आंतरिक सुरक्षा बैठक से पहले ही विवाद शुरू

छत्तीसगढ़ हमला
इमेज कैप्शन, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के क़ाफिले पर हुए हमले में 27 लोगों की मौत हो गई थी.

तमिलनाड़ु की मुख्यमंत्री जयललिता ने आंतरिक सुरक्षा पर आयोजित प्रधानमंत्री की बैठक में शामिल होने से ये कहते हुए इंकार कर दिया है कि इस तरह की 'रस्मी' सम्मेलनों में मुख्यमंत्रियों को अपने विचार रखने का 'बहुत कम मौक़ा' मिल पाता है.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ तमिलनाड़ु की मुख्यमंत्री ने ये बातें मनमोहन सिंह को भेजे गए एक ख़त में कही हैं.

पीटीआई ने सूत्रों के हवाले ये ख़बर भी दी है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी बुधवार को दिल्ली में होने वाले सम्मेलन में शामिल नहीं होंगी और उनकी जगह राज्य का प्रतिनिधित्व प्रदेश के वित्त मंत्री अमित मित्रा करेंगे.

पश्चिम बंगाल के कई इलाक़े माओवादी गतिविधियों से प्रभावित हैं.

केंद्रीय गृह मंत्रालय की एक प्रेस रिलीज़ में कहा गया है कि सम्मेलन में पुलिस सुधार, आतंकवाद से निबटने की क्षमता, ख़ुफ़िया तंत्र को मज़बूत करने, राष्ट्रीय आतंकरोधी केंद्र या एनसीटीसी और नक्सलवाद जैसे मामलों पर चर्चा होगी.

नक्सलवाद के मुद्दे पर प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों का एक अलग सत्र भी आयोजित किया गया है.

सवाल उठेंगे

25 मई को छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के क़ाफ़िले पर हुए हमले के बाद हो रहे एक दिन के इस सम्मेलन को बहुत अहम बताया जा रहा है.

पूर्व पुलिस महानिदेशक और नक्सल समस्या पर किताब लिख चुके प्रकाश सिंह कहते हैं कि बैठक की पृष्ठभूमि थोड़ी अलग है.

वो कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में हमले में एक बड़े राजनीतिक दल के अहम नेताओं की मौत के बाद सत्ता के गलियारों में ये सवाल उठ रहे हैं कि माओवाद से निपटने की अब तक की रणनीति क्या कारगर है?

लेकिन इस बैठक में दो प्रदेशों के मुखिया के शामिल न होने पर कई तरह के सवाल खड़े होंगे. ख़ासतौर पर उस स्थिति में जब उनमें से एक ने साफ़ तौर पर कहा है कि मुख्यमंत्रियों को ऐसी बैठकों में ठीक से बोलने का मौक़ा तक हासिल नहीं हो पाता.

ख़त

चरमपंथ
इमेज कैप्शन, चरमपंथ के बढ़ते ख़तरे के बावजूद रणनीतियों पर मतभेद की वजह से अमल नहीं हो पा रहा.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भेजे गए ख़त में जयललिता ने कहा है, "इस सम्मेलन में भी 12 अहम मुद्दों पर बहस हो रही है. इन विषयों के शीर्षक को पढ़ने के लिए ही कम से कम 10 मिनट दरकार है, लेकिन बदक़िस्मती से मुख्यमंत्रियों को अपने विचारों को रखने की लिए इतना ही वक्त दिया जाता है."

उन्होंने कहा है कि मुख्यमंत्रियों के सम्मेलनों को महज़ एक वक्त-वक्त पर होने वाली रस्म में तब्दील कर दिया गया है और अक्सर उनकी बात को निर्दयता से बीच में ही काट दिया जाता है.

अपने-अपने क्षेत्रों में क़ानून व्यवस्था की ज़िम्मेदारी राज्यों की है इसलिए आंतरिक सुरक्षा के मामले में उनके विचार बहुत अहम है और कोई भी नीति उनकी हामी के बग़ैर कारगर नहीं हो सकती है.

पिछले दिनों एनटीसीटी के मामले पर केंद्र की तमाम कोशिशों के बावजूद राज्य सरकारें इसके कई प्रावधानों का पुरज़ोर विरोध करती रही हैं और इसी वजह से चरमपंथ की बढ़ती समस्या के बावजूद इस मामले में कोई ख़ास प्रगति नहीं हो पाई है.

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