कर्नाटक, तेलंगाना में मुस्लिम आरक्षण पर सवाल उठाकर बीजेपी को कितना फ़ायदा?

    • Author, कीर्ति दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कर्नाटक के बाद अब तेलंगाना में मुस्लिम आरक्षण पर बहस तेज़ हो चुकी है.

गृहमंत्री अमित शाह ने बीते दिनों एक रैली में एलान कि अगर तेलंगाना में बीजेपी की सरकार बनी तो राज्य में मुसलमानों को मिलने वाला आरक्षण ख़त्म कर दिया जाएगा.

उन्होंने एक रैली में कहा, "टू बेडरूम हॉल किचन की स्कीम में भी मुसलमानों को आरक्षण दिया. तेलंगाना की सरकार राज्य के लोगों के लिए चलेगी. यह ओवैसी के लिए नहीं चलेगी. संविधान विरोधी मुस्लिम रिज़र्वेशन शिक्षा, नौकरी में किया गया है. मैं कह कर जाता हूं कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनेगी तो मुस्लिम रिज़र्वेशन को हम समाप्त कर देंगे. ये अधिकार तेलंगना के एससी, एसटी और ओबीसी का है, उनको मिलेगा."

इस पर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अमित शाह को जवाब दिया, "बीजेपी कब तक नफ़रत फैलाएगी? तेलंगाना में जो आरक्षण मिल रहा है वे मुसलमानों में जाति के आधार पर मिल रहा है. अमित शाह का ये कहना कि आरक्षण धर्म के आधार पर मिल रहा है ये झूठ है. आखिर बीजेपी मुसलमानों की दुश्मन क्यों है?"

इससे पहले कर्नाटक में बीजेपी ने मुसलमानों को मिल रहे चार प्रतिशत आरक्षण को निरस्त कर दिया था.

कर्नाटक सरकार के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. दस मई को कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और सुप्रीट कोर्ट चुनाव से एक दिन पहले यानी नौ मई राज्य में मुसलमानों के आरक्षण को रद्द किए जाने की सुनवाई करेगा.

कोर्ट ने कहा है कि तब तक मुसलमानों को कर्नाटक में मिलने वाला आरक्षण जारी रहेगा.

कर्नाटक में मुसलमानों का रिज़र्वेशन रोकने का सरकार का फ़ैसला

लेकिन इससे पहले ये समझना ज़रूरी है कि तेलंगाना और कर्नाटक में मुस्लिमों को कितना आरक्षण मिलता है? इसकी कब शुरुआत हुई और बीजेपी ने इसे हटाने की वजह क्या बताई है.

सबसे पहले बात करते हैं कर्नाटक की.

राज्य की बीजेपी सरकार ने विधानसभा चुनाव की घोषणा से ठीक पहले मुसलमानों को मिलने वाला 4 फ़ीसदी आरक्षण रद्द कर दिया और इसे कर्नाटक के लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों के बीच 2-2 फ़ीसदी बांट गया.

बीजेपी का कहना है धर्म के आधार पर आरक्षण देना संविधान के खिलाफ़ है, इसलिए ये आरक्षण हटाया गया.

मार्च में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई ने इस फ़ैसले के बाद कहा था, "संविधान में धार्मिक आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. खुद डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था कि आरक्षण जाति के आधार पर तय होना चाहिए."

कर्नाटक में साल 1994 में मंडल कमीशन की सिफ़ारिशों के तहत मुसलमानों की कुछ जातियों को अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी) की श्रेणी में एक उप-श्रेणी बनाकर शामिल किया गया था.

इसके तहत मुसलमानों को 'सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन' के आधार पर चार फ़ीसदी आरक्षण देने की बात की गई.

कर्नाटक सरकार ने साल 1986 में चिनप्पा रेड्डी आयोग बनाया था. इस आयोग को काम दिया गया कि वह राज्य में आरक्षण के लिए योग्य जातियों-समुदायों की लिस्ट तैयार करे.

इस आयोग की सलाह पर ही ओबीसी के 32 फ़ीसदी कोटे में से मुसलमानों को चार फ़ीसदी आरक्षण देने का फ़ैसला किया.

ओबीसी श्रेणी में ही वोक्कालिगा और लिंगायतों को 4 और 5 फ़ीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था. वोक्कालिगा और लिंगायत कर्नाटक में काफ़ी प्रभावशाली समुदाय हैं.

लिंगायत और वोक्कालिगा को ख़ुश करने की कोशिश

अब कर्नाटक में जो आरक्षण की बदली व्यवस्था है उसमें मुसलमानों को मिलने वाला 4 फ़ीसदी आरक्षण ख़त़्म हो गया है. हालांकि नौ मई तक सुप्रीम कोर्ट ने यथास्थिति बहाल रखी है.

मैसूर यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर मुज़फ़्फर असादी जाति और आरक्षण के मुद्दे पर गहन अध्ययन करते रहे हैं.

प्रोफ़ेसर असादी कहते हैं, "वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय 17 फ़ीसदी आरक्षण की मांग कर रहे थे. अब मुसलमानों का हिस्सा मिलने के बाद भी उन्हें 6-7 फ़ीसदी आरक्षण ही मिल पाएगा. ये दोनों समुदाय आर्थिक रूप से काफ़ी समृद्ध हैं. इसके बावजूद उन्हें आरक्षण दिया जाना साफ़ तौर पर राजनीतिक क़दम है."

"सरकार ने इसे ख़ारिज करने की वजह इसका धार्मिक आधार बताई. लेकिन इसका आधार कभी धार्मिक था ही नहीं. बीजेपी ने जाति और समुदाय शब्द को लेकर गलतफ़हमी पैदा कर दी है. धर्म इस्लाम है लेकिन मुसलमान समुदाय है."

कर्नाटक में लगभग 12 फ़ीसदी मुसलमान आबादी है. देश में जाति आधारित जनगणना तो नहीं होती लेकिन एक अनुमान के आधार पर कर्नाटक में 17 फ़ीसदी लिंगायत हैं और 15 फ़ीसदी वोक्कालिगा आबादी है.

लिंगायत और वोक्कालिगा का ख़ासी राजनीतिक पैठ है. राज्य के कई मुख्यमंत्री इन्हीं दो समुदायों में से आए हैं. कर्नाटक से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे एकमात्र व्यक्ति एचडी देवेगौड़ा भी वोक्कालिगा समुदाय से आते हैं.

ऐसे में ना सिर्फ़ मुसलमानों से आरक्षण वापस लिया जाना बल्कि उसे लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों के बीच बाँटने को राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है.

प्रोफ़ेसर असादी का कहना है कि इन सब में नुकसान मुस्लिम नौजवानों का हो रहा है.

असदी कहते हैं, "मैं खुद यूनिवर्सिटी में पढ़ाता हूं, अब तक मेरे यहां हर क्लास में कम से कम दो छात्र मुस्लिम होते हैं लेकिन आने वाले समय में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व घट जाएगा."

"पिछड़े मुसलमानों को अब कोई फ़ायदा नहीं मिलेगा. अब उन्हें इडब्लूएस (आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग) कोटा के तहत 10 फ़ीसदी आरक्षण के लिए लड़ना होगा. एक मुसलमान मुहल्ले से निकलकर कॉलेज आए किसी नौजवान और बढ़िया स्कूल से पढ़कर आए युवाओं के बीच प्रतिस्पर्द्धा करवाना ग़लत है. आने वाले वक्त में ज़ाहिर तौर पर सरकारी नौकरी और कॉलेज में मुस्लिम नौजवानों की भागीदारी प्रभावित होगी."

कर्नाटक के बाद अब तेलंगाना

अब कर्नाटक की ही तरह बीजेपी तेलंगाना में भी मुसलमानों के मिलने वाले आरक्षण को ख़त्म करने की बात कर रही है.

बीजेपी पहले से ही तेलंगाना में मुस्लिमों को मिलने वाले आरक्षण के ख़िलाफ़ रही है. साल 2017 में तेलंगाना की टीआरएस सरकार ने मुसलमानों के लिए 4 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था.

उस समय बीजेपी ने इसका विरोध किया था.

लेकिन पिछले साल राज्य सरकार ने ये आरक्षण 4 फ़ीसदी से घटाकर 3 फ़ीसदी कर दिया.

मुसलमानों को तेलंगाना में जो आरक्षण दिया गया है वह आईएएस अधिकारी जी सुधीर की अध्यक्षता में बनाए गए आयोग की सलाह पर दिया गया था.

इस आयोग ने तेलंगाना में मुसलमानों को समाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण देने का सुझाव दिया था.

क्या सरकारें ऐसे आरक्षण हटा सकती हैं?

क्या बीजेपी का सत्ता में आने पर आरक्षण ख़त्म करने का एलान नियमों के अनुकूल है?

के. श्रीनिवासुलु हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे हैं.

उनका कहना है, "कोई भी सरकार ना ही अपने मन से आरक्षण देती है और ना ही उसे वापस ले सकती है. तमाम समुदायों का अध्ययन करने के लिए एक आयोग बनाया जाता है, ये आयोग उनके सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन का अध्ययन करके सुझाव देता है कि किस समुदाय को आरक्षण मिलना चाहिए और कितना मिलना चाहिए."

"ठीक उसी तरह आयोग ही तथ्यों के आधार पर सुझाव देते हैं कि किस जाति या समुदाय को ओबीसी, एससी, एसटी लिस्ट से हटाना चाहिए. बीजेपी की सरकार ने किसी आयोग के सुझाव पर कर्नाटक में मुसलमानों से आरक्षण नहीं छीना बल्कि खुद ही तय कर लिया. ऐसे में इसे जिस तरह से इसे हटाया गया उसकी कानूनी वैधता भी संदेह में है."

तेलंगाना में नवंबर में विधानसभा चुनाव होंगे. क्या बीजेपी को मुसलमान आरक्षण का मुद्दा उठाने का लाभ मिलेगा?

क्या बीजेपी का होगा फ़ायदा?

प्रोफ़ेसर श्रीनिवासुलु कहते हैं कि कर्नाटक और तेलंगाना बहुत अलग राज्य हैं क्योंकि तेलंगाना में बीजेपी कोई फ़ोर्स नहीं रही है और ना ही भविष्य में ऐसा होता दिख रहा है.

वे कहते हैं, "वो हिंदू-मुस्लिम करके बांटने के लिए ये बात कर रहे होंगे लेकिन इससे यहां कोई खास फ़र्क नहीं पड़ेगा. यहां कांग्रेस और बीआरएस की ही लड़ाई है."

जानकार मानते हैं कि कर्नाटक में सांप्रदायिकता का लंबा इतिहास रहा है. वहां बीजेपी के लिए हिंदुत्व की राजनीति करना आसान है.

मैसूर यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर असादी कहते हैं, "ये बात ध्यान रखने वाली है कि कर्नाटक से इतर तेलंगाना में प्रभावशाली जाति ओबीसी नहीं सामान्य कोटे में आती हैं ऐसे में वहां इससे बीजेपी को बड़ा फ़ायदा नहीं होगा. साथ ही तेलंगाना में मुस्लिम समुदाय का वोट काफ़ी मायने रखता है और ये कर्नाटक की तरह 'साइलेंट कम्युनिटी' नहीं है. हिजाब से लेकर आरक्षण ख़त्म होने तक कर्नाटक में मुसलमानों में बड़ा विरोध नहीं दिखा है."

हालांकि प्रोफ़ेसर असादी ये मानते हैं कि अगर बीजेपी सरकार ने कर्नाटक में मुसलमानों का आरक्षण वापस लिया है तो आने वाली सरकारों के लिए उन्हें दोबारा आरक्षण दे पाना मुश्किल होगा.

क्योंकि जो दो फ़ीसदी आरक्षण लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों को दिया गया है उसे वापस लेने की हिम्मत कोई राजनीतिक पार्टी नहीं कर पाएगी.

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