गुजरात दंगों के दौरान नरोदा गाँव में आख़िर हुआ क्या था?

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अहमदाबाद की एक विशेष अदालत ने गुरुवार को 2002 में नरोदा गाँव नरसंहार के मामले में अभियुक्त बनाए गए 68 लोगों को बरी कर दिया है.
इनके ख़िलाफ़ दंगा भड़काने, अवैध ढंग से भीड़ जुटाने और आपराधिक साज़िश रचने जैसे आरोप लगाए गए थे.
इन अभियुक्तों में सबसे बड़ा नाम पूर्व मंत्री और बीजेपी नेता माया कोडनानी का है, जिन्हें नरोदा पाटिया दंगे में भी दोषी ठहराया गया था.
इस मामले में कुल 86 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था, जिनमें से 17 लोगों की मौत हो चुकी है.
नरोदा गाँव का मामला उन नौ मामलों में से एक है जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने विशेष जांच दल (एसआईटी) को जांच का आदेश दिया था.
इस केस की सुनवाई 14 साल पहले जुलाई 2009 में शुरू हुई थी और ये इस मामले में पहला फ़ैसला है.

नरोदा गाँव में क्या हुआ था?
अहमदाबाद शहर के नरोदा गाँव में 28 फ़रवरी की सुबह जो कुछ हुआ, उसकी शुरुआत कुछ घंटे पहले गोधरा रेलवे स्टेशन पर खड़ी साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाए जाने से हुई थी.
25 फ़रवरी, 2002 के दिन उत्तर प्रदेश के अयोध्या ज़िले से साबरमती एक्सप्रेस अहमदाबाद पहुँचने के लिए निकली थी. इस ट्रेन में 2000 से ज़्यादा कारसेवक सवार थे.
27 फ़रवरी, 2002 के दिन ये ट्रेन चार घंटे की देरी से गोधरा स्टेशन पहुँची.
जाँच रिपोर्ट्स के मुताबिक़, जब ये ट्रेन गोधरा स्टेशन से रवाना हुई तो आपातकालीन चेन खींचकर ट्रेन रोक दी गई और अचानक से जमा हुई भीड़ ने ट्रेन पर पत्थर फेंके और कुछ कोचों में आग लगा दी.
इसके बाद गुजरात के अलग-अलग इलाक़ों में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी.
इसमें सबसे ज़्यादा हिंसा अहमदाबाद शहर के नरोदा गाँव में हुई, जहाँ 11 मुसलमानों को ज़िंदा जला दिया गया.
कुछ ख़बरों के मुताबिक़, एक संकरी गली में सैकड़ों लोगों ने घुसकर संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया और लोगों को ज़िंदा जला दिया.
इस मामले में अदालत का फ़ैसला आने से पहले सरकारी वकील गौरांग व्यास ने बीबीसी से बात करते हुए बताया था, 'इन अभियुक्तों ने अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थल को नुक़सान पहुँचाया, लूटपाट की और उनकी दुकानों में आग लगा दी.'

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नरोदा पाटिया में क्या हुआ था?
नरोदा गाँव से सिर्फ़ तीन किलोमीटर दूर नरोदा पाटिया इलाके में हुए दंगों के मामले में भी माया कोडनानी और बाबू बजरंगी को दोषी ठहराया गया था. इन दंगों में 97 लोगों की जान गयी थी.
इस हिंसा के गवाह रहे एक स्थानीय पुलिसकर्मी प्रदीप सिंह बाघेला ने बीबीसी हिंदी के साथ अपना अनुभव साझा करते हुए बताया था कि उन्होंने नरोदा पाटिया में जो कुछ देखा, उसे वे आज भी नहीं भूल पाए हैं.
बीबीसी गुजराती संवाददाता भार्गव पारिख के साथ बातचीत में बाघेला कहते हैं -

मुझे आज भी वो दिन याद है, मेरी ड्यूटी नरोदा पाटिया के पास थी. उस दिन सुबह वहाँ शांति थी और गुजरात बंद का एलान किया गया था. हज़ारों लोगों की भीड़ दुकाने बंद करा रही थी. यूँ तो सब कुछ शांत था, लेकिन भीड़ धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी.
पाँच हज़ार से ज़्यादा लोग सड़कों पर उतर आए थे, लेकिन अभी दंगे शुरू नहीं हुए थे.
सड़कों पर नारेबाज़ी हो रही थी और भीड़ धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी.
ग्यारह बजे से लेकर डेढ़ बजे के बीच एक मुस्लिम शख़्स टाटा 407 लेकर इस इलाक़े से निकला. उस वक़्त मैं वहीं खड़ा था.
तभी भीड़ ने इस शख़्स की गाड़ी रोकने की कोशिश की, तो इस शख़्स ने भीड़ पर गाड़ी चढ़ा दी, जिसमें एक व्यक्ति गाड़ी के नीचे दब गया और हालात ख़राब हो गए.
दोनों पक्षों के बीच पत्थरबाज़ी शुरू हो गई. इस मौक़े पर लोगों को संभालने के लिए पुलिसकर्मी काफ़ी कम थे.
पुलिस ने भीड़ काबू करने के लिए आंसू गैस के गोले और फ़ायरिंग भी की.

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तभी वहाँ ये बात फैल गई कि एक लड़के के हाथ-पैर काटकर उसे ठेले पर डालकर सड़क पर छोड़ दिया गया है. इससे तनाव काफ़ी बढ़ गया.
मकान और दुकान आग की लपटों में जल रहे थे. सभी पुलिस अधिकारी वहाँ मौजूद थे. मुझे एक आपा का फोन आ रहा था कि वहाँ कई लोग फँसे हुए हैं.
आपा ने कहा कि मुझे बचाओ. मैं और अन्य पुलिस अधिकारी लाचार थे क्योंकि हम बाहर का ही दंगा काबू करने की कोशिश में लगे हुए थे.
शाम को छह बजे के बाद हम नरोदा पाटिया की गलियों में घुसे, जहाँ जली हुई लाशें पड़ी थीं. लाशें उठाने के लिए कोई नहीं था.
मैंने और मेरे साथियों ने कई लाशों को एंबुलेंस में डाला. उन लाशों के बीच आठ साल के एक लड़के का हाथ नज़र आया.
उसकी कमीज़ पूरी तरह जली हुई थी. मैंने उसे बाहर निकालकर पानी पिलाया. उसका आधा चेहरा जला हुआ था. मैं उसे तुरंत अस्पताल ले गया.
वहाँ छिपे लोगों को निकालते-निकालते हमें रात के एक बजे गए थे. हमने उन्हें राहत शिविर में भेज दिया.
उस रात मैं पंचनामा और लाशों की पहचान के बीच उलझा हुआ था, उस बच्चे को मैंने किसे सौंपा ये मुझे याद नहीं. उसका नाम यूनुस या यासीन था.


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कौन हैं माया कोडनानी?
बीजेपी नेता और नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री रहीं माया कोडनानी और बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी को नरोदा पाटिया मामले में दोषी ठहराया गया था.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सदस्य रहीं माया कोडनानी पेशे से गाइनकॉलजिस्ट थीं, जिनका क्लिनिक भी नरोदा इलाक़े में था.
साल 1998 में नरोदा विधानसभा का चुनाव जीतने वालीं माया कोडनानी अपने क्षेत्र और बीजेपी में काफ़ी लोकप्रिय थीं.
इसके साथ ही उन्हें नरेंद्र मोदी का भी क़रीबी नेता बताया जाता था.
लेकिन नरोदा पाटिया कांड में नाम आने के बाद उनकी राजनीतिक साख को काफ़ी धक्का लगा.
साल 2009 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट की ओर से नियुक्त विशेष जांच दल ने पूछताछ के लिए समन किया. इसके बाद उन्हें गिरफ़्तार किया गया.
माया कोडनानी के ख़िलाफ़ दंगाई भीड़ का नेतृत्व करने, दंगा भड़काने और आपराधिक साज़िश रचने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए.
साल 2012 की 29 अगस्त को एक विशेष अदालत ने कोडनानी को नरोदा पाटिया दंगों के मामले में दोषी करार दिया.
इस मामले में माया कोडनानी और बाबू बजरंगी को उम्रक़ैद की सज़ा दी गई.
कोडनानी ने विशेष अदालत के इस फ़ैसले को गुजरात हाई कोर्ट में चुनौती दी, जहाँ से उन्हें 2018 में राहत मिली.
गुजरात हाई कोर्ट ने साल 2018 में माया कोडनानी को बरी कर दिया. वहीं, बाबू बजरंगी की सज़ा को आजीवन कारावास से कम करके 21 साल कर दिया.
इस फ़ैसले के साथ ही माया कोडनानी नरोदा गाँव मामले में भी बरी हो गयी हैं.

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कौन हैं बाबू बजरंगी
माया कोडनानी की तरह बाबू राजाभाई पटेल उर्फ़ बाबू बजरंगी के ख़िलाफ़ भी हत्या, हत्या की कोशिश, आपराधिक साज़िश रचने और दंगा भड़काने जैसे आरोप लगाए गए थे.
इसके साथ ही उन्हें नरोदा पाटिया में हिंसा के लिए दोषी भी ठहराया गया था.
अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, गुजरात के पाटीदार समुदाय से आने वाले बाबू राजाभाई पटेल को बाबू बजरंगी कहे जाने की वजह उनका एक लंबे समय तक बजरंग दल से जुड़ा रहना है.
साल 2007 में एक निजी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन में वह अपने गुनाहों को स्वीकार करते नज़र आए थे.
उनके ख़िलाफ़ चले केस में भी इस स्टिंग वीडियो ने एक अहम भूमिका अदा की.
हालाँकि, 2018 में गुजरात हाई कोर्ट ने उनकी सज़ा कम करके 21 वर्ष कर दी थी.
2019 के बाद आँखों की रोशनी जाने की शिकायत करने के चलते बाबू बजरंगी ज़मानत पर रिहा हैं.
साल 2017 में पाटीदार आंदोलन के दौरान हार्दिक पटेल ने उन्हें हिंदुत्व का असली नायक करार दिया था.

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कोडनानी और बजरंगी के बरी होने पर कौन क्या बोला?
माया कोडनानी और बाबू बजरंगी समेत 68 लोगों को इस मामले में बरी किए जाने पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं आ रही हैं.
कांग्रेस पार्टी की ओर से कहा गया है, "यह साफ़ है कि अभियोजन पक्ष की ओर से अपनी भूमिका निभाने में स्पष्ट रूप से चूक हुई है."
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राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने इस मामले पर टिप्पणी करते हुए लिखा है, "नरोदा ग्राम: 12 साल की एक लड़की समेत हमारे 11 नागरिक मारे गए. 21 साल बाद 67 अभियुक्त बरी. क्या हमें क़ानून के शासन का जश्न मनाना चाहिए या इसके ख़त्म हो जाने पर निराश होना चाहिए."
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वहीं, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद से लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इस मामले में एक तंज कसा है.
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अपने ट्विटर अकाउंट पर उन्होंने लिखा है, ''जिधर से गुज़रो धुआं बिछा दो, जहाँ भी पहुँचो धमाल कर दो. तुम्हें सियासत ने ये हक़ दिया है, हरी ज़मीन को लाल कर दो. अपील भी तुम, दलील भी तुम, गवाह भी तुम वकील भी तुम. जिसे भी चाहो हराम कह दो, जिसे भी चाहो हलाल कर दो."
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