'आप तितली हैं तो उड़िए, मैंने यही किया'

- Author, आन्या गुप्ता
- पदनाम, लेखक
संजीव अग्रवाल वेंचर फंड 'हीलियन वेंचर पार्टनर्स' के सह-संस्थापक और वरिष्ठ प्रबंध निदेशक हैं. वो बीपीओ क्षेत्र की अग्रणी कंपनी 'दक्ष' के सह-संस्थापक और सीईओ रह चुके हैं.
संजीव के कार्यकाल में 'दक्ष' को प्रबंधन के लिहाज़ से विश्व की सबसे बेहतरीन बीपीओ कंपनी का खिताब मिला. संजीव को साल 2002 में 'अर्नेस्ट एंड यंग आंत्रप्रैन्योर' का भी ख़िताब मिला. एक खेल प्रेमी लड़के से सफल युवा कारोबारी बनने की दास्तां संजीव के ही शब्दों में.
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"मेरा जन्म पंजाब के नवां शहर में हुआ था. मुझे लगता है कि मुझे जन्म देने का ख़्याल मेरे माता-पिता को थोड़ी देर से आया. मैं उनके चारों बच्चों में सबसे छोटा हूँ.
मेरे पिता अपने परिवार में इकलौते ऐसे लड़के थे जो कैथल जैसे छोटे से शहर से निकल अपने परिवार से अलग हुए थे. देश के विभाजन से ठीक पहले वो कानून की पढ़ाई के लिए लाहौर गए थे और फिर वापस आकर वो सेशन जज हो गए थे. मेरे दादाजी भी कैथल, हरियाणा में एक वकील थे.
मेरे पिता को पाकिस्तान बहुत प्रिय था और वो अक्सर हमें अपने लाहौर के फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज के दिनों के किस्से सुनाते रहते थे. वो हमें उर्दू शायरी और मुग़ल दौर की कहानियां भी खूब सुनाते थे.
मेरी मां कभी कॉलेज नहीं गईं लेकिन वो काफी प्रगतिशील विचारों वाली महिला थीं.
मुझे लगता है कि यदि मेरी माँ को आगे पढ़ाई करने का मौका मिला होता तो वो बहुत आगे जातीं. मैंने अपनी व्यवसायी खूबियां अपनी मां से ही पाई हैं.
खेलकूद
बचपन में मैं बहुत सा समय यूं ही गंवाता था. मैं बहुत से बच्चों वाले खेल जैसे कंचे, गुल्ली डंडा, पतंगबाज़ी खेलता था और बहुत से बड़ों वाले खेलों जैसे हॉकी, क्रिकेट और फुटबॉल में भी हाथ आज़माता था. बीच में कहीं मैं टेबल टेनिस को शौक के तौर पर बड़ी शिद्दत से खेलने लगा था.
पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज में मैं टेबल टेनिस टीम का कप्तान था और साथ ही कॉलेज का स्पोर्ट्स कप्तान भी. इस दौरान मेरा बहुत सा समय कुछ दोस्तों के साथ तीन पत्ती खेलने में भी गुज़रता था.
मेरा खेलों के प्रति जुनून इतना गहरा था कि एक समय में मैंने स्पोर्ट्स कॉमेंटेटर के तौर पर अपने करियर के बारे में भी सोचना शुरू कर दिया.
खेलों से जुड़े रहने के लिए खेल पत्रकार या लेखक बनने का विचार भी मेरे मन में आया. एक समय मैंने अपने पिता से कहा कि मैं बी कॉम करना चाहता हूँ जिसके जवाब में मेरे पिता ने बड़ी सख़्ती से हिदायत दी, 'तुम या तो डॉक्टर बनोगे या इंजीनियर'.
मुझ पर इंजीनियरिंग के लिए ज़ोर डालने के सिवाय मेरे मां-बाप ने कभी भी किसी भी चीज़ के लिए मुझ पर दबाव नहीं डाला.
कंप्यूटर डाटा कॉर्पोरेशन

साल 1981 में कॉलेज से निकलने के बाद मैंने अपने दोस्तों, राजीव कटारिया और संजीव मिड्डा के साथ मिलकर कंप्यूटर डाटा कॉर्पोरेशन नाम की एक कंपनी शुरू की.
हमने कंप्यूटर लैंग्वेज सिखाने का काम शुरू किया. हमारे पहले बैच में 15 बच्चे थे और हमने साढ़े सात हज़ार रुपये कमाए.
वो साढ़े सात हज़ार रुपये बहुत जल्द बढ़िया रेस्तराओं और बढ़िया खाने में फूंक डाले गए. यहाँ पर मेरे पिता ने टोका और कहा, 'जो कुछ भी तुम कर रहे हो यह कोई आत्म सम्मान वाला काम नहीं है. तुम्हें एक ढंग का करियर बनाना चाहिए.'
तब तक हम दो बैच चला चुके थे फिर भी मैंने अपने पिता की बात सुनी और बिज़नस का इरादा छोड़ कर अपना काम समेट लिया.
मैंने एमबीए करने का इरादा किया. चूंकि मैं शहर नहीं छोड़ना चाहता था इसलिए सबसे आसान काम था चंडीगढ़ में ही एमबीए में दाखिला.
एमबीए ख़त्म करने के बाद मैंने अपना करियर शुरू किया. अपने करियर के शुरूआती 10 सालों में मैं घुमक्कड़ रहा. मैं अक्सर नई चीज़ों के प्रति आकर्षित होता था.
मैं जहां भी गया वहां मैंने कोशिश की कि मैं न्यू प्रोजेक्ट्स डिपार्टमेंट (बिज़नस डेवेलपमेंट) में काम करूं. जब आप एक नया प्रोजेक्ट लागू करते हैं तो आपको हर चीज़ का ध्यान रखना पड़ता है- पूँजी, सरकारी अनुमति, आधारभूत ढांचा वगैरह.
सफल नौकरी

मेरी पहली सफल नौकरी थी 'डिजिटल इक्विपमेंट कॉर्पोरेशन' में. मैंने कलकत्ता में काम शुरू किया जहां मैं स्टील कंपनियों को कंप्यूटर बेचने की कोशिश करता था.
स्टील इंडस्ट्री में वो सरकारी स्टील प्लांट भी शामिल थे जिनका ख़रीदारी का तरीका बड़ा ही खिझाऊ होता है. मैं इस उबाऊ बाज़ार को जीवंत करने में कामयाब रहा.
इस पद के बाद मुझे क़रीब 32 साल की उम्र में डिजिटल इक्विपमेंट कॉर्पोरेशन के उत्तर भारत क्षेत्र का प्रभारी बना दिया गया.
जब मैंने पदभार संभाला तो मैंने अपने सेल्स कर्मचारियों को सरकारी संस्थानों के काम से हटा कर निजी क्षेत्र में टेलीकम्युनिकेशन, फाइनेंस और मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर केंद्रित कर दिया.
साथ ही मैंने बहुत से नौजवानों की भर्ती की. मेरा ख़्याल है कि नवीनीकरण और नए लोगों को लाने की नीति रंग लाई और हमें बेहद चौंकाने वाले नतीजे मिलने शुरू हो गए.
अब मैं भटकाव से बाहर निकल चुका था. यहीं पर मुझे एहसास हुआ कि मुझमें नेतृत्व गुण भी हैं और मैं एक टीम बनाने और उस टीम को सफलता तक पहुंचाने के लिए उसकी अगुवाई करने में सक्षम हूँ.
'डिजिटल' में काम करते समय सही काम के लिए सही व्यक्ति की पहचान का जो हुनर मैंने सीखा था वो 'दक्ष' शुरू करने में बहुत काम आया.
हम में से हर कोई अलग है और इसीलिए किसी ख़ास काम के लिए ख़ासतौर से बना है. मैंने ऐसी टीम बनाना सीखा जिसके सदस्यों के पास एक दूसरे की पूरक योग्यताएं हों.
परवाज़ और उड़ान

आज भी मेरी पढ़ने की पसंद में ज़्यादा बदलाव नहीं आया है. मुझे आत्मकथाएँ पसंद हैं- शोएब अख़्तर, स्टीव जॉब्स वगैरह की.
आजकल मैं अपनी पत्नी शिखा से रुचियों में विविधता का हुनर सीख रहा हूँ.
मेरी उम्र के शख़्स को दुनिया का ज्ञान जितना होना चाहिए उतना मेरा नहीं है क्योंकि मेरी रुचियां बहुत सीमित हैं.
यह बहुत अच्छा हुआ कि मैंने इंजीनियरिंग से मैनेजमेंट का रुख कर लिया. यदि मैं इंजीनियर बना रहता तो यक़ीन मानिए बहुत ख़राब इंजीनियर साबित होता.
मुझे इस बात का एहसास हुआ है कि यदि आप वो काम करते हैं जिसमें आपका हुनर है और जिसे लेकर आप में जुनून है तो आपकी सफलता की संभावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं.
अगर आप तितली हैं तो उड़िए. मैंने यही किया. मैं कई बार लड़खड़ाया भी लेकिन आखिरकार उस जगह पहुँच ही गया जहां मेरे हुनर और मेरी पसंद दोनों परों को आसमान नसीब हुआ.
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