वो दिलसुखनगर नहीं दिल-खुश-नगर था....

जैसे ही हैदराबाद के <link type="page"> <caption> दिलसुखनगर में बम धमाके</caption> <url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/02/130221_hyderabad_dilsukh_blast_ms.shtml" platform="highweb"/> </link> की ख़बर सुनी, आंखों के आगे उस इलाके में बिताए डेढ़ साल सामने आ गए.
2005 की बात है, एक न्यूज़ चैनल में नौकरी करते हुए मैंने और मेरे कुछ दोस्तों ने दिलसुखनगर में ही अपना ठिकाना जमाया था.
हैदराबाद की सीमा पर लगा ये इलाका शहर को रंगारेड्डी और मेडक जिले से जोड़ता है.
राज्य में चलने वाली लगभग सभी प्राइवेट और सरकारी बसें इस रुट से होकर गुज़रती हैं. दिलसुखनगर के रिहायशी इलाके में कई हिंदी भाषी लोग मिल जाएंगे जो शहर के बाहर स्थित फैक्ट्रियों में काम करते हैं और इसलिए यहां आकर बसे हैं.
जहां तक मुझे याद आता है ये एक दक्षिण भारतीय ब्राह्मणों से बहुल इलाका है जहां किराए पर मकान देने से पहले पूछा जाता है कि कहीं आप मांसाहारी तो नहीं है?
जहां सुबह सुबह ऑफिस जाते वक्त लगभग हर दूसरे घर के बाहर सफेद आटे से बनाया गया कोलम नज़र आ जाता था वहीं दिलसुखनगर से एक किलोमीटर की दूरी पर मलकपेठ है जहां मुसलमानों की संख्या अधिक है.
व्यस्ततम बाज़ार

अब बात दिलसुखनगर के बाज़ार की जहां गुरुवार की शाम धमाके हुए. मुझे इस बाज़ार की ख़ास बात ये लगती थी कि अन्य बड़े शहरों के मुकाबले यहां सिर्फ शनिवार, रविवार नहीं, बल्कि हर शाम काफी मात्रा में लोग खरीददारी करने आते हैं.
यहां स्थित कपड़ों की दु्कानें और टिफिन सेंटर में बगैर किसी त्यौहार के भी रोशनी की झालरें लगी रहती थी. ये आलीशान नहीं बल्कि मध्यम-वर्गीय परिवारों की जेब के अनुकूल बाज़ार था.
हालांकि सुनने में आया है कि पिछले कुछ सालों में शहर के कुछ सबसे बड़े शॉपिंग मॉल इस इलाके की शान बन गए हैं.
हैदराबाद के कई जगहों की तरह दिलसुखनगर में भी सिनेमा हॉल की कमी नहीं थी. मेरी जानकारी में उस वक्त इस इलाके में कम से कम 3-4 थिएटर हुआ करते थे जहां ज़्यादातर तेलुगू फिल्में लगती थी.
धमाके का शिकार बने वेंकटाद्री और कोणार्क थिएटर काफी छोटे हैं लेकिन व्यस्ततम बाज़ार का अहम हिस्सा हैं.
साईं बाबा मंदिर

और हां, दिलसुखनगर में स्थित साईं बाबा मंदिर को भूलाया नहीं जा सकता जो शहर के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है और विशेष तौर पर गुरुवार को यहां श्रद्धालुओं का अच्छा खासा जमावड़ा रहता है.
2002 में इसी मंदिर के पास बम विस्फोट हुआ था जिसमें दो जानें गई थीं. शायद इसके बाद से ही यहां गुरुवार को पुलिस ज़्यादा चाक चौबंद रखती है.
ऐसा तीसरी बार हुआ है कि दिलसुखनगर बम धमाकों का शिकार हुआ है. 2002 के बाद 2007 में जब हैदराबाद के कोठी और लुंबिनी पार्क में विस्फोट हुए तब दिलसुखनगर में भी एक बम पाया गया जिसे समय रहते नाकाम कर दिया गया था.
कई बार मुझ जैसे बाहर से आए लोग दिलसुखनगर को दिल-खुश-नगर कह देते हैं. लेकिन कल से इस नगर के दिल की खुशी और सुख दोनों नदारद है.












