. रात के वक़्त अब उस सड़क की नाकेबंदी कर दी जाती है जहाँ अफ़्रीकी लोग रहते हैं. ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि उन पर और हमले न हों.
दड़बे नुमा मकान
खिड़की गाँव कभी सुनसान हुआ करता था. मेरा बचपन इसी इलाक़े में बीता था और उस वक़्त यहाँ खेत और जंगल हुआ करते थे.

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एक पुराना सा टीला हुआ करता था और शाम ढलते ही सड़क पर सन्नाटा पसर जाया करता था. आज खिड़की गाव की तंग गलियां और दड़बे नुमा मकान देखते ही बनते हैं. लोगों ने छोटे छोटे कमरे बनाकर उन्हें किराए पर चढ़ा दिया है. यहाँ अफ़्रीकी मूल के अलावा अफ़ग़ान शरणार्थी भी काफ़ी संख्या में हैं.
इन दड़बे नुमा कमरों में एक साथ पांच या छह लोग रहते हैं. अब लोग मांग कर रहे हैं कि उन मकान मालिकों की भी जांच होनी चाहिए जिन्होंने अपने मकान किराए पर दिए हुए हैं.
हालांकि पिछले हफ़्ते की घटना के बाद से इस इलाक़े में रात को कर्फ़्यू जैसा माहौल है. मगर लोगों का कहना है कि अगर समस्या का समाधान जल्द नहीं तलाशा गया तो हालात और भी ज़्यादा ख़राब हो सकते हैं.
स्थानीय पुलिस पर लोगों का ज़्यादा गुस्सा उमड़ रहा है जिस पर इलाक़े में क़ानून व्यवस्था को बनाए रखने में कोताही बरतने के आरोप हैं.
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