बिलकिस बानो केस पर केंद्र और गुजरात सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में लिया यू टर्न- प्रेस रिव्यू

बिलकिस बानो

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केंद्र और गुजरात सरकार ने बिलकिस बानो गैंगरेप मामले में सुप्रीम कोर्ट में यू टर्न लेते हुए कहा है कि 11 दोषियों को किस आधार पर रिहा किया गया इसके असली दस्तावेज़ वह कोर्ट के सामने पेश करेगी.

अंग्रेज़ी अख़बार द टाइम्स ऑफ़ इंडिया में इस ख़बर को प्रमुखता के साथ छापा गया है.

अख़बार लिखता है कि सुप्रीम कोर्ट में अपने पुराने बयान से पलटते हुए अब केंद्र और राज्य सरकार कोर्ट के सामने वो दस्तावेज़ पेश करेगी जिसके आधार पर बिलकिस बानो के रेप के दोषियों और उनके परिवार के सात लोगों की हत्या करने वालों को रिहा करने का फ़ैसला लिया गया ताकि कोर्ट इस मामले की सुनवाई आगे बढ़ा सके.

इससे पहले जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से कोर्ट में इस मामले की फ़ाइल पेश करने को कहा था तो 18 अप्रैल को सरकार ने जवाब दिया था कि विशेषाधिकार के चलते वो इस मामले की फ़ाइल कोर्ट के सामने पेश नहीं करना चाहती और सरकार के फ़ैसले को चुनौती देने वाली बिलकिस बानो की इस याचिका पर सुनवाई स्थगित की जाए.

इस मामले की सुनवाई आगे नहीं बढ़ सकी है क्योंकि इसके एक दोषी को कोर्ट का नोटिस नहीं मिला है और बाकी दोषियों ने सुनवाई को टालने की अपील की है. इस केस में 27 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस जारी किया था.

इस मामले में दोषियों के वकीलों ने कोर्ट से अपील की है कि मामले पर सुनवाई निर्धारित समय से पहले ना की जाए. जबकि बिलकिस बानो की पैरवी कर रही वकील शोभा गुप्ता ने कोर्ट में दलील दी थी कि इस मामले में बिलकिस बानो के साथ 'घोर अन्याय' हुआ है और जल्द से जल्द सुनवाई करके कोर्ट इस अन्याय को ख़त्म करे.

वहीं दोषियों के वकील का कहना है कि जब तक सभी पार्टियों को नोटिस नहीं दिया मिल जाता अदालत प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ा सकती.

बीते साल अगस्त में बिलकिस बानो गैंगरेप मामले के 11 दोषियों को गुजरात सरकार की कमेटी ने गोधरा जेल से रिहा कर दिया था.

27 फ़रवरी 2002 को गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान भीड़ ने बिलकिस बानो और उनके परिवार पर तब हमला किया था जब वो भाग रहे थे. उन्होंने बिलकिस का गैंगरेप किया और उनकी तीन साल की बेटी समेत परिवार के 14 लोगों की हत्या कर दी थी.

अजित पवार

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शरद पवार के बाद किसके हाथ में होगी एनसीपी की कमान

अंग्रेजी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी यानी एनसीपी में हो रहे राजनीतिक बदलाव को पहले पन्ने पर जगह दी है.

मंगलवार को एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने अपने पद से इस्तीफ़ा देने का एलान किया और उनके इस एलान के बाद ही एनसीपी के बाकी नेता मंच पर ही उन्हें मनाने में जुट गए कि वह अपना फ़ैसला वापस लें.

अब शरद पवार ने अपने फ़ैसले पर दोबोरा विचार करने के लिए कुछ वक़्त मांगा है.

अख़बार लिखता है कि जब शरद पवार ने अध्यक्ष पद छोड़ने का एलान किया तो पूरी एनसीपी उन्हें मनाने में जुट गई कि वो ऐसा ना करें. कई नेता भावुक हो गए लेकिन इन सबके बीच जो शख़्स सबसे संयमित अंदाज़ में नज़र आ रहा था वो थे अजित पवार. अजित पवार इस पूरे प्रकरण में 'मैन इन-चार्ज' बनकर उभरे हैं.

मुंबई के वाईबी चव्हाण सेंटर में जब एनसीपी के नेता और कार्यकर्ता इस बात पर अड़ गए थे कि वो मंच से तब तक नहीं जाएंगे जब तक शरद पवार अपना फ़ैसला वापस नहीं ले लेते तो उस वक़्त अजित पवार ने कहा, " वह (शरद पवार) नेतृत्व नए हाथों में सौंपना चाहते हैं. इस बात से फ़र्क नहीं पड़ता कि वह किस पद पर हैं, पार्टी हमेशा साहब (शरद पवार) के नेतृत्व में ही काम करेगी. जिस तरह कांग्रेस सोनिया गांधी के शब्दों पर ही चलती है फिर चाहे मल्लिकार्जुन खड़गे अध्यक्ष पद पर क्यों ना बैठे हों."

ईपीएफ़ओ

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सरकार ने बढ़ाई अधिक ईपीएफ़ पेंशन चुनने की तारीख़

अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू में छपी ख़बर के मुताबिक़, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफ़ओ ने कर्मचारी पेंशन योजना के तहत ज़्यादा पेंशन लेने के विकल्प को चुनने की समयावधि बढ़ा दी है. पहले इसकी डेडलाइन आज यानी 03 मई को समाप्त हो रही थी, लेकिन अब इसे बढ़ा कर 6 जून, 2023 कर दिया गया है.

ये उनके लिए है जो ज़्यादा पेंशन योजना वाली स्कीम को चुनना चाहते हैं, अब ऐसे अंशदाताओं को ये विकल्प चुनने के लिए और समय मिल गया है.

ईपीएफ़ओ ने कहा कि अब तक 12 लाख से अधिक आवेदन मिले हैं.

ईपीएफ़ओ ने इस पर बयान जारी कर कहा है, "ऑनलाइन सुविधा केवल 3 मई, 2023 तक उपलब्ध थी. इस बीच, समय बढ़ाने के लिए कई आवेदन प्राप्त हुए. इस मुद्दे पर विचार किया गया है और यह निर्णय लिया गया है कि लोगों को विकल्प चुनने के लिए और वक़्त दिया जाना चाहिए. ऐसे में अब आवेदन दाख़िल करने की समय सीमा 26 जून, 2023 तक होगी."

तिहाड़ जेल

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दिल्ली की जेल सुरक्षा पर उठते सवाल

बीते दिनों दिल्ली की तिहाड़ जेल में सज़ा काट रहे गैंगस्टर सुनील बालियान उर्फ़ टिल्लू तेजपुरिया की हत्या के बाद एक बार फ़िर दिल्ली की जेलें कितनी असुरक्षित हैं, इसे लेकर चर्चा तेज़ हो गई है.

हिंदुस्तान टाइम्स ने इसे लेकर एक रिपोर्ट छापी जिसमें लिखा है कि दिल्ली की अलग-अलग जेलों में 25 बड़े अपराधी सज़ा काट रहे हैं. इन जेलों की क्षमता 10,000 है, लेकिन इनमें 20,000 क़ैदी रखे गए हैं. इसलिए यहां सुरक्षाकर्मियों के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करना मुश्किल होता जा रहा है.

अख़बार की रिपोर्ट के मुताबिक़, 'देश की सबसे बड़ी जेल तिहाड़ गैंगवार के लिए जानी जाती है. यहां सुरक्षा में ढिलाई का फ़ायदा उठा कर दो गैंग आपस में लड़ते हैं और हिंसा होती है. ये सब कुछ अब आम-सी बात लगती है. जब बीते साल दिल्ली की रोहिणी अदालत में टिल्लू तेजपुरिया के कहने पर जितेंद्र गोगी की हत्या हुई तो जांचकर्ताओं ने बताया कि तेजपुरिया जेल में होते हुए भी हत्या का लाइव अपडेट फ़ोन पर लेता रहा था.'

अख़बार के मुताबिक़, अब जेल की इस ढीली सुरक्षा व्यवस्था का फ़ायदा उठाते हुए गोगी गैंग ने टिल्लू तेजपुरिया की हत्या कर दी है. ऐसे में लगता है कि तिहाड़ अब हिंसा का अड्डा बन चुका है.

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