जातिगत जनगणना के मुद्दे पर 2024 में क्या एकजुट होगा विपक्ष

राहुल गांधी ने जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाया है

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    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले तीन दिनों से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं. इसे कांग्रेस पार्टी की राजनीतिक रणनीति में बदलाव के रूप में भी देखा जा सकता है.

कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने साल 2010-11 में देश की आर्थिक-सामाजिक और जातिगत गणना करवाई थी लेकिन इसके डाटा को जारी नहीं किया गया था.

अब कांग्रेस ने नेता राहुल गांधी ने कर्नाटक के कोलार की एक रैली में पिछड़ा वर्ग, दलितों और आदिवासियों के विकास के लिए तीन बिंदुओं पर आधारित एजेंडा घोषित किया और 'जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी' का नारा दिया.

राहुल गांधी ने 2011 जातिगत जनगणना के डाटा को सार्वजनिक करने और आरक्षण में 50 फ़ीसदी की सीमा को समाप्त करने की मांग भी की.

राहुल गांधी ने पिछड़ा वर्ग, दलितों और आदिवासियों को उनकी जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण देने की मांग भी की. जाति जनसंख्या आधारित आरक्षण की मांग सबसे पहले 1980 के दशक में कांशीराम ने की थी.

इसके एक दिन बाद ही 17 अप्रैल को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर जातिगत जनगणना कराने के लिए तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की.

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अपने पत्र में खड़गे ने कहा है कि जातिगत जनगणना के डाटा के वैज्ञानिक वर्गीकरण से सरकार की कल्याणकारी और सामाजिक सुरक्षा योजनाों को लागू करने में मदद मिलेगी.

इससे पहले उदयपुर में मई 2022 में हुए कांग्रेस के चिंतन शिविर में भी पार्टी नेताओं ने जातिगत जनगणना का समर्थन किया था.

हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने राहुल गांधी के जातिगत जनगणना की मांग करने के बाद उन पर हमला किया है.

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टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा के एक नेता ने जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी और यूपीए के शासन का उदाहरण देते हुए तर्क दिया है कि कांग्रेस पार्टी स्वयं जातिगत जनगणना के ख़िलाफ़ रही है.

हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने अधिकारिक तौर पर जातिगत जनगणना के मुद्दे पर कुछ स्पष्ट नहीं किया है. बीबीसी ने इस मुद्दे पर भाजपा प्रवक्ताओं से बात करने की कोशिश की लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने 20 जुलाई 2021 को लोकसभा में दिए जवाब में कहा कि फ़िलहाल केंद्र सरकार ने अनुसूचित जाति और जनजाति के अलावा किसी और जाति की गिनती का कोई आदेश नहीं दिया है. पिछली बार की तरह ही इस बार भी एससी और एसटी को ही जनगणना में शामिल किया गया है.

जातिगत जनगणना का इतिहास

दिल्ली में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के साथ राहुल गांधी

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भारत में जातिगत जनगणना के मुद्दे पर सबसे पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के कार्यकाल के दौरान साल 1951 में चर्चा की गई थी. हालांकि तब जातिगत जनगणना नहीं हुई थी.

सिर्फ़ कांग्रेस ही नहीं मंडल विचारधारा से प्रभावित देश के अन्य राजनीतिक दल भी जातिगत जनगणना की मांग को पिछले एक साल से ज़ोर-शोर से उठा रहे हैं.

बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व और जदयू, कांग्रेस और राजद के गठबंधन वाली सरकार जाति आधारित जनगणना करा भी रही है. बीजेपी ने भी बिहार में जातिगत जनगणना के प्रस्ताव का समर्थन किया है. बिहार विधानमंडल में इसके पक्ष में फ़रवरी 2019 और 2020 में भी एक प्रस्ताव पारित हुआ था. तब राज्य में बीजेपी नीतीश कुमार के साथ सरकार में शामिल थी.

वहीं उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी भी जातिगत जनगणना कराने की मांग कर रही हैं. दक्षिण भारत के कई राजनीतिक दल भी जातिगत जनगणना का समर्थन करते हैं.

साल 2024 के आम चुनावों से पहले विपक्ष अभी एकजुट नहीं हुआ है लेकिन जातिगत जनगणना के मुद्दे पर सभी अहम विपक्षी पार्टियां एक प्लेटफॉर्म पर आ गई हैं. माना जा सकता है कि जातिगत जनगणना का मुद्दा विपक्षी पार्टियों को क़रीब भी ला सकता है.

राहुल गांधी ने जातिगत आरक्षण का मुद्दा क्यों उठाया है इस सवाल का जवाब देते हुए कांग्रेस के मीडिया प्रभारी जयराम रमेश ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा है, "भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कई सिविल सोसायटी समूहों ने राहुल गांधी के सामने जातिगत जनगणना का मुद्दा रखा था. कांग्रेस उसी मांग को उठा रही है."

'एक ज़रूरी मुद्दा'

पूर्व राज्यसभा सांसद अली अनवर कहते हैं कि बीजेपी जाति की बात करती है लेकिन जातिगत जनगणना से डरती है

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जातिगत मुद्दों पर लंबे समय तक काम कर चुके और संसद में कई बार जातिगत जनगणना का मुद्दा उठा चुके वरिष्ठ पत्रकार और पूर्व राज्य सभा सदस्य अली अनवर मानते हैं कि राहुल गांधी के बयान से जातिगत जनगणना के मुद्दे को बल मिला है.

अली अनवर कहते हैं, "जातिगत जनगणना एक बहुत जरूरी मुद्दा है. भारत में धार्मिक आधार पर तो गिनती होती है. ब्रितानी शासकों ने ये नीति लागू की थी. लेकिन जातिगत आधार पर गिनती नहीं हुई है. बहुजन आबादी की गिनती होगी तो उसे हिस्सा मिलेगा. ये अच्छी बात है कि राहुल गांधी ने भी जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाया है. इससे ये मुद्दा और मज़बूत होगा."

भारतीय जनता पार्टी भी जातिगत न्याय की बात करती है और जाति के आधार पर मंत्री बनाए जाते रहे हैं. लेकिन अली अनवर भारतीय जनता पार्टी पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि अगर बीजेपी जातिगत राजनीति कर सकती है तो उसे जातिगत जनगणना का भी समर्थन करना चाहिए।

अली अनवर कहते हैं, "बीजेपी भी अब जात-पात करती है, जाति के नाम पर मुख्यमंत्री और मंत्री बनाए जाते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने नए मंत्रियों का उनके वर्ग के साथ परिचय कराया, ऐसा किसी ने भी पहले नहीं किया था. ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने आप को पिछड़ा बताते हैं, बिहार में तो उन्होंने अपने आप को अति पिछड़ा बताया था. ऐसे में ये नहीं कहा जा सकता है कि बीजेपी जाति की राजनीति नहीं करती है, अगर बीजेपी जाति की राजनीति कर सकती है तो उसे जातिगत जनगणना भी ज़रूर करानी चाहिए."

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को रोकने के लिए जातिगत जनगणना ज़रूरी

लालू प्रसाद यादव और मुलायम सिंह यादव ने 2011 की जनगणना से पहले जातिगत जनगणना की मांग की थी

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2011 में हुई जनगणना के डाटा को जारी ना किए जाने की वजह बताते हुए अली अनवर कहते हैं, "18 दिसंबर 2009 को मैंने स्वयं संसद में जातिगत जनगणना का सवाल उठाया था. हम कुछ कार्यकर्ताओं और प्रोफेसर शरद यादव से इस मुद्दे पर मिले, उन्होंने लालू यादव और मुलायम सिंह यादव से इस विषय पर बात की और बीजेपी के गोपीनाथ मुंडे ने भी इसका समर्थन किया. 2011 की जनगणना में सरकार ने गणना कराई तो लेकिन अप्रशिक्षित लोगों से ये गणना कराई गई और उसका नतीजा कुछ नहीं निकला."

वहीं भारतीय जनता पार्टी का मानना है कि कांग्रेस शासनकाल में जातिगत जनगणना के आंकड़े इसलिए जारी नहीं हुए क्योंकि पार्टी के भीतर ही इसका विरोध था. पार्टी के सूत्रों ने नाम न लेते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया से ये बात कही है.

अली अनवर कहते हैं कि देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से लड़ने के लिए भी जातिगत जनगणना ज़रूरी है. अली अनवर पसमांदा मुसलिम समाज के समन्वयक भी हैं.

अली अनवर कहते हैं, "देश में बढ़ रहे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को रोकने के लिए भी जातिगत जनगणना ज़रूरी है. जातिगत जनगणना से ये भी पता चलेगा कि सरकारी नौकरियों में किन वर्गों के लोग हैं. इसके अलावा देश में डॉक्टर, इंजीनियर जैसे पेशों में भी लोगों की जातिगत भागीदारी का पता चलेगा. देश में सामाजिक न्याय को मज़बूत करने के लिए जातिगत जनगणना ज़रूरी है."

समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता और जातिगत मुद्दों पर अकसर अपनी राय रखने वाले राजकुमार भाटी भी यही राय रखते हैं.

भाटी कहते हैं, "अगर हम सामाजिक न्याय में विश्वास रखते हैं, जो देश का संविधान भी कहता है, तो हमें ये पता होना चाहिए कि देश में किस वर्ग की कितनी संख्या है."

भाटी मानते हैं कि जातिगत जनगणना होने से सभी वर्गों को अपनी आबादी के हिसाब से आरक्षण भी मिलेगा.

भाटी कहते हैं, "1977 में जनता पार्टी की सरकार ने मंडल आयोग बनाया था, 1990 के दशक में वीपी सिंह की सरकार ने इसे लागू किया. तब कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही इसके ख़िलाफ़ थे. मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू किए जाने के ख़िलाफ़ सड़क पर आंदोलन हुआ था और सुप्रीम कोर्ट में इसे चुनौती दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट में इंदिरा साहनी केस में आरक्षण की सीमा 50 फ़ीसदी तक सीमित कर दी थी."

भाटी का तर्क है कि अगर जातिगत जनगणना होगी तो सभी वर्गों को आबादी में उनकी हिस्सेदारी के हिसाब से आरक्षण मिलेगा और इससे अन्य पिछड़ा वर्ग को फ़ायदा होगा जिनकी संख्या देश की आबादी में अधिक है.

भाटी कहते हैं, "देश की आबादी में लगभग 52 प्रतिशत हिस्सेदारी ओबीसी जातियों की है लेकिन उन्हें आबादी के हिसाब से आरक्षण नहीं मिल पाया है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 50 फ़ीसदी की सीमा तय की है और फिर क्रीमी लेयर का प्रावधान भी किया गया है."

गोपीनाथ मुंडे भी थे समर्थन में

नरेंद्र मोदी

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भारत में अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 फ़ीसदी आरक्षण है, इसके अलावा आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लिए भी 10 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित किया गया है. अन्य पिछड़ा वर्ग समूहों का तर्क है कि ये प्रतिशत तय होने की वजह से भी उन्हें अपनी आबादी के हिसाब से आरक्षण नहीं मिल पा रहा है.

भाटी कहते हैं, "मेरिट में बेहतर अंक होने के बावजूद ओबीसी उम्मीदवारों की संख्या 27 प्रतिशत तक ही सीमित रहती है. ऐसे में ये आरक्षण अन्य पिछड़ा वर्ग समूहों के लिए मौका कम है और एक तय सीमा अधिक है जिसकी वजह से उनकी हिस्सेदारी नहीं बढ़ पा रही है. जातिगत जनगणना से देश में जाति आधारित वास्तविक आंकड़े मिलेंगे और पता चल सकेगा कि कौन सा वर्ग कहां खड़ा है. किसी भी पार्टी को इसका विरोध नहीं करना चाहिए क्योंकि ये सामाजिक न्याय का मुद्दा है."

बीजेपी के नेता, गोपीनाथ मुंडे ने 2011 की जनगणना से ठीक पहले 2010 में संसद में कहा था, "अगर इस बार भी जनगणना में हम ओबीसी की जनगणना नहीं करेंगे, तो ओबीसी को सामाजिक न्याय देने के लिए और 10 साल लग जाएँगे. हम उन पर अन्याय करेंगे."

इतना ही नहीं, पिछली सरकार में जब राजनाथ सिंह गृह मंत्री थे, उस वक़्त 2021 की जनगणना की तैयारियों का जायजा लेते समय 2018 में एक प्रेस विज्ञप्ति में सरकार ने माना था कि ओबीसी पर डेटा नई जनगणना में एकत्रित की जाएगी. लेकिन अब बीजेपी जातिगत जनगणना पर अपना पक्ष स्पष्ट नहीं कर रही है.

भाटी कहते हैं, "ऐसा लगता है कि बीजेपी की नीयत में खोट आ गया है. बीजेपी सामाजिक न्याय की बात तो करती है लेकिन वास्तव में वो लोगों के साथ सिर्फ़ छलावा करना चाहती है."

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