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अमित शाह की आलोचना में लिखे गए लेख पर क्यों है विवाद
- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
गृहमंत्री अमित शाह का एक भाषण, राज्यसभा के एक सांसद का अंग्रेज़ी अख़बार में लिखा दो महीने पुराना लेख और उप राष्ट्रपति का सांसद को समन. इन तीन बातों की खूब चर्चा हो रही है.
दरअसल, उप राष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने सीपीएम के राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास को उनके एक लेख पर बीते दिनों समन किया. ये लेख ब्रिटास ने अंग्रेज़ी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस में 20 फरवरी को लिखा गया था जिसमें गृहमंत्री अमित शाह के कर्नाटक की चुनावी में दिए गए भाषण की आलोचना की गई थी.
कर्नाटक के मंगलूरु में एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा था- "आपके बगल में ही केरल है. इससे ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा..."
जॉन ब्रिटास के इस लेख का शीर्षक था- 'पेरिल्स ऑफ़ प्रेपोगैंडा' यानी प्रेपोगैंडा के ख़तरे.
इसमें ब्रिटास ने लिखा कि 'किस तरह गृहमंत्री अमित शाह केरल राज्य को लेकर नकारात्मक बातें करते हैं और ये राज्य की छवि को बुरी बना कर पेश करने की कोशिश है.'
उन्होंने गृहमंत्री के बयान को इस बात से भी जोड़ा है कि चूंकि इस राज्य में बीजेपी को कभी चुनावी सफलता नहीं मिली इसलिए वो केरल को 'नापसंद' करती हैं.
लेकिन इस लेख पर सांसद को उपराष्ट्रपति के कार्यालय से समन किया गया और ब्रिटास से लेख पर सफ़ाई मांगी गई.
जॉन ब्रिटास ने बीबीसी को बताया कि 6 मार्च को इस मामले में उन्हें पहली बार उपराष्ट्रपति के सचिवालय की ओर से समन किया गया और बताया गया कि सभापति उनके अख़बार में लिखे लेख के सिलसिले में उनसे मिलना चाहते हैं.
बीजेपी नेता ने की थी शिकायत
केरल बीजेपी के महासचिव पी. सुधीर ने उप राष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के कार्यालय को ब्रिटास के लेख पर एक लिखित शिकायत भेजी थी, इसी शिकायत को ही आधार बनाकर उप राष्ट्रपति कार्यालय ने ब्रिटास को समन किया था.
19 अप्रैल को जॉन ब्रिटास और जगदीप धनखड़ के बीच मुलाकात हुई.
ब्रिटास कहते हैं, "मेरी सभापति महोदय के साथ 10 से 15 मिनट तक बैठक चली और उन्होंने मुझे बताया कि मेरे लेख के खिलाफ़ उन्हें एक शिकायत मिली है और पूछा कि मेरा उस लेख पर क्या कहना है? मेरे लिए ये हैरान करने वाला था कि एक अख़बार में लिखे लेख के लिए मुझे बुलाया गया. शिकायत में मेरे लेख को 'राजद्रोह' जैसा कृत्य बताया गया है."
"मुझे समन मिलना इसलिए परेशान करने वाली बात है क्योंकि ये एक तरह का दबाव मीडिया और अख़बारों पर भी है कि वो ऐसे लेख ना छापें जो सरकार या सत्ता पक्ष के नेता के खिलाफ़ हो, उनकी आलोचना करता हो."
'ये बताने की कोशिश है कि मॉनिटरिंग की जा रही है'
हालांकि राज्यसभा सचिवालय का कहना है कि सांसद ब्रिटास को लिखित 'कारण बताओ' नोटिस नहीं जारी किया गया है और ना ही उनसे लिखित जवाब मांगा गया है.
बीबीसी ने इस मामले पर बीजेपी सांसदों से बात करने की कोशिश की लेकिन हमें उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला.
सीपीएम के राष्ट्रीय महासचिव सीताराम येचुरी ने बीबीसी से कहा, "अगर सभापति सदन के किसी सदस्य की शिकायत पर जॉन ब्रिटास को समन करते तो वह नियमों के मुताबिक़ होता, लेकिन उन्होंने एक अख़बार में छपे लेख पर केरल बीजेपी के नेता की शिकायत पर समन किया जो उपराष्ट्रपति के अधिकार-क्षेत्र का हिस्सा ही नहीं है."
"ज़ाहिर है कि उन्हें भी पता है कि क़ानूनी तौर पर वो इस मामले में कुछ नहीं कर सकते लेकिन समन के ज़रिए ये बताया गया कि मॉनिटरिंग की जा रही है. ऐसा करना उस पद (उप राष्ट्रपति) की गरिमा के भी अनुकूल नहीं है."
क्या संवैधानिक रूप से सभापति ऐसा कर सकते हैं?
इस पूरे मामले को लेकर ये भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि उप-राष्ट्रपति कार्यालय क्या इस तरह के मामले में सांसद को समन कर सकता है? यही समझने के लिए हमने सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे से बात की.
दवे कहते हैं, "सभापति सदन में की गई अनुशासनहीनता पर कार्रवाई कर सकते हैं लेकिन संसद के बाहर सांसद अगर कुछ करते, लिखते हैं या बोलते हैं तो ये किसी भी तरह सभापति या उप राष्ट्रपति कार्यालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है."
सरकार की आलोचना को ख़त्म करने की कोशिश?
दुष्यंत दवे के अनुसार, "उप-राष्ट्रपति का पद एक बेहद गंभीर और संवैधानिक पद है. उस पद की गरिमा है और संसद के बाहर अगर कोई राजनीतिक राय रखता है तो इस बात पर कारण बताओ नोटिस जारी करना सभापति का काम ही नहीं है."
दवे कहते हैं कि "अगर शिकायत में कहा गया है कि सांसद का लेख 'राजद्रोह' की श्रेणी में आता है तो इसके लिए पुलिस एफ़आईआर होनी चाहिए. उप राष्ट्रपति आखिर इस तरह की शिकायत पर प्रतिक्रिया ही क्यों दे रहे हैं ये सवाल है."
कई राज्यसभा और लोकसभा सांसद प्रतिक्रिया दे रहे हैं, और इसे देश में सरकार की आलोचना को पूरी तरह ख़त्म करने की कोशिश बता रहे हैं.
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने इस मामले को लेकर ट्विटर पर लिखा है, "सुप्रीम कोर्ट में राजद्रोह की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका में मैं एक याचिकाकर्ता हूं. इस सेक्शन में कोई नया केस दर्ज नहीं हो सकता. लेकिन अब इसके लिए एक बीजेपी नेता ने राज्यसभा के सभापति को चिट्ठी लिखी और सभापति ने सांसद जॉन ब्रिटास को उनके 'राजद्रोही' लेख पर सफ़ाई देने के लिए उन्हें समन कर दिया."
"उपराष्ट्रपति जी सुप्रीम कोर्ट के स्टे ऑर्डर को कृपया पढें."
इस ममाले पर राज्यसभा में राष्ट्रीय जनता दल के सांसद मनोज झा ने बीबीसी से कहा, "जॉन ब्रिटास ने अमित शाह के एक भाषण का जवाब अपने लेख के ज़रिए दिया था. मुझे इस पूरे वाकए में सबसे ज़्यादा परेशान ये बात कर रही है कि क्या हम 'डीप-स्टेट' में रह रहे हैं. अगर ये डीप स्टेट किसी भी तरह से सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने या आलोचना को ही राजद्रोह बताने लगेगा तो हमें सोचना चाहिए कि हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं?"
"एक ऐसा माहौल बना दिया गया है जहां सरकार और सरकार के मंत्री को देश बताया जाने लगा है. बजरंग दल को 'बजरंगबली' कह दिया जा रहा है. हमारे देश में आलोचना की परंपरा काफ़ी समृद्ध रही है. आप उदाहरण लीजिए साल 1952 का, जब विपक्ष के पास नंबर मज़बूत नहीं थे लेकिन फिर भी उस वक्त पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आलोचना होती थी और कड़े से कड़े शब्दों में होती थी. कभी कांग्रेस या नेहरू जी ने इस पर आपत्ति नहीं की. ना ही कभी इस तरह पेश किया गया कि नेहरू ही देश हैं."
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"इसी सदन में बीजेपी का भी इतिहास ऐसा ही रहा है, जब अटल बिहारी वाजपेयी इंदिरा गांधी की आलोचना करते थे लेकिन उस वक्त भी कभी किसी सदस्य पर आलोचना ना करने का किसी तरह का दबाव नहीं रहा. मुझे बिलकुल लगता है कि उप राष्ट्रपति का सांसद को समन करना ये संदेश देने का तरीका है कि आलोचना ना की जाए, लेकिन सवाल ये है कि क्या इससे लोग डर जाएंगे या रुक जाएंगे. क्या देश में सवाल पूछने की प्रथा को ख़त्म कर दिया जाएगा."
"मैंने खुद सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले लेख इसी इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में लिखे हैं, शशि थरूर भी लेख लिखते रहे हैं, लेकिन जॉन के साथ जिस तरह का बर्ताव किया गया है ये बताता है कि आने वाले चुनाव से पहले सरकार किसी भी तरह की आलोचना नहीं चाहती."
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लेख में क्या है?
जिस लेख को लेकर इतनी चर्चा हो रही है उसे 20 फरवरी को जॉन ब्रिटास ने लिखा था.
इसमें उन्होंने लिखा, "कर्नाटक में चुनावी दौरे के दौरान गृहमंत्री अमित शाह का केरल को लेकर दिए गए बयान ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा. ये पहली बार नहीं है जब उन्होंने केरल के खिलाफ़ बयान दिया है, केरल ने बीजेपी की राजनीति को बार-बार ख़ारिज किया है. बीजेपी के नेता केरल की सबसे शिक्षित राज्य की उपलब्धि ख़ारिज करते रहते हैं."
"वो कहते हैं केरल को स्वास्थ्य के मामले में यूपी से प्रेरणा लेनी चाहिए जबकि स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में केरल काफ़ी बेहतर है. अमित शाह या बीजेपी के अन्य नेताओं का लगातार केरल पर निशाना साधना उनकी हताशा को दिखाता है और ये भी दिखाता है कि कैसे वो इस देश को हिंदू राष्ट्र बनाना चाहते हैं जो संविधान नहीं बल्कि मनुस्मृति से चले. "
ये पूरा लेख केरल से आने वाले सांसद की ओर से केरल की तारीफ़ों से भरा है और इसमें केरल को लेकर बीजेपी के नेताओं के बयानों को 'झूठा और प्रेपोगैंडा' फैलाने वाला बताया गया है.
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