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कश्मीर के पुंछ और राजौरी में क्यों नहीं पकड़े जा रहे चरमपंथी?
- Author, मोहित कंधारी
- पदनाम, जम्मू से बीबीसी हिंदी के लिए
जम्मू कश्मीर के सीमावर्ती ज़िले पुंछ और राजौरी में 20 अप्रैल और 5 मई को चरमपंथियों ने भारतीय सेना के जवानों पर हमले किए. इन दोनों हमलों में सेना के 10 जवान मारे गए जिनमें स्पेशल फ़ोर्स के पांच पैरा कमांडो भी शामिल थे.
पिछले एक महीने से सेना ने अन्य सुरक्षाबलों के साथ मिलकर इन दोनों ज़िलों के सीमावर्ती इलाकों को घेर रखा है, लेकिन अब तक इनके हाथ कोई बड़ी कामयाबी नहीं लगी है.
जम्मू में रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता लेफ़्टिनेंट कर्नल देवेंद्र आनंद ने बीबीसी हिंदी को बताया कि हमले के लिए ज़िम्मेदार चरमपंथियों की तलाशी के लिए अभियान अभी जारी है.
महज़ 15 दिनों के भीतर इन दो हमलों से आस पड़ोस के इलाक़े में दहशत का माहौल है.
इस साल गर्मियों के मौसम में गुज्जर बकरवाल समुदाय के सदस्यों और स्थानीय निवासियों को ऊपरी इलाकों में जाने की इजाज़त नहीं दी गई है.
सरपंच एसोसिएशन बालाकोट, पुंछ के प्रधान अब्दुल क़यूम ने बीबीसी हिंदी से टेलीफ़ोन पर बातचीत में बताया, "जब से सेना के ट्रक पर चरमपंथियों ने हमला बोला है, पूरे इलाके में दहशत का माहौल है."
वहीं भाटा दूरियां के सरपंच अब्दुल क़यूम कहते हैं, "हमने 1990 के दशक में लंबे समय तक तनाव भरा जीवन बिताया है. पिछले कुछ सालों से इलाके में तरक़्क़ी के काम हो रहे थे, लोग अमन से अपनी ज़िंदगी जी रहे थे, फिर अचानक पूरे इलाके में दहशत फैल गई है."
वहीं राजौरी के कंडी इलाके के रहने वाले समाजसेवी, सेवानिवृत्त सूबेदार मो. अयूब मन्हास ने बीबीसी हिंदी को बताया कि पांच मई की घटना के बाद से पूरे इलाके में सैलानियों का आना कम हो गया है.
1981एशियन गेम्स में शिरकत कर चुके अयूब मन्हास ने अपनी कुश्ती के दांव-पेच दिखा कर पूरे इलाके का नाम रोशन किया था.
उन्होंने टेलिफ़ोन पर बताया, "गर्मी के मौसम में स्थानीय ओर बाहरी टूरिस्टों की 500-600 गाड़ियां केसरी हिल्स पहुंचती थीं, लेकिन मई 5 के हमले के बाद से इलाके में वो रौनक नहीं है. स्थानीय लोग भी डरे हुए हैं."
ऑपरेशन त्रिनेत्र में अब तक क्या हुआ
चरमपंथियों की तलाशी के लिए पूरे इलाके में चलाए जा रहे ऑपरेशन त्रिनेत्र के दौरान ही पांच मई को स्पेशल फ़ोर्सेज़ के पांच पैरा कमांडो राजौरी ज़िले के कंडी इलाके में केसरी हिल के पास चरमपंथियों से हुई मुठभेड़ में मारे गए थे.
सेना के मुताबिक़, चरमपंथियों ने प्राकृतिक गुफा की आड़ लेकर पहला धमाकेदार विस्फोट किया. फिर उसके बाद जवाबी कार्रवाई में पांच पैरा कमांडो मारे गए थे.
छह मई को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के राजौरी दौरे से ठीक पहले नगरोटा स्थित सेना की वाइट नाइट कोर ने अपने ट्विटर हैंडल से एक बयान जारी कर बताया था कि छह मई को सेना ने ऑपरेशन त्रिनेत्र के दौरान एक चरमपंथी को मार गिराया था और एक अन्य चरमपंथी के घायल होने की आशंका जताई थी.
इसके बाद 22 मई तक भारतीय सेना ने ऑपरेशन त्रिनेत्र के बारे में कोई जानकारी साझा नहीं की है.
क्यों पकड़ में नहीं आ रहे चरमपंथी?
ऑपरेशन त्रिनेत्र में हिस्सा ले रहे सुरक्षाबलों और उनके वरिष्ठ अधिकारियों का साफ़ तौर पर मानना है कि लम्बे समय से घने जंगलों में किसी की आवाजाही न होने की वजह से चरमपंथियों ने घने जंगलों में प्राकृतिक गुफाओं के अंदर अपने ठिकाने बना रखे हैं.
जम्मू कश्मीर पुलिस के महानिदेशक दिलबाग सिंह ने 28 अप्रैल को राजौरी के दरहाल में संवाददाताओं से बातचीत में कहा, "ऐसा माना जा रहा है चरमपंथियों ने घने जंगलों के भीतर प्राकृतिक गुफाओं में अपने ठिकाने बना रखे हैं."
दिलबाग सिंह ने यह भी बताया था कि '20 अप्रैल के हमले के बाद से सुरक्षाबलों ने अब तक कुल 221 संदिग्धों को बुला कर उनसे गहन पूछताछ की है इसमें से लगभग आधा दर्जन से अधिक लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया है. इन लोगों को चरमपंथियों को शरण देने और मदद करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.'
राजौरी और पुंछ निशाने पर
अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद से कश्मीर घाटी के हालात लगातार सुधर रहे हैं.
वहीं पीर पंजाल के दूसरी तरफ़ जम्मू संभाग के सीमावर्ती राजौरी और पुंछ ज़िलों में पिछले दो सालो में सबसे अधिक सैनिकों ने अपनी जान गंवाई है.
बीते ढाई वर्षों के दौरान राजौरी और पुंछ में सेना के 26 जवान और नौ आम नागरिक मारे गए हैं.
कश्मीर की तुलना में यह आंकड़ा कहीं अधिक है. इसी समय सीमा पर कश्मीर में भारतीय सेना के छह जवान मारे गए.
जम्मू-कश्मीर पुलिस का कहना है कि 'कश्मीर घाटी में चरमपंथी संगठन युवाओं को भर्ती करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं. पिछले साल की तुलना में उनकी संख्या घट कर 100 से भी कम हो गई है, इसलिए पुंछ और राजौरी के घने जंगलों के रास्ते घुसपैठ करा कर सेना के ठिकानों को निशाना बनाने की साज़िश रची जा रही है.'
जम्मू और कश्मीर के पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह के मुताबिक़, "चरमपंथियों की भर्ती घटकर दो अंकों में आ गई है. पिछले साल से चरमपंथियों ने अपनी रणनीति में बदलाव लाते हुए निचले स्तर के पुलिस अधिकारियों, अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों और प्रवासी श्रमिकों को निशाना बना कर शांति भंग करने का प्रयास किया है, लेकिन सुरक्षाबलों ने समय रहते हालात पर क़ाबू पा लिया है."
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जब चरमपंथियों का कोई सुराग नहीं मिला
11 अक्टूबर, 2021 को जम्मू-कश्मीर के पुंछ ज़िले में चरमपंथियों के साथ मुठभेड़ में भारतीय सेना के एक नायब सूबेदार सहित पांच सैनिकों की मौत हुई थी.
दो दिन बाद 14 अक्टूबर को इसी इलाके के नज़दीक मेंढर में एक अन्य मुठभेड़ में एक जूनियर कमीशंड ऑफ़िसर सहित भारतीय सेना के चार और जवान मारे गए थे.
कुल मिलाकर भारतीय सेना के नौ सैनिक इन मुठभेड़ों में मारे गए, लेकिन किसी भी चरमपंथी के पकड़े या मारे जाने के बारे में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया था.
इन दोनों मुठभेड़ों के बाद भारतीय सेना ने पुंछ के इलाके में कार्रवाई शुरू की जो क़रीब चार हफ़्तों तक चली. जिन इलाकों में सेना का ऑपरेशन चला वो 10 से 15 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला जंगल था.
ये एनकाउंटर सबसे लंबे समय तक चला था, लेकिन एक महीने बाद भी चरमपंथियों का कोई सुराग नहीं मिला.
कुछ दिन बाद इस एनकाउंटर को बंद कर दिया गया और इस बारे में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई.
इसके अलावा 18 दिसंबर, 2022 को राजौरी में अल्फा गेट के बाहर एक चरमपंथी हमले में दो नागरिक मारे गए.
इसके बाद 1 जनवरी, 2023 को राजौरी ज़िले के डांगरी गांव में दो चरमपंथियों द्वारा की गई गोलीबारी और आईईडी विस्फोट में अल्पसंख्यक समुदाय के सात नागरिक मारे गए, जिनमें से दो नाबालिग थे. इन दोनों मामलों में अब तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हुई है.
हमले रोकने के लिए क्या है नई रणनीति
चरमपंथियों द्वारा सेना के जवानों को राजौरी ओर पुंछ ज़िलों में निशाना बनाने के बाद से सेना ने ऐसे हमले रोकने के लिए पहले से तय एसओपी (स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर) को सख़्ती से लागू करना शुरू कर दिया है.
सेना की ओर से सुरक्षाबलों की मूवमेंट से पहले सड़क मार्ग को खोजी कुत्तों (स्निफ़र डॉग्स) की मदद से खंगाला जा रहा है ताकि किसी प्रकार का विस्फोटक रास्ते में अगर रखा गया हो तो उसका पता लगाया जा सके. इसके अलावा जगह-जगह पुलिस की मदद से सिक्योरिटी चेक पॉइंट संचालित किए गए हैं ताकि पूरे इलाके में आने-जाने वाले लोगों पर नज़र रखी जा सके.
नियंत्रण रेखा से सटे रिहायशी गांवों में अपना सूचना तंत्र मज़बूत करने के साथ-साथ स्थानीय निवासियों के साथ बेहतर ताल-मेल बिठा कर गांव में आने जाने वाले लोगों पर नज़र रखी जा रही है. अत्याधुनिक तकनीक की मदद भी ली जा रही है, लेकिन इन सबके बावजूद चरमपंथी पकड़ में नहीं आ रहे हैं.
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