क्यों 'घर' को झुग्गी कहने से नाराज़ हैं कुछ भारतीय?

- Author, राहुल टंडन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता
कोलकाता के बहुत से पत्रकारों की तरह मुझे भी ब्रितानी महारानी के पूर्व फुटमैन बदर अज़ीम की तलाश थी जिन्हें अपना वीज़ा खत्म होने के बाद भारत लौटना पड़ा.
ब्रितानी अखबारों ने इसे उनका 'बकिंघम पैलेस से कोलकाता की झुग्गी तक का सफर' कहा जो उनके परिवार को पसंद नहीं आया.
पिछले दिनों जब ब्रितानी शाही परिवार में नए सदस्य का जन्म हुआ तो बकिंघम पैलेस के बाहर इसकी आधिकारिक सूचना लगाते हुए बदर अज़ीम की तस्वीरें दुनिया भर के मीडिया में देखी गईं.
जब मैंने और कुछ अन्य पत्रकारों ने कोलकाता में बदर अज़ीम के घर पर दस्तक दी तो उनके चाचा ने दरवाज़ा खोला.
हममें से कुछ पत्रकार ब्रितानी मीडिया संस्थानों के लिए भी काम करते हैं. बदर के चाचा ने हमें घूरा और पूछने लगे कि विदेशी अखबार उनके भतीजे के बारे में झूठ क्यों लिख रहे हैं.

और आखिर में उन्होंने कहा, “वे सोचते हैं कि हम सब भारतीय झुग्गियों में ही रहते हैं.” कुछ स्थानीय पत्रकार भी उनकी बात से सहमत थे.
स्लम की परिभाषा
बदर के घर के बाहर मुझे अपनी एक पुरानी दोस्त मिली जो स्थानीय समाचार एजेंसी के लिए काम करती है. उनके चेहरे पर मुस्कान थी और बोलीं, "तो आज तुम झुग्गियों में घूम रहे हो."
इससे पहले कि मैं कुछ कहता, वो बोलीं, “तुम स्लम यानी झुग्गी को कैसे परिभाषित करते हो.. मेरा मतलब है कि तुम्हें कैसे पता चल जाता है कि कौन सा इलाका झुग्गी बस्ती है और कौन सा नहीं.”
ये अच्छा सवाल था. मैंने पूरे आत्मविश्वास से कहा, “लगता है कि तुम्हें ये नहीं पता है. तुम गूगल पर क्यों नहीं ढूंढती हो.”
इससे पहले कि वो कोई जवाब देती, मैं अपने फोन पर टाइप करने लग गया था. चंद सेकंडों में मुझे सबसे भरोसेमंद स्रोत यानी ऑक्सफोर्ड इंग्लिंश डिक्शनरी से स्लम का अर्थ मिला. इसके अनुसार, "शहर का वो गंदा इलाका जहां कम जगह में बहुत सारे ग़रीब लोग रहते हैं."
फिर हमने उस इमारत को देखा जिसमें बदर अज़ीम रहते हैं. वो, उनके भाई, मां और पिता और हो सकता है कि कुछ रिश्तेदार भी. ये सभी उस इमारत की सबसे ऊपर वाली मंजिल पर रहते हैं.
बाहर से देखने में वो इमारत खस्ताहाल और मटमैली दिखती है. वहां खुली नालियां थी और वो इलाका लोगों से भरा हुआ था जिनमें ज्यादातर बच्चे थे. इनमें से ज्यादातर बच्चों को स्कूल में होना चाहिए था.
'मेरे पास टीवी है मोटरसाइकिल है'

हमारी बातों को ध्यान से सुन रहे बदर के एक पड़ोसी गुलाम मोहम्मद ने कहा, “ये झुग्गी बस्ती नहीं हो सकती क्योंकि यहां सभ्य लोग रहते हैं.”
उन्होंने बताया कि वो बाकयदा एक दफ्तर में काम करते हैं तो फिर वो कैसे झुग्गी में रह सकते हैं.
वो कहते हैं, “मेरे पास टीवी है, मोटरसाइकिल है. क्या झुग्गी बस्ती में रहने वालों के पास ये चीजें होती हैं.”
ये पहला मौका नहीं है जब भारत में रहने वाले लोग अपने लिए झुग्गी या गंदी बस्ती शब्द के इस्तेमाल से दुखी हुए हैं.
'विदेशी नज़रिया'
ब्रितानी निर्देशक डैनी बॉयल की बनाई ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ फिल्म ने भले ही कई ऑस्कर पुरस्कार अपने नाम किए हों लेकिन भारत में फिल्म के नाम का बहुत विरोध हुआ.
मुझे याद है कि जब मैं मुंबई के तथाकथित सबसे बड़े झुग्गी बस्ती इलाके में गया तो वहां पोस्टर दिखे, जिन पर लिखा था, “मैं स्लमडॉग नहीं हूं, बल्कि भारत का भविष्य हूं.”
तेज़ी से बढ़ रही भारत की अर्थव्यवस्था को देखते हुए भी ये गुस्सा ज्यादा देखने को मिल रहा है.
भारत का मध्य वर्ग चाहता है कि दुनिया उसकी प्रगति को देखे, न कि गरीबी को जो अब भी देश के कई हिस्सों मौजूद है.
हाल ही में मेरे एक दोस्त ने मुझसे कहा, “तुम विदेशियों की परेशानी ये है कि तुम हमें अब भी सपेरे और भिखारियों का देश समझते हो.”
मैंने उससे कहा कि ये पत्रकारों का नहीं बल्कि संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि मुंबई की पचास फीसदी आबादी झुग्गी बस्तियों में रहती है. उसने अपने कंधों को उचकाते हुए कहा कि वो भी तो विदेशी ही हैं.
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