कर्नाटक चुनाव: बीजेपी के लिए क्यों ज़रूरी हैं येदियुरप्पा?

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

तीन हफ़्ते पहले कर्नाटक के भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता बीएस येदियुरप्पा के आवास के सामने के इस नज़ारे की कल्पना करें. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अपनी कार से बाहर निकलते हैं, येदियुरप्पा के बेटे बीवाई विजेंद्र की तरफ़ देखते हैं.

अमित शाह बीएस से येदियुरप्पा से गुलदस्ता लेने के बजाए उनके बेटे से गुलदस्ता लेने की बात कहते हैं.

इसके बाद भी येदियुरप्पा के चेहरे पर एक हैरानी थी क्योंकि पहली बार नाश्ते पर आए अमित शाह ने घर के भीतर जाने से पहले उनके बेटे विजेंद्र को गले से लगा लेते हैं. इस नज़ारे से राजनीतिक पकड़ रखने वाले लोगों के लिए कई मायने सामने आए.

कर्नाटक में विधानसभा चुनाव 10 मई को होने हैं और चुनाव के नतीजे 13 मई को आने हैं.

'येदियुरप्पा के लिए अपनी मौलिक नीति के ख़िलाफ़ बीजेपी'

बीजेपी के मार्गदर्शक मंडल के खांचे में फिट होने बाद 26 जुलाई 2021 को येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटा दिया गया, लेकिन फिर अचानक 80 साल की उम्र में वो पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व में सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए.

उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़े की घोषणा करने के लिए मज़बूर करने के बाद से पार्टी से दूर कर दिया गया था. इसके बाद उनके बेटे बीवाई विजेंद्र के लिए विधानसभा चुनाव उम्मीदवार बनने के प्रयासों पर पानी फिर चुका था.

राजनीतिक विश्लेषक और भोपाल के जागरण लेकसाइड यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ. संदीप शास्त्री बीबीसी हिंदी से कहते हैं, "तथ्य यह है कि विधानसभा चुनाव के लिए विजेंद्र को अब येदियुरप्पा के निर्वाचन क्षेत्र शिकारीपुरा से नामित किया गया है, जो बीजेपी की उस मौलिक नीति के ख़िलाफ़ है जिसके बारे में पार्टी की नेतृत्व बात करती रही है कि किसी नेता के बेटे-बेटियों को किसी पद के लिए नामांकित नहीं किया जाएगा. इससे पता चलता है कि वह (येदियुरप्पा) पार्टी के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं."

लगभग एक महीने पहले 27 फ़रवरी को येदियुरप्पा के जन्मदिन के मौक़े पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्व मुख्यमंत्री के गृह ज़िले शिवमोगा में हवाई अड्डे का उद्घाटन किया. वहां उन्होंने सार्वजनिक जीवन में येदियुरप्पा के योगदान को प्रेरणादायक बताते हुए उनकी तारीफ की थी.

सभी ने इसे सामान्य टिप्पणी माना जो नरेंद्र मोदी येदियुरप्पा सरीखे वरिष्ठ नेता के लिए करते हैं. लेकिन सबसे सीधा संदेश येदियुरप्पा के घर अमित शाह के दौरे से आया.

क्यों ख़ास हैं येदियुरप्पा ?

बीजेपी के लिए बीएस येदियुरप्पा के इतना ख़ास होने की कई वजहें हैं. 2008 में पार्टी को सत्ता में लाने के लिए उन्होंने अकेले अपने दम पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

लेकिन येदियुरप्पा को खुश करने के लिए पार्टी के पीछे हटने की वजह को डॉ संदीप शास्त्री दूसरी तरह से देखते हैं.

वो कहते हैं, "पार्टी को इस बात का अहसास है कि उनके पास कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो समूहों में प्रचार कर सके, तो वह येदियुरप्पा हैं."

इसका मतलब यह है कि वह न केवल लिंगायतों के अलग-अलग संप्रदायों के लिए प्रचार कर सकते हैं, बल्कि बाकी समुदायों के बीच भी उनकी अपील है.

बीजेपी के एक नेता ने नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "केंद्रीय नेतृत्व के पास उन्हें खुश रखने की और भी वजहें हैं. हमारे लोगों ने महसूस किया कि पारंपरिक लिंगायत वोट येदियुरप्पा के नेतृत्व के बग़ैर कांग्रेस का रुख़ कर सकते हैं."

बेलगावी के रानी चेन्नम्मा विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान की प्रोफे़सर कमलाक्षी एस तदासद ने कहा, "येदियुरप्पा ने सालों में एक करिश्मा हासिल किया है. लोग उन्हें लिंगायत ब्रांड की तरह देखते हैं."

सभी टिप्पणीकार राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व द्वारा मंज़ूर उम्मीदवारों की लिस्ट का उदाहरण देते हैं.

डॉ संदीप शास्त्री कहते हैं, "जिस तरीक़े से बीजेपी ने उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के लिए टिकट बांटे हैं उससे सीधा संकेत मिलता है कि येदियुरप्पा जो चाहते थे, उसे मान लिया गया. जिसमें सबसे अहम उनके बेटे का शिकारीपुरा से नामांकन है."

येदियुरप्पा के बड़े बेटे बीवाई राघवेंद्र पहले से ही शिवमोगा से सांसद हैं. भाजपा की दावा करने की प्रवृत्ति को देखते हुए कि वह 'वंशवादी' शासन में विश्वास नहीं करती है, येदियुरप्पा और उनके समर्थकों को यह रियायत काफ़ी कुछ अर्थ तय करता है.

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा में बीजेपी ने 212 उम्मीदवारों में परिवारवाद से जुड़े 23 सदस्यों को टिकट दिया है.

येदियुरप्पा को खुश रखने की रणनीति

डॉ संदीप शास्त्री कहते हैं, यह स्पष्ट था कि पार्टी के लिए येदियुरप्पा को खुश करने और अपने पक्ष में रखने की ज़रूरत थी.

येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद संसदीय बोर्ड और पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति दोनों का सदस्य बनाया गया. पार्टी के सदस्यों का कहना है कि उनसे उम्मीदवारों की तीन सूचियां ली गई थीं.

कहा जाता है कि पहली लिस्ट जारी होने के बाद येदियुरप्पा ने बीजेपी नेतृत्व को अपनी लिस्ट सौंपी और दिल्ली से बेंगलुरु लौट आए. इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व को यह अहसास हुआ कि उनकी लिस्ट और एक सर्वे पर आधारित केंद्रीय कार्यालय की लिस्ट भी लगभग जैसी थी.

कहा जा रहा है कि येदियुरप्पा ने केंद्रीय नेताओं से कहा था कि बैठक में पेश की गई लिस्ट के साथ प्रचार करना मुश्किल होगा. इस तरह, पार्टी ने 'पहले से आजमाए सदस्यों' के साथ चुनाव में आगे बढ़ने का फै़सला किया.

189 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में पार्टी ने 51 लिंगायत, 41 वोक्कालिगा, 32 ओबीसी, 30 एससी और 16 एसटी उम्मीदवारों को चुना था.

कुछ समय से बीजेपी के नेता पार्टी के अंदर प्रयासों के बारे में बात कर रहे हैं. उनका कहना है कि "केवल एक समुदाय (लिंगायत) के समर्थन आधार पर निर्भर न रहें और पार्टी के लिए अन्य समुदायों को जीतना भी ज़रूरी है, क्योंकि राज्य में नरेंद्र मोदी के लगातार दौरे की वजह से मोदी का जादुई वोट आराम से हासिल किया जा सकता है."

नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ नेता ने कहा, "कहीं न कहीं चूक हो गई, उनके(येदियुरप्पा) हस्तक्षेप के बाद इसे ठीक कर लिया गया है."

येदियुरप्पा का प्रमुख राजनीतिक योगदान

2008 के विधानसभा चुनाव में लिंगायतों और उत्तर कर्नाटक में अनुसूचित जातियों के बीच वाम संप्रदाय या मडिगाओं के बीच एक सामाजिक गठबंधन बनाने की प्रयास और चुनाव के लिए रणनीति बनाने में येदियुरप्पा का प्रमुख योगदान था.

कुछ ज़िलों के कई निर्वाचन क्षेत्रों को 'आरक्षित' सीट घोषित किया गया था. येदियुरप्पा ने भोविस (पत्थर काटने वाले) या अन्य 'स्पृश्य' अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को चुना.

उन्होंने उनसे (आरक्षित समुदाय) कहा कि यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि वे अपने समुदाय को पड़ोस के अनारक्षित सीटों पर संगठित करें ताकि वे पार्टी के लिंगायत उम्मीदवारों का समर्थन कर सकें.

उन्होंने उनसे यह भी कहा कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में लिंगायत उनके समुदाय को वोट देंगे. यह वह तरीका है जिससे पहली बार 2008 में कांग्रेस आरक्षित निर्वाचन इलाकों में बहुमत नहीं जीत पाई थी.

देश के बाकी राज्यों में अपने आधार के विस्तार के लिए इस तरह के गठबंधन बनाने के लिए बीजेपी ने इस फॉर्मूले को चुना था.

डॉ कमलक्षी ने कहा, "येदियुरप्पा की लिस्ट की स्वीकृति ने मोटे तौर पर उत्तर प्रदेश की तरह मठों के लिए 50 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने के फार्मूले को बाधित कर दिया."

2008 के चुनाव के बाद बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई जिसके बाद येदियुरप्पा मुख्यमंत्री बने थे. पार्टी के पास सिर्फ 110 सीटें थीं. साधारण बहुमत हासिल करने के लिए बीजेपी को तीन और सीटों की ज़रूरत थी. इसके बाद ही ऑपरेशन कमल लॉन्च किया गया था.

इसका मतलब था कि कांग्रेस और जनता दल सेक्युलर के सदस्य विधानसभा की अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा दे देंगे और बाद में भाजपा के उम्मीदवार के रूप में चुने जाएंगे. जब बीजेपी को बहुमत हासिल हो गया तब येदियुरप्पा विकास के काम लागू करने के लिए ज़िलों में गए.

येदियुरप्पा के साढ़े तीन साल के कार्यकाल में से ज़्यादातर वक्त किसी ने किसी समस्या से घिरा था. उनकी सरकार बल्लारी में अवैध खनन के मुद्दे पर लोकायुक्त की रिपोर्ट से प्रभावित नहीं हुई थी.

उनके मंत्री और खनन कारोबारी गाली जनार्दन रेड्डी पर अवैध रूप से लौह अयस्क निकालने और उसे विदेशों में निर्यात करने का आरोप लगाया गया था. इस घोटाले ने भारत की जीडीपी को दो प्रतिशत कम कर दिया और सरकार भी इसकी ज़द में आ गई.

येदियुरप्पा के ख़िलाफ़ मामले

येदियुरप्पा के पहले कार्यकाल के दौरान दो खनन कंपनियों का पक्ष लेने के लिए भूमि को गैर-अधिसूचित करने और उनके बेटों और दामाद द्वारा चलाए जाने वाले प्रेरणा ट्रस्ट के ज़रिए रिश्वत लेने के लिए लोकायुक्त ने उन्हें दोषी ठहराया. इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री के पद को छोड़ना पड़ा था.

लेकिन 2016 में सीबीआई कोर्ट ने मुक़दमे के बाद उन्हें बरी कर दिया. इस मामले में उन्हें 23 दिन जेल में बिताने पड़े थे, क्योंकि उनकी जमानत अर्जी खारिज़ कर दी गई थी. इसी मामला की वजह से उन्हें इस्तीफ़ा देकर सदानंद गौड़ा को प्रभार सौंपना पड़ा था.

ज़मीन को गैर-अधिसूचित करने और औद्योगिक उद्देश्यों के लिए ज़मीन के आवंटन को रद्द करने के तीन मामले हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है. उनकी क़ानूनी टीम के मुताबिक़ इनमें से किसी भी मामले की जांच तक नहीं की गई है.

अतिरिक्त ज़िम्मेदारी

पहली लिस्ट की घोषणा के बाद के कुछ घंटों के बाद ही कई असंतुष्ट उम्मीदवारों ने विरोध किया. पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने हस्तक्षेप करने और मुद्दों को हल करने के लिए फिर से येदियुरप्पा की ओर रुख़ किया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बग़ावत की वजह से पार्टी को नुक़सान न पहुंचे.

हुबली सेंट्रल सीट से टिकट न मिलने के बाद पार्टी से नाखुश पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार दिल्ली से बेंगलुरु लौटे और उन्होंने येदियुरप्पा से मुलाक़ात की थी.

उन्होंने संवाददाताओं से कहा, "उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व से कहा है कि मुझे फिर से विधानसभा के लिए नामित किया जाए."

प्रोफ़ेसर चंबी पुरानिक के मुताबिक़, "इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह कर्नाटक में पार्टी के लिए सौभाग्यशाली हैं. एकमात्र दोष यह है कि वह मुख्यमंत्री नहीं बनेंगे."

हालांकि येदियुरप्पा के एक समर्थक कहते हैं, "उन्हें कोई पद नहीं दिया गया है और कहा गया है कि वो विरोधियों से निपटें. उन्होंने अब तक की सभी समस्याओं का समाधान किया है."

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