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जम्मू-कश्मीर पुलिस को चरमपंथी क्यों बना रहे हैं निशाना?
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए
भारत प्रशासित कश्मीर में श्रीनगर के जेवन इलाके में एक चरमपंथी हमले में जम्मू-कश्मीर पुलिस के दो जवान मारे गए हैं जबकि 12 पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं.
ये हमला शाम के क़रीब सात बजे जेवन-पन्था चौक रोड पर अंजाम दिया गया. इस हमले के बाद कई सवाल खड़े हो गए हैं.
चरमपंथियों ने जम्मू-कश्मीर पुलिस की एक बस में सवार जवानों पर अंधाधुंध फ़ायरिंग की.
जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देनेवाले अनुच्छेद 370 को समाप्त किए जाने के बाद ये एक बड़ा चरमपंथी हमला है.
बेहद सुरक्षित माने जाने वाले इलाक़े में हुई घटना
जिस जगह ये हमला हुआ है उस पूरे इलाके के इर्द-गिर्द सुरक्षा की कड़ी निगरानी रहती है और इस इलाके में कई सुरक्षा एजेंसियों के कैंप्स और दफ्तर भी मौजूद हैं. इस इलाके में हर दिन पुलिस और सुरक्षाबलों की गाड़ियों का आना-जाना रहता है. यह इलाका श्रीनगर-जम्मू राष्ट्रीय राजमार्ग से सटा हुआ है.
सोमवार को जेवन इलाके की घटना से पहले श्रीनगर के रंगराइट इलाके में पुलिस ने दो चरमपंथियों को एक मुठभेड़ में मारने का दावा किया था.
दो दिन पहले ही उत्तरी कश्मीर के बांदीपोरा इलाके में जम्मू-कश्मीर पुलिस के दो जवान एक चरमपंथी हमले में मारे गए थे.
बीते कुछ महीनों में कश्मीर में आम लोगों की हत्याओं ने भी सुरक्षा एजेंसिओं के कामकाज पर सवाल खड़े किए थे.
श्रीनगर के जेवन में ताज़ा चरमपंथी हमले के बाद जानकारों और राजनीतिक दलों ने सवाल उठाए हैं. राजनीतिक हलकों ने जहां भारत सरकार के कश्मीर में हालात ठीक होने के दावों को खोखला बताया है, वहीं जानकार बताते हैं कि सुरक्षा की इतनी बड़ी चूक नहीं होनी चाहिए थी.
पूर्व पुलिस प्रमुख ने हमले को बताया बड़ी चूक
जम्मू-कश्मीर पुलिस के पूर्व डायरेक्टर जनरल डॉक्टर शेष पाल वैद ने बीबीसी को बताया कि इतने बड़े सुरक्षा इलाके में इस तरह का चरमपंथी हमला नहीं होना चाहिए था और इस हमले को रोका भी जा सकता था.
वह बताते हैं, "एक तो ये इलाका शहर का बाहरी इलाका है. दूसरी बात ये कि इस इलाके में हमेशा सुरक्षाबल तैनात रहते हैं. इलाके की निगरानी करने के अलावा वहां से गुज़रने वाली सुरक्षाबलों की गाड़ियों के लिए रोड ओपनिंग पार्टी (आरओपी) तैनात रहती हैं और गाड़ियों पर भी निगाह रहती है.
इस इलाके में आतंकवादी ऐसा करने की कोशिश करें तो ये हमारी चूक है. मुझे लगता है कि रोड ओपनिंग पार्टी (आरओपी) लगी होनी चाहिए थी और एरिया डोमिनेशन भी होना चाहिए था. मैं समझता हूँ कि इस तरह के हमले को रोका जा सकता था और ऐसा नहीं होना चाहिए था. किसी दूर-दराज़ इलाके में ऐसा हमला होता तो बात कुछ और थी, लेकिन जहां सुरक्षाबलों की मौजूदगी है वहां इस तरह की घटना को टाला जा सकता था."
रोड ओपनिंग पार्टी (आओपी) सुरक्षाबलों के उस दस्ते में होती हैं जो सड़क पर लगाई जाती हैं और अपने आस-पास के इलाके को पूरी निगरानी में रखती हैं.
पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि चरमपंथियों ने रोड ओपनिंग पार्टी के न होने का फ़ायदा उठाया है. उनका ये भी कहना था कि पुलिस की बस जिस समय वहां से गुज़री है, उससे पहले ही वहां से रोड ओपनिंग पार्टी अपने ठिकानों पर रवाना हो चुकी थी.
उनका कहना था कि इस हमले में सबसे बड़ी चूक यही हुई है कि रोड ओपनिंग पार्टी को जब निकाला गया, उसके बाद हमलावरों को हमला करने का मौक़ा मिला और उन्होंने हमले को अंजाम दिया.
हमले से क्या संदेश देने की कोशिश
कश्मीर ज़ोन के इंस्पेक्टर जनरल विजय कुमार को बीबीसी ने हाई सिक्योरिटी ज़ोन में हुए इस हमले के हवाले से व्हाट्सऐप पर सवाल भेजे थे लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया.
श्रीनगर के वरिष्ठ पत्रकार हारून रेशी कहते हैं कि कश्मीर में चरमपंथियों के हमले में बढ़ोतरी बताती है कि परिस्थितियां ठीक नहीं हैं.
वो कहते हैं कि सुरक्षा एजेंसियां बार-बार दावा कर रही हैं कि स्थिति नियंत्रण में है लेकिन यह सच नहीं है, हम देख रहे हैं कि चरमपंथी लगातार हमले कर रहे हैं इसलिए यह साफ़ है कि कश्मीर में ग्राउंड पर हम जो देख रहे हैं वो अच्छा नहीं है.
कश्मीर में चरमपंथी घटनाओं में अचानक से तेज़ी पर बात करते हुए शेष पाल वैद कहते हैं कि ये एक सोची-समझी साज़िश के तहत हो रहा है.
उन्होंने कहा कि कि कश्मीर में उस नैरेटिव को बदलने की कोशिश हो रही है जिसमें कहा जा रहा था कि आर्टिकल 370 को हटाने से कश्मीर में हालात बेहतर होंगे. इस नैरेटिव को ख़त्म करने के किए 'उस पार से ऐसा करने के मंसूबे बनते हैं.'
भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद कश्मीर में इस तरह के हमले क्यों हो रहे हैं? इस सवाल पर वैद कहते हैं, "बिल्कुल इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है. इसका मतलब है कि इन घटनाओं को अंजाम देने के लिए चरमपंथियों ने अपनी रणनीति बदली है. सिक्योरिटी का फिर से जाएज़ा लेना चाहिए कि कमी कहां पर रही है."
वैद ये भी बताते हैं कि जम्मू-कश्मीर पुलिस के जवानों को इसलिए निशाना बनाया जा रहा है ताकि वह चरमपंथ के ख़िलाफ़ अभियानों में शामिल न हों.
वैद का कहना था कि जम्मू-कश्मीर में पुलिस ने जिस तरह से चरमपंथ के ख़िलाफ़ काम किए हैं, उससे दूर रखने के लिए जम्मू-कश्मीर की पुलिस को निशाना बनाया जा रहा है.
जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों ने हमले की निंदा करने के साथ-साथ कश्मीर में सरकार के ठीक हालात के दावों पर सवाल भी खड़े किए हैं.
पीडीपी की अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने ट्वीट कर लिखा है, "श्रीनागर हमले में दो पुलिसकर्मियों की मौत से दुःख हुआ है. कश्मीर में हालात ठीक होने के सरकार के खोखले दावों से फिर पर्दा उठ गया है और ग़लतियों से सबक़ नहीं सीखा जा रहा है. पीड़ित परिवार के साथ पूरी हमदर्दी है."
जम्मू-कश्मीर बीजेपी के प्रवक्ता अल्ताफ़ ठाकुर ने एक बयान में बताया है कि 'ये हमला बुज़दिली है और रात के अंधेरे में पुलिस के जवानों को निशाना बनाया गया है.'
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