लोक-परलोक दोनों बदल रही हैं सड़कें

मणिकर्णिका घाट
इमेज कैप्शन, अब दूर-दूर के लोग भी मणिकर्णिका में अंतिम संस्कार के लिए आने लगे हैं
    • Author, ब्रजेश उपाध्याय
    • पदनाम, हाइवे हिंदुस्तान से

अस्सी साल के सकलदीप राय धू धू कर जल रहे थे. चिलचिलाती धूप में पटना के माधोपुर गांव से बनारस तक की यात्रा उन्हें बस की छत पर करनी पड़ी...अकेले.

बस के अंदर थे उनके परिवारजन जो इस आख़िरी यात्रा के आख़िरी पड़ाव तक उनके साथ आए. और जब बनारस के मणिकर्णिका घाट पर उनकी चिता को आग लगी तो मानो सबके चेहर पर एक संतोष था.

उनके एक रिश्तेदार का कहना था, “हिंदूओं के लिए काशी की अहमियत हमेशा से रही है. और अब सड़कें इतनी अच्छी हो गई हैं कि आना जाना भी आसान है...पहले तो घुटने भर के गढ्ढे हुआ करते थे.”

और स्वर्ग के रास्ते से जोड़नेवाली इस नगरी को भारत के दूसरे हिस्सों से जोड़नेवाली सड़कें जैसे जैसे बेहतर हो रही हैं, यहां अंतिम संस्कार की संख्या बढ़ती जा रही है.

फ़ौजदार प्रसाद मणिकर्णिका घाट के डोमराज के लिए काम करते हैं. उनका कहना है कि जब से सड़कें बेहतर हुई हैं यहां आनेवालों की तादाद में पचास प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

कहते हैं, “अब दूरियां कम होने की वजह से शव भी ख़राब नहीं होते.”

इहलोक

सड़कें परलोक सुधार रही हैं या नहीं ये तो कोई नहीं जानता, लेकिन इस लोक में रहनेवालों के लिए ढेरों मौके पैदा कर रही हैं.

बनारस के बाहर चार लेन की हाइवे के ठीक बगल में बने राजा तालाब सब्ज़ी मंडी में आसपास के गांवों के किसान रिक्शे, ट्रैक्टर और साइकिल पर सब्ज़ियां बेचने आते हैं.

मिर्च की खेती करनेवाले देवनाथ सिंह का कहना है कि अब वो अपना माल बिना किसी बिचौलिए के बेचते हैं और इससे आमदनी काफ़ी बढ़ी है. उनके बच्चे स्कूल जाते हैं, एक लड़का आईआईटी की तैयारी कर रहा है.

प्रभाकर पटेल गोभी उगाते हैं और बढ़ती आमदनी से उन्होंने अपने जीवनस्तर में काफ़ी सुधार किया है.

कहते हैं, “अब मेरे पास टीवी है, बाजा है और ज़रूरत की दूसरी चीज़ें हैं. मेरी बेटियां भी पढ़ रही हैं और बेटा पॉलीटेक्निक का छात्र है. मेरी कोशिश है कि ये बच्चे हमसे कहीं आगे बढ़ें.”

मजबूरियाँ

वाराणसी का सब्ज़ी बाज़ार
इमेज कैप्शन, छोटे किसान भी थोक बाज़ार में सब्ज़ी लेकर आते हैं

लेकिन तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है.

कई छोटे किसान जिनकी उपजाऊ ज़मीन हाइवे के ठीक किनारे थी, अब मुसीबत में हैं.

हाइवे के पास ही के गांव में रहनेवाले राधेश्याम चौबे कहते हैं फ़ायदा उन्हें हुआ जिनकी थोड़ी ज़मीन तो बिकी लेकिन हाइवे के किनारे कुछ बच भी गई.

वे कहते हैं, “बची हुई ज़मीन की कीमत अब लाखों में है लेकिन जिनके पास कोई ज़मीन नहीं बची वो सड़कों पर मेहनत मज़दूरी करने पर मजबूर हो गए हैं.’’

उनका कहना है कि ये मिट्टी इतनी उपजाऊ है कि यहां किसान छोटी से ज़मीन से भी खुशहाल रहता था.

“अब वो यहां बन रही कंपनियों में बोतलें और शीशी ढोता है.”

ज़ाहिर है हाइवे हिंदुस्तान अभी कई करवटें लेगा, कई मोड़ आएंगे और तभी पता चलेगा कि भारत कहां पहुंचने वाला है.