कर्नाटकः समान नागरिक संहिता का वादा करने से बीजेपी को कितना फ़ायदा?

    • Author, इमरान क़ुरैशी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

कर्नाटक की बीजेपी सरकार ने वादा किया है कि अगर वो राज्य में जीत दर्ज करती है तो उत्तराखंड की तरह यहां भी यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड (यूसीसी) लागू करेगी.

कर्नाटक चौथा राज्य है जहां बीजेपी सरकार ने यूसीसी लागू करने का वादा किया है. इससे पहले गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों में बीजेपी सरकारें ऐसा वादा कर चुकी हैं.

राज्य में 10 मई को चुनाव होने वाले हैं और बेंगलुरु में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पार्टी का घोषणापत्र जारी किया जिसमें यूसीसी का वादा किया गया है.

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 ख़त्म करने का वादा पूरा करने के बाद इस मुद्दे पर आगे न बढ़ पाने पर पार्टी आलोचना की शिकार हो रही है.

बीजीपी ने तीन तलाक़ पर प्रतिबंध लगाने का राष्ट्रीय स्तर पर श्रेय लिया है, हालांकि ये सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला था, जिसकी मांग मुस्लिम महिलाओं के एक ग्रुप ने याचिका दायर कर की थी. वकील के मुताबिक़ 'ये ग़ैर इस्लामी प्रथा थी.'

ताज़ा घोषणा से कई सवाल पैदा हो गए हैं. ये सवाल इसलिए भी उठ रहा है कि बीजेपी ने कर्नाटक पर लगभग दो कार्यकाल तक यानी 2008-13 और 2019-2023 तक राज किया.

राज्य में बीजेपी के तीन मुख्यमंत्री बने, बीएस येदियुरप्पा, डीवी सदानंद गौड़ा और जगदीश शेट्टार. इस दौरान यूसीसी कोई मुद्दा नहीं था. पहली बार बासवराज बोम्मई ने नवंबर 2022 में इसका वादा किया.

बोम्मई की ये घोषणा भी तब आई जब दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यूसीसी लागू करने के लिए कमेटी गठित करने की गुजरात सरकार की योजना पर सवाल खड़े किए थे.

केजरीवाल ने पूछा था कि मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे बीजेपी शासित राज्यों की तरह ही कमेटियों का गठन क्यों नहीं हुआ. या, केंद्र सरकार ने इस मुद्दे पर क्यों कोई पक्ष नहीं लिया.

अभी तक केवल गोवा में यूसीसी लागू है. ये भी इसलिए हो पाया क्योंकि 1961 में जब गोवा आज़ाद हुआ तो वहां पुर्तगीज़ सिविल कोड लागू था.

यूसीसी असल में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, पारसी और यहूदी धर्मों के अलग-अलग क़ानूनों की जगह एक समान क़ानून लाने की बात करता है.

संविधान का अनुच्छेद 44 कहता है कि 'सरकार भारत के संपूर्ण भूभाग में नागरिकों को समान नागरिक संहिता के तहत लाने का प्रयास करेगी.'

इसका मतलब ये है कि या तो राज्य या केंद्र सरकार विवाह, तलाक़, गोद लेने और विरासत के मामले में क़ानून ला सकती है.

हालांकि बीजेपी का कहना है कि "यूसीसी एक लंबी प्रक्रिया है और बातचीत में एक लंबा समय लगेगा क्योंकि यहां छोटे से छोटे समुदाय की भी अलग-अलग परम्पराएं हैं."

इसके पीछे कोई मंशा है?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक शरत प्रधान कहते हैं, "अगर वे इस समय यूसीसी का मुद्दा उठा रहे हैं तो इसका मतलब है कि वे कर्नाटक विधानसभा चुनाव में घबराए हुए हैं. ये समझना चाहिए कि ये बीजेपी का तुरूप का पत्ता है जो वो अपने पास रखे हुए हैं और ये तभी निकालेंगे जब कोई संकट की घड़ी होगी."

वो कहते हैं, "बीजेपी ने अचानक ही हिजाब, अज़ान और टीपू सुल्तान के मुद्दे को छोड़ दिया क्योंकि कर्नाटक जैसे राज्य में, जोकि उत्तर प्रदेश से बिल्कुल अलग है, इसने ज़रूरत से ज़्यादा ध्रुवीकरण पैदा कर दिया था."

"अलग-अलग राज्यों में ध्रुवीकरण के लिए पार्टी के पास अलग-अलग रणनीति है. ये साफ़ है कि कर्नाटक में अनुच्छेद 370 मुद्दा नहीं बन सकता. ना ही राम मंदिर निर्माण ही यहां वोट दिला सकता है."

प्रधान ने कहा, "वे सिर्फ़ फुलझड़ी छोड़ रहे हैं क्योंकि चुनाव में वे अपनी हार को देख रहे हैं."

तनवीर फ़ज़ल जैसे अकादमिक, जोकि हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं, इस बात से सहमत हैं कि यूसीसी का क़ानून लागू करना टेढ़ी खीर है. ये ऐसा मुद्दा नहीं है जो सिर्फ़ मुस्लिमों के बारे में है, बल्कि ये हिंदुओं, इसाईयों और पारसियों के बारे में भी है.

उन्होंने कहा, "यहां तक कि जनजातीय समुदाय भी अपनी अलग परम्पराएं मानते हैं. यूसीसी लागू करना विनाशकारी होगा. वे ये बात जानते हैं. इसीलिए उन्होंने इसे चुनाव के ठीक पहले उछाला है."

प्रोफ़ेसर फ़ज़ल कर्नाटक में हाल ही में आरक्षण नीति में लाए गए बदलाव से इस मुद्दे की तुलना करते हैं. कर्नाटक सरकार ने ओबीसी के तहत मुस्लिम आरक्षण को ख़त्म कर दिया था.

ओबीसी के तहत चार प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण ख़त्म करके वोक्कालिगा और लिंगायत समुदाय को 2-2 प्रतिशत दे दिया गया.

प्रोफ़ेसर फ़ज़ल कहते हैं, "बुनियादी तौर पर, आरक्षण मुद्दे की तरह ही, ये ध्रुवीकरण पैदा करने की चाल है. आरक्षण मुद्दे को चुनाव से पहले बाक़ायदा सर्वे कराकर वे फ़ैसला ले सकते थे."

उनके मुताबिक़, "कोई भी आरक्षण व्यवहारिक आंकड़ों और विधिवत सर्वे के आधार पर होना चाहिए, यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट को भी इस प्रक्रिया के ख़िलाफ़ कुछ कहना पड़ा."

वो कहते हैं, "सच कहें तो ये एक चुनावी रणनीति है. वाद विवाद और जुमलेबाज़ी के अलावा इस मामले में और कुछ नहीं है."

क़ानूनी नज़रिया

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट वरीशा फ़रासत का मानना है कि सरकार यूसीसी को लेकर गंभीर नहीं है.

उनका तर्क है कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के सामने कह चुकी है कि, "अगर समलैंगिक विवाह की इजाज़त दी जाती है तो इससे विभिन्न धर्मों के पर्सनल लॉ का उल्लंघन होगा."

वो कहती हैं, "अगर सरकार एक समान क़ानून को लेकर गंभीर है तो समलैंगिक विवाह यूसीसी का हिस्सा क्यों नहीं है. एक महिला के तौर पर मुझे लगता है कि क़ानून में जो भी पिछड़ी बाते हैं उन्हें जाना चाहिए."

प्रगतिशील लगने वाले क़ानूनों को लाने के पीछे केंद्र सरकार की मंशा पर वो सवाल खड़ा करती हैं.

उन्होंने बीबीसी से कहा, "सरकार की मंशा सबसे बड़ी समस्या है. वो मुसलमानों की निंदा करने के लिए यूसीसी का इस्तेमाल जारी रखना चाहती है. उसका एकमात्र यही एजेंडा है. लंबे समय से यूसीसी उसका एक पसंदीदा हथियार रहा है. इसीलिए वे हर चुनाव से पहले ये मुद्दा लाते रहते हैं. वे ध्रुवीकरण के लिए इस मुद्दे को ज़िंदा रखना चाहते हैं."

फ़रासत ने आगे कहा, "बीजेपी की दिलचस्पी न तो मुस्लिम समुदाय में है और ना ही मुस्लिम महिलाओं में. ये उनके अपने वोटरों के लिए एक झुनझुना है. अगर वे इतना ही गंभीर हैं तो यूसीसी का मसौदा दिखा दें. केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी का कई राज्यों में शासन है. इसके राजनीतिकरण की क्या ज़रूरत है? मुझे पक्का विश्वास है कि वे कभी यूसीसी का मसौदा नहीं पेश करेंगे."

बीजेपी का नज़रिया

कर्नाटक में बीजेपी प्रवक्ता एमजी महेश ध्रुवीकरण के आरोपों को ख़ारिज करते हैं.

वो कहते हैं, "क्या आपको लगता है कि उदाहरण के लिए मांड्या के लोग इसलिए बीजेपी को वोट करेंगे क्योंकि हमने अपने घोषणापत्र में एक नीतिगत फ़ैसले का ज़िक्र किया है? किसी भी तरह से यूसीसी मुसलमानों या किसी अन्य समुदाय के ख़िलाफ़ नहीं है."

उन्होंने बीबीसी हिंदी से कहा, "सभी पक्षों को सहमति तक लाने की यह एक लंबी प्रक्रिया है. हम एक कमेटी गठित करने की योजना बना रहे हैं जो इससे जुड़े सारे मुद्दों पर ग़ौर करेगी. सोलिगा समुदाय का ही उदाहरण लीजिए. उनके यहां बच्चों की शादी 9 या 10 साल की उम्र में ही हो जाती है. ऐसे ही अन्य समुदाय हैं. पूरी प्रक्रिया में समय लगेगा. यहां तक कि मुसलमानों और इसाईयों में भी अलग-अलग समूह हैं जो अलग-अलग परम्पराओं का पालन करते हैं."

समलैंगिक विवाह के मामले में यूसीसी पर नीतिगत निर्णय से उलट बीजेपी के पक्ष पर महेश ने कहा, "हम क़ुदरत के ख़िलाफ़ नहीं हैं. यह भारतीय परम्पराओं का सवाल है. हम इस मुद्दे पर सही दिशा में जा रहे हैं."

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